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मंगलवार, अप्रैल 13, 2010

वर्तमान राजस्थानी कविता में एक भरोसेमंद नाम है कवि श्री ओम पुरोहितकागद । पिछले वर्ष श्री कागद के राजस्थानी में दो कविता संग्रह बोधि प्रकाशन, जयपुर से पंचलड़ी और आंख भर चितराम प्रकाशित हुए । इन दिनों आपकी कालीबंगा शीर्षक से लिखी कविताएं चर्चा में है पिछ्ले दिनों किसी कार्य के सिलसिले में कागद जी सूरतगढ़ आए थे तब उनसे कुछ बातें हुई । उनकी बातों को प्रश्नोत्तरी रूप में यहां प्रस्तुत किया जा रहा है- यह चित्र एक संयोग है और मेरा सबसे पहला सवाल यही है कि क्या आप आरंभ से ही गांधीवादी विचार-धारा के रहे हैं ? यानी जो भी बुरा है उस से दूर रहते हैं ?

शुक्रवार, मार्च 05, 2010

राजस्थानी सबद अर संस्कार

२२ राजस्थानी सबद अर संस्कार
आपणी भाषा-आपणी बात



राजस्थानी सबद अर संस्कार

-ओम पुरोहित 'कागद'


राजस्थानी भाषा जित्ती मीठी, बित्ती ई संस्कारी। संस्कारां री छिब पग-पग माथै। खावण-पीवण, पैरण-ओढण, उठण-बैठण में संस्कार। बोलण-बतळावणं में संस्कार। सबदां रा संस्कार सिरै। कैबा कै बाण रा घाव मिटै, पण बोली रा घाव नीं मिटै। इण सारू सावचेती सूं बोलणो। बोलण सारू बगत-घड़ी, वेळा-कुवेळा अर ठोड़-ठिकाणों देखणो। ऊंच-नीच अर काण-कायदो देखणो। बो' ई सबद बपरावणो, जकै री दरकार। मांदो नीं बोलणो। नन्नो नीं बरतणो। यानी नकार नीं बरतणो। बडेरा सिखावै कै नीवड़णो, बंद करणो, कमती होवणो, बुझावणो, आग लगावणो जेड़ा सबद नीं बोलणा। नीं, कोनी अर खूटणो मूंडै सूं नीं काढणो।
आपणी भाषा री मठोठ देखो। चूल्है में आग बाळणो नीं, चूल्हो चेतन करणो कैईजै। मरणै नै सौ बरस पूगणो। दुकान बंद करणै नै दुकान मंगळ करणो। दीयो बुझावण री ठोड़ दीयो बडो करणो। घटती नै बढती। मारणै नै हिंडावणो या धोबा देवणो। लूण नै मीठो। गुण बायरै नै रंगरूड़ो का रोहिड़ै रो फूल। पाणी में चीज न्हाखण नै पधरावणो। जावणै नै पधारणो। जांवण री इग्या मांगणियै नै जा' री ठोड़ 'बेगो आई' कैवणो। कठै जावै पूछणो होवै तो पूछीजै सिधसारू, पण कठकारो नीं देईजै।
कांण-मोकाण में लोकाचार। मरियोड़ै री 12 दिन बैठक। मरियोड़ै रै समचार नै चिट्ठी। अस्त चुगण नै फूल चुगणो। इणी कारण पुहुप नै फूल नीं कैईजै। सांप रै डसण नै पान लागणो। मरियोड़ै टाबर नै माटी देवणै नै आडै हांथां लेवणो। साग-सब्जी नै काटणो नीं, बंधारणो का सुंवारणो कैईजै। ओसर-मोसर, कारण-ऐढां माथै जीमण सारू बुलावण नै नूंतो। फगत बुलावण सारू तेड़ो। जवाई नै तेड़ो। गीतां रो तेड़ो। मैं'दी-पीठी रो तेड़ो। उच्छब-रैयाण रो तेड़ो कैईजै। जकै रै बाप नीं होवै बो बापड़ो। मा रै जिको चिप्यो रैवै बो मावड़ियो। हांचळ सूं दूध नीं पीवै, पण आंगळ्यां सूं कुचरणी करै बो कुचमादी। सासरै जांवती छोरी रै कूकणै नै बिराजी होवणो। पोतियो गमी में पै'रीजै। जींवतै रो सिराणो उतरादै नीं करीजै। बडेरो मरियां बाळ कटावणै नै भदर होवणो कैईजै। आडै दिनां दाड़ी-मूंछ नीं कटाईजै। दाड़ी-मूंछ मायतां रै मरियां ई कटाईजै। पण बाळ कटावण नै सुंवार करावणो कैईजै। यानी बात साफ है कै काटणो अर कटावणो कैवणो ई कोनी। एक सोरठो चेतै आवै-


मरता जद माईत, मूंछ मुंडाता मानवी।
रोज मुंडावण रीत, चाली अद्भुत चकरिया।।


हाजत-आफत सारू बी न्यारा सबद। गा छंगास। मिनख पाळी। सांढ-ऊंठ चीढै अर भैंस मूत करै। पण अब तो मिनख मूत करण लागग्या। निमटणै री संका नै हाजत। निमटणै नै संका भांगणो। जंगळ जावणो। दिसा जावणो। फिरणो। बन जावणो। भरिया करण का छी छी जावणो कैईजै। पैसाब करण नै संको पालणो, भीजिया का नाडो खोलणो कैईजै। रितु धरम नै गाभा।
रोटी खास्यूं कैयां बडेरा कैवै डाकी है के? ईं सारू सबद है जीमण। जीमण सारू थाळी लगावणो। पुरसणो। जिमावणै नै पुरसगारी अर जिमावणियै नै पुरसगारो कैईजै। बातां तो भोत है, पण बडेरां खनै बैठ्यां ई लाधै।

गुरुवार, जनवरी 07, 2010

भाषा खूट्यां आप री,नईं बचैलो मान-

२६ भाषा खूट्यां आप री
आपणी भाषा-आपणी बाततारीख- २६/२/२००९
भाषा खूट्यां आप री,नईं बचैलो मान-
ओम पुरोहित 'कागद'
आपरी भासा पिछाण बणावै। भासा गमै तो पिछाण गमै। होड़-ठिकाणां रा नांव। गांवां रा नांव। चीज-बस्त रा नांव। भासा पाण चालै। भासा खुरै या मिटै तो ठोड़-ठिकाणां, गांव-सैर अर चीज-बस्त रा नांव खुरै-मिटै। दूजी भासा रै राज में नांव बदळै। अंग्रेजां री टैम कोलकाता सूं कलकत्ता, चैन्नई सूं मद्रास, बैंगलूरु सूं बंगलोर अर मुम्बई सूं बोम्बे या बम्बई होग्या। ओ बदळाव बठै री मायड़भासा री संकड़ाई अर अंग्रेजी रै बिगसाव पेटै होयो। ऐड़ा उदाहरण इतिहास में पण भरियोड़ा है। आ ई हालत आज राजस्थान री है। अठै री मूळ भासा राजस्थानी माथै धूळ जमाय दी। हिन्दी-अंग्रेजी रै प्रभाव में आय'र ठोड़-ठिकाणां, गांव-सैर अर चीज-बस्तां रा नांव ओळ-पंचोळा होयग्या। अब ऐड़ा नांव ना हिन्दी रा रैया, नां राजस्थानी रा।आपणै अठै मूंग-मोठ-चीणां री दाळ होंवती। पण आ दाळ, दाळ सूं दाल होयगी। चावळ सूं चावल, बळीतै सूं बलीतो, कळ सूं कल, फळ सूं फल, बळ सूं बल, झळ सूं झल, टाळ सूं टाल, नाळी सूं नाली, फळी सूं फली, काळ सूं काल, पाणी सूं पानी, दळियै सूं दलिया, कांधळ सूं कांधल, बणीरोत सूं बनीरोत, बीकाणो सूं बीकानो, कांधळोत सूं कांधलोत होग्या। ऐड़ा उदाहरण है। आप कीं मैणत करो अर फड़द बणाओ।इणी भांत गांव-सैरां रा नांव ओळ-पंचोळा होग्या। बिगड़ीयोड़ा नांव बांच-बांच हांसी भी आवै अर झाळ भी। पण करां कांई। किण रै आगै कूकां। आओ देखां, आपणी निजरां साम्हीं कांईं रैयो। कींया खुर रैयी है आपणी मायड़ भासा राजस्थानी। गांव रा नांव आपां बोलां कांई हां अर लिखां कांई हां। गांव सैरां रा नांव बदळतां-बदळतां एहलकारां रै हाथां राज रै कागदां में कींया चढग्या।आपणो गांव धोळीपाळ हो। धोळी यानी सफेद। पाळ यानी 'बट' का रेत री भींत। बदळ'र होग्यो धोलीपाल। अब कठै रैयो धोलीपाल में धोळीपाळ रो अरथ? इयां ई परळीका सूं परलीका, जसाणा सूं जसाना, कमाणां सूं कमाना, दुलमाणां सूं दुलमाना, दीपलाणा सूं दीपलाना, पीळीबंगा सूं पीलीबंगा, काळीबंगा सूं कालीबंगा, अयाळकी सूं अयालकी, गोरखाणा सूं गोरखाना, ढाळिया सूं ढालिया, भिराणी सूं भिरानी, फेफाणा सूं फेफाना, गाढवाळो सूं गाढवालो, किळचू सूं किलचू, रूणीचै सूं रूनीचा, काळियां सूं कालियां, डबळी सूं डबली देखतां-देखतां ई बणग्या। राज रै कागदां में चढग्या। कीं रै कह्यां बदळ्या? कोई ठाह नीं। अब पण पाछा कींया बदळीजै। इण सारू खेचळ री पण दरकार। पाठक आप-आप रा गांवां रा नांव संभाळो। सागी जूनो अर इतिहासू नांव सोधो अर सूची बणाओ। आपरो इतिहास अंवेरण में संको क्यां रो!
भाषा राखै देस री, आन-बान अर स्यान।
भाषा खूट्यां आप री, नईं बचैलो मान।।

रविवार, जनवरी 03, 2010

आपणा इलाका : आपणा नांव

१८ आपणा इलाका : आपणा नांव
आपणी भाषा-आपणी बात
तारीख- १८/२/२००९
आपणा इलाका : आपणा नांव
-ओम पुरोहित 'कागद'
राजस्थान जूनो प्रदेश। जूनी मानतावां। जूनो इतिहास। जूनी भाषा। जूनी परापर। परापर एड़ी कै आज तक इकलग चालै। खावणै-पीवणै, उठणै-बैठणै अनै बोवार री आपरी रीत। रीत में ठरको। ठरकै में इतिहास री ओळ। ग्यान-विग्यान अर भूगोल री ओळ। बात-बोवार अर नांव में राजस्थानी री सौरम। इण सौरम रो जग हिमायती। आजादी सूं पैली राजस्थान में घणा ठिकाणा। घणा ई राज। राजपूतां रा राज। इणी पाण राजपूताना। राजा राज करता पण धरती प्रजा री। प्रजा राखती नांव धरती रा। नांवकरण में ध्यान धरती रै गुण रो। राजवंश, फसल, माटी, पाणी, फळ, पसु-पखेरू धरती रा धणी। आं री ओळ में थरपीजता इलाकै रा नांव।बीकानेर रा संस्थापक राव बीकाजी रै नांव माथै बीकाणो। बीकाणै में बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, भटिंडा, अबोहर, सिरसा अर हिसार। राव शेखाजी रै नांव माथै शेखावाटी। शेखावाटी में चूरू, सीकर अर झुंझुणू। मारवाड़ में जोधपुर, पाली जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर। मेवाड़ में उदयपुर, चितोड़ , भीलवाड़ा अर अजमेर। बागड़ में बांसवाड़ा अर डूंगरपुर। ढूंढाड़ में जयपुर, दौसा, टोंक, कीं सवाईमाधोपुर। हाड़ौती में कोटा, बूंदी, बांरा, झालावाड़, कीं सवाईमाधोपुर। मेवात में अलवर, भरतपुर। जैसलमेर में माड़धरा, हनुमानगढ़ नै भटनेर, करोली-धोलपुर नै डांग, अलवर नै मतस्य, जयपुर नै आमेर, अजमेर नै अजयमेरू, उदयपुर नै झीलां री नगरी, जैसलमेर नै स्वर्णनगर, जोधपुर नै जोधाणो अर सूर्यनगरी, भीलवाड़ा नै भीलनगरी, बीकानेर नै जांगळ अर बागड़ भी कैईजै। राजस्थान रै हर खेतर रा न्यारा-निरवाळा नांव। कीं नांव बिणज-बोपार माथै। कीं नांव जमीन री खासियतां रै पाण। बीकाणै में भंडाण, थळी, मगरो अर नाळी जे़डा नांव सुणीजै। ऐ हाल तो बूढै-बडेरां री जुबान माथै है। बतळ में उथळीजै। पण धीरै-धीरै बिसरीज रैया है। आओ आपां जाणां आं नांवां री मैमा।
भंडाण भंडाण बीकानेर जिलै री लूणकरणसर, बीकानेर अर कीं कोलायत तहसील रै उण गांवां नै कैवै जकां रै छेकड़ में 'ऐरा' लागै। जियां- हंसेरा, धीरेरा, दुलमेरा, खींयेरा, वाडेरा।भंडाण रा मतीरा नांमी होवै। मीठा। अठै री आल जबर मीठी होवै। आल लाम्बै मतीरै नै कैवै। भंडाण री गायां-भैंस्यां, भेड-बकरयां अर ऊंट नांमी। भंडाण रो घी, मावो अर मोठ नांमी। मतीरो भंडाण रो सै सूं सिरै। अठै रै मतीरै सारू कैबा है-
खुपरी जाणै खोपरा, बीज जाणै हीरा।बीकाणा थारै देस में, बड़ी चीज मतीरा।।थळीथळी चूरू जिलै रै रतनगढ़ अर सुजानगढ़ रै खेतर नै थळी कैवै। इण खेतर रा लोग थळिया। थळी री बाजरी, मोठ, काकड़िया, मतीरा नांमी हुवै। थळी री बाजरी न्हानी अर मीठी होवै। थळी रा वासी मोटो अनाज खावै। काम में चीढा अनै जुझारू अर तगड़ा जिमारा होवै। थळी सारू कैबा है-
खाणै में दळिया, मिनखां में थळिया।
मगरोबीकानेर जिलै री कोलायत तहसील अर इणरै लागता जैसलमेर रा कीं गांवां नै मगरो कैवै। अठै री जमीन कांकरा रळी। मगर दाईं समतळ। पधर। इण कारण नांव धरीज्यो मगरो। मगरै रा ऊंट, गा-भेड अर बकरी नांमी। कोलायत धाम भी मगरै में पड़ै।
नाळीहनुमानगढ़, सूरतगढ़, पीळीबंगा, अनूपगढ़, विजयनगर अर हरियाणा रै सिरसै जिलै रै गांवां नै नाळी कैवै। अठै बगण आळी वैदिक नदी सुरसती जकी नै अजकाळै घग्घर भी कैवै। इण नदी खेतर नै नाळी कैईजै। इण इलाकै रो नांव नाळी क्यूं थरपीज्यो। इण सूं जुड़ियोड़ी एक रोचक बात है। आओ बांचां-जद घग्घर में पाणी आंवतो। बीकानेर रा राजा नदी पूजण हनुमानगढ़ आंवता। एकर राजाजी हनुमानगढ़ आयोड़ा हा। लारै सूं एक जणो अरदास लेय'र महलां पूग्यो। राजाजी नीं मिल्या। पूछ्यो तो लोगां बतायो, नदी पूजण गया है। बण पूछ्यो, नदी के होवै? एक कारिंदै जमीन माथै माटी में घोचै सूं लीकटी बणाई। लोटै सूं उण में पाणी घाल्यो। बतायो, नदी इयां होवै। बण कैयो, ऐ डोफा! आ क्यांरी नदी ? आ तो नाळी है, नाळी। बस उण दिन रै बाद इण इलाकै रो नांव नाळी पड़ग्यो। नाळी रा चावळ, कणक अर चीणा जग में नांमी। नाळी री जमीन घणी उपजाऊ होवै।