दोहे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दोहे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, अप्रैल 25, 2014

* समझो सार *

महका पुहुप उपवन में, चुरा लाई बयार ।
भंवरा जो मचल गया , वो दोषी क्यों यार ।।
चला चुराने महक को, ले कर हरख अपार ।
भंवरे का दोष नहीं, बहका गई बयार ।।
डाली पर वो नाचता, भाया खूब गुलाब ।
सुध-बुध अपनी खो गया, भंवरा बेहिसाब ।।
खुश्बू अपनी समेट लो, जिस पर तुमको नाज ।
बिखरी जो माहोल में , गिर जाएगी गाज ।।
भंवरे है मतवाले , मद पर मरते यार ।
मद को अपने रोक लो, या फिर समझो सार ।।

शुक्रवार, जून 21, 2013

*कुछ हिन्दी दोहे *

झपकी लेत गरीब तो, माया छीने चैन । 
भूखा सोता ठाट से , धाया जागे रैन ।1।
नेता सोता चैन से, ले वोटों की ओट ।
जनता खोले आंख तो , दे वोटों की चोट ।2।
नेता जीता वोट से,खूब छापता नोट ।
नेता खोले आंख तब ,जब जब घटते वोट ।3।
जनता पागल बावळी , भूली अपना जोर ।
खादी चोला पहन कर,नेता बन गए चोर ।4।
भारत जाये भाड़ में , नेता भोगे राज ।
नेता सोता चैन से,जनता ऊपर गाज ।5

सावन की बरखा

सावन की बरखा पड़ी,लगी झड़ी दिन रैन ।
साजन बिन कहो बदरिया,किस विद आवै चैन ।1।
साजन बसेँ दूर देश मेँ,गये राज के काम । 
काम काम मेँ उधर जलेँ, इधर काम तमाम ।2।
सावन जलाए बदन को, बरखा लेती प्राण ।
साजन बिन अब सांवरा, पाएं कैसे त्राण ।3।
बूंद बूंद पानी पड़े, तन मेँ लागे आग ।
पिव वाणी के सामने,कड़वी कोयल राग ।4।
मिल कर झूला झूलती, पिव होते जो संग ।
बिन पिया तो ये सावन, करता कितना तंग ।5।

गुरुवार, जून 20, 2013

दोहे

बोझ उठाए झूठ का, करता रहता बात ।
सच आए जब सामने, रोता सारी रात ।।


रोपा बिरवा झूठ का, फल में चाहे सांच ।
फसल झूठ की पाएगा, कौशल अपना जांच ।।

रविवार, जनवरी 29, 2012

हिन्दी दोहे

*कुछ हिन्दी दोहे *




झपकी लेत गरीब तो, माया छीने चैन ।


भूखा सोता ठाट से , धाया जागे रैन ।1।


नेता सोता चैन से, ले वोटों की ओट ।


जनता खोले आंख तो , दे वोटों की चोट ।2।


नेता जीता वोट से,खूब छापता नोट ।


नेता खोले आंख तब ,जब जब घटते वोट ।3।


जनता पागल बावळी , भूली अपना जोर ।


खादी चोला पहन कर,नेता बन गए चोर ।4।


भारत जाये भाड़ में , नेता भोगे राज ।


नेता सोता चैन से,जनता ऊपर गाज ।5

पांच हिन्दी दोहे

.


[<*>] सरदी के दोहे [<*>]


हाड़ काम्पते देह में,ठंड ठोकती ताल ।


भीतर बैठी शान से,नहीं बचेगी खाल ।1।


धुंध फड़कती छा गई, हवा बिगाड़े तान ।


होंठों पपड़ी आ गई,ठंडे होते कान ।2।


कपड़े लादे देह पर , हाथ में चुस्की चाय ।


भाप निकलती कंठ से,काया ठरती जाय ।3।


मीठी मीठी रेवड़ी, पापड़ी लिज्जतदार ।


गरम खाओ पकोड़ियां, सरदी सदाबहार ।4।


औढ़ रज़ाई दुबक लो, ढक लो सारे अंग ।


मात खाएगी ठंड तो ,तूम जीतोगे जंग ।5।






गुरुवार, जून 30, 2011

सावन के दोहे

सावन के दोहे




























सावन की बरखा पड़ी,लगी झड़ी दिन रैन ।
साजन बिन कहो बदरिया,किस विद आवै चैन ।1।

साजन बसेँ दूर देश मेँ,गये राज के काम ।
काम काम मेँ उधर जलेँ, इधर काम तमाम ।2।

सावन जलाए बदन को, बरखा लेती प्राण ।
साजन बिन अब सांवरा, पाएं कैसे त्राण ।3।

बूंद बूंद पानी पड़े, तन मेँ लागे आग ।
पिव वाणी के सामने,कड़वी कोयल राग ।4।

मिल कर झूला झूलती, पिव होते जो संग ।
बिन पिया तो ये सावन, करता कितना तंग ।5।
 
धन कमाने पिया गए,आया सावन मास ।
धन को तन नहीँ जाने, मांगे प्रीतम पास ।6।


अम्बर छाई बदरिया, धरती छाया नेह ।
प्रीतम आवन आस मेँ, सावन बरसे मेह ।7।


आंखेँ बरसी प्रीत मेँ, प्रीतम देखूं आह ।

धरती बादल मिल लिये,मेरी उलझी चाह ।8।

खत मेँ गत मैँ क्या लिखूं,आओ प्रीतम पास ।
सावन फीका जा रहा, तुझमेँ अटकी सांस ।9।

तुम बिन ये घर घर नहीँ, लगता है बनवास ।
सावन मेँ जो सग रहो, जीवन बांधूं आस ।10।