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शुक्रवार, जून 21, 2013

रेत की पीर

दिन भर
तपती रेत
खूब रोती होगी
रात के सन्नाटे में
बुक्का फाड़
तभी तो
हो लेती है
भोर में
शीतल
शांत
धीर
रेत की
अनकथ पीर !

रविवार, जून 02, 2013

देह में रम ले

पितृ परित्यक्त सा
क्यों डोलता है नभ में
विलापता
ठौर को तलाशता
शून्य को नापता।

आ, जल!
उतर आ
मुझ में बस ले!
बरसों से प्यासी
मेरी देह में रम ले!

आ प्रिय!
रूखी देह से
हरियाली जनने की
चाह में तपती
वियोगिनी अपनी मरुधरा के
आलिंगन में बस ले। 

=

रविवार, अक्टूबर 28, 2012

कहीं नहीं है खेतरपाल


सूख गई
वह खेजड़ी
जिस में निवास था
खेतरपाल का
जिस पर धापी ने
चढ़ाया था अकाल को भगाने
सवा सेर तेल
और
इक्कीस का प्रसाद ।


ज्यों का त्यों है अकाल
मगर
खेजड़ी के तने पर
आज भी चिकनाई है
चींटे अभी भी घूमते हैं
सूंघते हैं
प्रसाद की सौरम
परन्तु
नहीं है आस-पास
कहीं नहीं है खेतरपाल ।

सोमवार, जुलाई 05, 2010

ओम पुरोहित "कागद" की सात हिन्दी कविताएं

ओम पुरोहित "कागद" की सात हिन्दी कविताएं



सात अकाल चित्र



1.
पपीहा थार में

सूने पड़े आकाश में
दूर-दूर तक
कहीं भी नहीं दिखता
बादल का कोई बीज
बोले भी तो
किस बिना पर
पपीहा थार में !

2.
 राजधानी में

वह
आया था गांव से
देश की राजधानी में
मुंह अंधेरी भोर में
ताजा छपे अखबार सा
अंग-अंग पर
सुकाल से
अकाल तक के
तमाम समाचार लिए
पड़ा है आज भी
ज्यों पड़ा हो
हिन्दी अखबार
केरल के किसी देहात में ।

3.
सुखिया

सुकाल से
अकाल तक का
जीवंत  वृतांत है
गांव से आया सुखिया ।

पड़ा है
शहर में फुटपाथ पर
अपने परिवार के संग
ज्यों पड़ा हो
एक कविता संग्रह अनछुआ
किसी पुस्तकालय में ।

4.
छापता है पगचिन्ह

सांझ है
भूख है
प्यास है
फिर भी गांव व्यस्त है
सिर पर ऊंच  कर घर
डाल रहा है उंचाला
छापता है पग-चिन्ह
जो
मिट ही जाएंगे कल भोर में
नहीं चाहता
कोई चले इन पर
मगर
भयभीत है;
खोज ही लेंगे कल वे
ऐसे ही अकाल में  
जैसे खोज लिए हैं आज
उसने
अपने बडेरों के पग-चिन्ह ।

5.
कहीं नहीं है खेतरपाल

सूख गई 
वह खेजड़ी
जिस में निवास था
खेतरपाल का
जिस पर धापी ने
चढ़ाया था अकाल को भगाने
सवा सेर तेल
और
इक्कीस का प्रसाद ।

ज्यों का त्यों है अकाल
मगर
खेजड़ी के तने पर
आज भी चिकनाई है
चींटे अभी भी घूमते हैं
सूंघते हैं
प्रसाद की सौरम
परन्तु
नहीं है आस-पास
कहीं नहीं है खेतरपाल ।

6.
 बूढ़ा नथमल

जोते-जोत हल
तन से
बरसाता है जल
बूढ़ा नथमल
ताकता है आकाश
जहां
दूर-दूर तक
पाता नहीं जल
बस
रह जाता है
जल-जल,
नथमल ।

7.
भूख है यहां भी

अकाल है
नहीं है आस जीवन की
पलायन कर गया है
समूचा गांव ।

मोर
आज भी बैठा है
ठूंठ खेजड़े पर
छिपकली भी रेंगती है
दीवारों पर
और
वैसे ही उड़-उड़ आती है
चिड़िया कुएं की पाळ पर ।

भूख यहां भी है
है मगर देखने की
एक आदम चेहरा ।

रविवार, जून 27, 2010

ओम पुरोहित 'कागद' की आठ हिन्दी कविताएं

ओम पुरोहित 'कागद' की आठ हिन्दी कविताएं
थिरकती है तृष्णा (कविता-संग्रह-२००५) से

आठ अकाल चित्र

1. झूम्पे में

अब नहीं बचे
हाड़ों पर चर्बी और चाम
हाडारोड़ी से लौटा है
हड़खोरा कुत्ता
जीभ लपलपाता
ढूंढ़ने गांव के किसी झूंपे में
कहीं अटकी
कोई बूढ़ी सांस ।

2. उस चित्र को

गांव में आया था
उड़ कर कहीं से
अखबार का एक पन्ना
बूढ़ी काकी ने
जिसे चाहा था बांचना
तब तक सब पढ़ लिया था
भाखड़ा बांध के
उस चित्र को
टळका कर आंसू
तहा कर रख लिया था
ऊंडी गोझ में ।

3. क्या होती है बिरखा

भूल गई डेडर की जात
ऊंचे -ऊंचे  स्वर में
गाना टर्राना ।

भूल गई चिड़िया
गा-गा
धूल में नहाना ।

मोर भी नहीं तानता
अब छत्तर
पारसाल ही तो जन्मा था
जब उतरा था अकाल
चारों कूंट
बरसी थी
धोबां-धोबां धूल ।
वह बेचारा
यह भी नहीं जानता
क्या होती है बिरखा
क्या होता है उसका बरसना ।

4. पूछती है बेकळू

इधर-उधर उड़ती
सोनचिड़ी से पूछती है
खेत की बेकळू
कब आएगा गांव से
मरियल सी सांड लिए
हल जोतने जोगलिया ?

कब आएगी
उसकी बीनणी
भाता ले कर
गोटा किनारी वाले
तार-तार
घाघरा कांचळी पहने ?

कब खिंडेगी
इधर-उधर
मेरी तपती देह पर
प्याज के छिलकों संग
छाछ राब की बूंदें ?

5. नहीं जन्मेंगे

सूख-सूख गए
सांप-सलीटा
बिच्छू-कांटा
सब धरती की कोख में;
जो निकले थे कभी
बूंद भर बरसात में ।

खोहों में
भटक-भटक मर लिए
जान लिए हाथ में ।

नहीं जन्मेंगे
अब कभी थार में
रहा जन्मना
अगर उनके हाथ में ।

6. झूंपे ही नहीं

यह काले-काले झूंपे
धोरी के आलस
या सूगलेपन का
परिणाम नहीं है
इनके भीतर
अकाल
महाकाल
त्रिकाल सरीखे सांप
बसते रहे हैं
और
भीतर बाहर से इन्हें
सदी दर सदी
डसते रहे हैं
इस लिए अब
यह झूंपे ही नहीं
साक्षात शिव भी हैं ।

7. बिफरती रेत में

इस बार होगा जमाना
धान से भरेंगे कोठार
बाबा करेंगे
पीले हाथ मेरे
यह सपने देखे थे
साल-दर-साल
पर हर साल
सब जीमता गया अकाल ।

इस बार
जब फिर सावन आया
आकाश में कुछ तैर आया
मैंने सपने
और बाबा ने बीज बोया
मगर इस बार फिर
वही हुआ
बाबा के बीज और मेरे सपने
जल गए ।

अब
न बाबा के पास बीज हैं
न मेरे पास सपने
न आस/
न इच्छा ।

8. यूं बरसती है बिरखा

खूब रोता है धनिया
जब पूछती है
सात साल की लडली
बाबा, कैसी होती है बिरखा !

टळ-टळ बहती
आंखों की ओर
इशारा भर करता है
और कहता है
बेटी !
यूं पड़ता है पानी
यूं बरसती है बिरखा !

बुधवार, जून 16, 2010

ओम पुरोहित कागद की सात हिन्दी कविताएं

सात अकाल चित्र


1.मिले तो सही

धोरों की पाळ पर
सळफलाती घूमती है
जहरी बांडी
मिलता नहीं कहीं भी
मिनख का जाया ।

भले ही
हो सपेरा
मिले तो सही
कहीं
माणस की गंध ।

2. यही बची है

सूख-सूख गए हैं
ताल-तलायी
कुंड-बावड़ी
ढोरों तक को नहीं
गंदला भर पानी ।

रेत के समन्दर में
आंख भर पर जिन्दा है भंवरिया ।
यही बची है
जो बरसाती है
भीतर के बादलों से
टसकता खारा पानी ।

3. जानता है नत्थू काका

भेड़ की खाल से
बहुत मारके का
बनता है चंग
जानता है नत्थू काका
पर ऐसे में
बजेगा भी कैसे
जब गुवाड़ में
मरी पड़ी हों
रेवड़ की सारी की सारी भेड़ें
चूल्हे में महीने भर से
नही जला हो बास्ती
और
घर में मौत तानती हो फाका ।

4. मौत से पहले

सूख-सूख मर गईं
रेत में नहा-नहा चिड़िया
नहीं उमड़ा उस पर
बिरखा को रत्ती भर नेह ।
ताल-तलाई
कुंड-बावड़ी
सपनों में भी
रीते दिखते हैं
भरे,
कब सोचा था उस ने
मौत से पहले
एक साध थी;
नहाती बिरखा में
दो पल सुख भोगती
जो ढकणी भर बरसा होता मेह ।

5.ढूंढ़ता है



खेत में पाड़ डाल-डाल
थार को
उथल-पुथल कर
ढूंढ़ता है सी’ल;
आंगली भर ही सही
मिले अगर सी’ल
तो रोप दे
सिणिया भर हरा
और लौटा लाए
शहर के ट्रस्ट में
चरणे गई धर्मादे का चारा
थाकल डील गायें ।

6. कहीं तो बचे जीवन


आंख उठाये
देखता है देवला
कभी आसमान को
और टटोलता है कभी
हरियाली के नाम पर बची
सीवण की आखिरी निशानी ।

कहीं तो बचे जीवन
जो कभी हरा हो
जब बरसे गरज कर
थार में थिरकता पानी ।

7. तपस्वी रूंख

सिकी हुई रेत में
खड़ा है
हरियल सपने लेता
खेजड़े का तपस्वी रूंख ।

बरसे अगर एक बूंद
तो निकाल दे
ढेर होते ढोरों के लिए
दो-चार पानड़े
और टोर दे थार में
जीवन के दो-चार पांवड़े ।




थिरकती है तृष्णा ( कविता -संग्रह ) 2005 से

थिरकती है तृष्णा ( kavitaa

1। मिले तो सही

धोरों की पाल पर
सलफलाती घूमती है
हरी बांडी
मिलता नहीं कहीं भी
मिनख का जाया

भले ही
हो सपेरा
मिले तो सही
कहीं
माणस की गंध


2. यही बची है

सूख-सूख गए हैं
ताल-तलायी
कुंड-बावड़ी
ढोरों तक को नहीं
गंदला भर पानी

रेत के समन्दर में
आंख भर पर जिन्दा है भंवरिया
यही बची है
जो कभी बरसती है
भीतर के बादलों से
टसकता खारा पानी


3. जानता है नत्थू काका

भेड़ की खाल से
बहुत मारके का
बनता है चंग
जानता है नत्थू काका
पर ऐसे में
बजेगा भी कैसे
जब गुवाड़ में
मरी पड़ी हों
रेवड़ की सारी की सारी भेड़ें
चूल्हे में महीने भर से
नही जला हो बास्ती
और
घर में मौत तानती हो फाका

4. मौत से पहले

सूख-सूख मर गयी
रेत में नहा-नहा चिड़िया
नहीं उमड़ा उस पर
बिरखा को रत्ती भर नेह
ताल-तलाई
कुंड-बावड़ी
सपनों में भी
रीते दिखते हैं
भरे,
कब सोचा था उस ने
मौत से पहले
एक साध थी;
नहाती बिरखा में
दो पल सुख भोगती
जो ढकणी भर बरसा होता मेह

5. ढूढ़ता है

खेत में पाड़ डाल-डाल
थार को
उथल-पुथल कर
ढूंढ़ता है सी;
आंगल भर ही सही
मिले अगर सी
तो रोप दे
सिणिया भर हरा
और लौटा लाए
शहर के ट्रस्ट में
चरणे गई धर्मादे का चारा
थाकल डील गायें

6. कही तो बचे जीवन

आंख उठाये
देखता है देवला
कभी आसमान को
और टटोलता है कभी
हरियाली के नाम पर बची
सीवण की आख़िरी निशानी

कहीं तो बचे जीवन
जो कभी हरा हो
जब बरसे गरज कर
थार में थिरकता पानी

7. तपस्वी रूंख

सिकी हुई रेत में
खड़ा है
हरियल सपने लेता
खेजड़े का तपस्वी रूंख

बरसे अगर एक बूंद

तो निकाल दे
ढेर होते ढोरों के लिए
दो-चार पानड़े
और टोर दे थार में
जीवन के दो-चार पांवड़े