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शुक्रवार, अप्रैल 25, 2014
*हाल सुना भाई*
आ बैठ सुना अपना हाल भाई ।कैसे पिचके हैं ये गाल भाई ।।
मजूरी से आता केवल आटा ।
बता कहां से लाया दाल भाई ।
महंगाई के पड़ते चाबुक नित ।
बची कैसे तुम्हारी खाल भाई ।।
दिन भर खटता तूं और बढ़ते वे ।
कौन बुने है ऐसा जाल भाई ।।
वोट हो तेरा और राज उनका ।
यह कैसा जाल-जंजाल भाई ।।
दिन काटना कठिन है कितना ।
कैसे काटेगा तूं साल भाई ।।
रविवार, अप्रैल 13, 2014
बुढ़ापा हुआ बीमारी
तूं जनमा मैं बलिहारी बेटा।वो खुशियां अब मैं हारी बेटा ।।
छोड़ा घर देश गांव भी अपना ।
ऐसी भी क्या लाचारी बेटा ।।
ममता छोड़ क्या ओहदा पाया ।
हो गए बड़े तुम व्यपारी बेटा ।।
जोड़ जोड़ सपने महल बनाया ।
लगती नहीं अब बुहारी बेटा ।।
बिना सहारे अब पांव न उठते।
बुढ़ापा हुआ बीमारी बेटा ।।
दूर देश मेँ जो जाया पोता ।
सुनी न आंगन किलकारी बेटा ।।
बहू आती घर आंगन सजाती ।
सध जाती दुनियादारी बेटा ।।
सपना लिख दे
आंखों में कोई सपना लिख दे ।
सपनों में कोई अपना लिख दे ।।
लिख दी ढेरों कविताएं मैंने ।
आ अब तो उनका छपना लिख दे ।।
देवों जैसी है शक्ल ओ सूरत ।
मेरा भी अब तो जपना लिख दे ।।
सपनों में कोई अपना लिख दे ।।
लिख दी ढेरों कविताएं मैंने ।
आ अब तो उनका छपना लिख दे ।।
देवों जैसी है शक्ल ओ सूरत ।
मेरा भी अब तो जपना लिख दे ।।
सोमवार, जुलाई 29, 2013
<>कागद तो कोरा था<>
अपना बना कर न जाने क्यों बहलातें हैं लोग ।
देकर जख्म न जाने क्यों सहलाते हैं लोग ।।
मां जाए हैं सभी लाए शक्ल अपनी उधार में ।
ला कर हम को क्यों आइना दिखाते हैं लोग ।।
पाक ही है दामन तमाम उनका कीचड़ में ।
इश्तिहार बांट कर रोज क्योँ जताते हैं लोग ।।
मजहब है इंसानों का जब इंसानियत ही ।
तो फिर क्यों इंसानी खून बहाते हैं लोग ।
कागद तो कोरा था लिखे जज़बात आपने ।
खुदा का लिखा फरमान क्यों बताते हैं लोग ।
शुक्रवार, जून 21, 2013
उनके आने पर
उनके आने पर दहलीज गुनगुनाने लगी ।उनके जाने पर दहलीज भरभराने लगी ।।
आंखो में उभर ना सकी तस्वीर कोई ।
वो सूरत जो ज़हन मे झिलमिलाने लगी ।।
हो जाएंगे वो नज़र से दूर जान कर ।
ज़िंदगी इस देह में कसमसाने लगी ।।
बेर खट्टे भी खाया किए बातों के लिए ।
आज यादें वो अकेले में रुलाने लगी ।
खा कर गर्म चीजें पीट लेते थे छाती ।
बातें बचपन की याद आ हसाने लगी ।
सत्संग
बेरुखी भी आपकी अदा होती है ।रोज नहीं मगर यदा कदा होती है ।।
बातें उधर होंगी नशीली यकीनन ।
उनकी बातें तो मयकदा होती हैं ।।
चांद के होने पर होती है पूनम ।
उनके चेहरे पर सर्वदा होती है ।।
उनके हुस्न का चर्चा सुन चकराए आप ।
हमारे यहां सत्संग सदा होती है ।।
उनके आने पर खिल जाएं है चेहरे ।
छुपने पर बस्तियां ग़मज़दा होती हैं ।।
गुरुवार, जून 06, 2013
धिक गई ज़िन्दगी
थोडी़ सी धिकाई और धिक गई ज़िन्दगी ।
दो नर्म आसूं गिरे और टिक गई ज़िन्दगी ॥
ये फ़लक था बडा़ हम लुंज-पुंज लाचार ।
टीचर जी के चाक सी घिस गई ज़िन्दगी ॥
सपनों की बारिश और लम्बा रहा सफ़र ।
इंद्रधनुष सी उभरी और मिट गई ज़िन्दगी ॥
ठंठारों की बस्ती में रहा बंजारों का महल ।
दीवार-ओ-नींव तलक चटख गई ज़िन्दगी ॥
रेत की नदी और नाव रही कागज़ की ।
सफ़र के अंजाम ही से सहम गई ज़िन्दगी ॥
[] ओम पुरोहित"कागद"
शुक्रवार, मार्च 29, 2013
मर कर देखा है
.
दर्द को दिल में भर कर देखा है ।
ज़ख्म को दिल मेँ धर कर देखा है ।।
हाथ आ कर छूट ही ना जाए ।
खुशी को बहुत डर कर देखा है ।।
मरने पर दर्द होता है कितना ।
बार बार खुद मर कर देखा है ।।
दर्द को दिल में भर कर देखा है ।
ज़ख्म को दिल मेँ धर कर देखा है ।।
हाथ आ कर छूट ही ना जाए ।
खुशी को बहुत डर कर देखा है ।।
मरने पर दर्द होता है कितना ।
बार बार खुद मर कर देखा है ।।
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