गुरुवार, मई 22, 2014

बोलेगी नहीं यह मिट्टी


सचल थी तब
खुद लेती थी आकार
छोटा-बडा़ भू-मंडल में

तब बोलती थी मिट्टी
दिखाती थी दिशाएं
साथ-साथ चल कर
आज जब सचल से
अचल है मिट्टी
कलाकार के हाथ लग
ले रही है पुन: आकार
बोलेगी नहीं
डोलेगी नहीं
लग कर
किसी चौक-चौराहे
भवन या दीवार में
ठिठक जाएगी
अपने होने का
महज़ देगी आभास
इसी से पा जाएगी मंज़िल
पा जाएगी दिशाएं
आज सचल पडी़
दिशा भटकी मिट्टी !

=
[ प्रख्यात चित्रकार एवम 

मूर्तिकार भाई रामकिशन अडिग 
[ RAM KISHAN ADIG ]
द्वारा बनाई जा रही मूर्तियों को देखते हुए ]




शुक्रवार, अप्रैल 25, 2014

फिर कविता लिखेँ


आओ
आज फिर कविता लिखें
कविता मेँ लिखेँ
प्रीत की रीत
जो निभ नहीँ पाई
याकि निभाई नहीँ गई !

कविता मेँ आगे
रोटी लिखें
जो बनाई तो गई
मगर खिलाई नहीँ गई !

रोटी के बाद
कफन भर
कपड़ा लिखें
जो ढांप सके
अबला की अस्मत
गरीब की गरीबी !

आओ फिर तो
मकान भी लिख देँ
जिसमेँ सोए कोई
चैन की सांस ले कर
बेघर भी तो
ना मरे कोई !

चलो !
अब लिख ही देँ
सड़कोँ पर अमन
सीमाओँ पर सुलह
सियासत मेँ हया
और
जन जन मेँ ज़मीर !

सत्य समय सापेक्ष है

सत्य का स्थान
लेता है असत्य
सत्य का अंत ही
होता है असत्य 
और फिर
असत्य का अंत ही
बनता है नया सत्य ।

सत्य को कर परास्त
असत्य ही
हो जाता है स्थापित
एक नए सत्य के रूप में
आज जो असत्य है
वही है कल का सत्य
और जो आज सत्य है
वही होगा कल का असत्य ।

स्थापित असत्य को
धकेल-पछाड़ कर ही
नया सत्य
होता है स्थापित
जो चलता है
कुछ समय के लिए
फिर हो जाता है असत्य
किसी नए सत्य के लिए ।

किस के अधीन है सत्य
धनबल-भुजबल
वाचालों की चाल
या फिर
सत्ता के खूंटे बंधा
सामर्थ्य सापेक्ष भी
कौन जाने
सत्य मगर है
समय सापेक्ष ही !

*दीया जलाएं*

आसमान साफ 
बादल और बिजलियां मौन
गतिमंद है पौन
पसरा है अंधेरोँ मेँ
मौन सन्नाटा
मगर
निस्तेज नहीँ है सूरज 
सारी गतियोँ को
कर देगा सक्रिय
अपने किसी एक फैसले से ।
आओ
हम करें प्रतिक्षा
सूरज के उगने की
तब तक
आओ जलाएं
एक एक दीया
अंधेरोँ से लड़ने के निमित
घरोँ की मुंडेर पर !

सपने

तेरी आंखों मेँ
मेरे सपने
मेरे सपनोँ मेँ
तेरी आंखें !

कभी कभी
मेरे सपनोँ से
मगर हर पल
डरता हूं
तेरी आंखोँ से !

तेरी आंख के सपने पर
मेरा नियंत्रण
हरगिज नहीँ
सपनोँ पर
तेरा नियंत्रण
बहुत डराता है
फिर भी
न जाने क्योँ
खुली आंख भी
भयानक सपना आता है !

*मेरा सपना*

रात भर जागना
इबादत ही तो है 
किसी अज्ञात की
ज्ञात के लिए वरना
जागता कौन है !
तुम अज्ञात नहीँ हो प्रभु
तुम्हारे बारे मेँ सब 
सुन जान लिया है मैँने
तुमने कहा भी है
मेरे भीतर
अंश है तुम्हारा
और फिर लौटना भी है
मुझे तुम्हारे भीतर !

कौन है फिर वो
जिसके लिए
जागता हूं मैँ
रात भर ;
जरूर कोई सपना है वह
जिसके आने से
डरता हूं मैँ !

मिटाओ सबब

आंख के आंसू
पौंछ भी लूं
भीतर के आंसू तो
कर ही देँगे नम 
यह नमी
दिखेगी नहीँ
मेरा अंतस मगर
जला कर 
कर देगी राख
यह राख
एक दिन
ढांप ही लेगी
तुम्हारा महल !

आंसू पौंछने के बजाय
मिटाओ सबब
और
वक्त रहते सीख लो
अंतस पढ़ना
जिस में
उफनता है बहुत कुछ
तुम्हारे विरुद्ध !

* बटोर लो पत्थर *

किसी ने
कोई पत्थर नहीँ उछाला
न कहीँ आस पास
कोई दुष्यन्त कुमार ही है
फिर ये आसमान मेँ
छेद क्योँ कर हुआ !

आज 
आसमान मेँ छेद है
ओजोन परत के पार
यह भी नतीजा है
तबीयत से
पत्थर न उछालने का !

अब भी वक्त है
बटोर लो पत्थर
दुरुस्त कर लो
अपनी अपनी तबीयत
वक्त गुजरने के बाद
पानी सिर से
पार हो जाएगा
फिर कहीँ से भी
पत्थर हाथ नहीँ आएगा
तब ये नंगा आसमान
खूब चिड़ाएगा !

लाचार हाथ

सब ने समवेत किया
चमन को नमन
करोड़ोँ हाथोँ ने
उगाई फसलेँ
लाखोँ हाथोँ ने
किया श्रम
कारखानोँ-खदानोँ मेँ
हजारोँ हाथोँ ने
किया कागज पर हिसाब
फिर सब ने
दुआ मेँ उठाए हाथ
बहबूदी के लिए सबकी
अचानक न जाने कहां से
तुम आ गए
बटोर लिया सब !
करोड़ोँ भूखे पेट
तड़पे-चिल्लाए
तुम मुस्कुरा कर
भीतर चले गए !
निराश लोग
खेतोँ
खदानोँ
कारखानोँ
कागजोँ मेँ लौट आए !
कब तक चलता
यह सिलसिला
लाचार हाथ
अन्न अन्ना अन्न अन्ना
उचारते
मुठ्ठियां तान लौटे हैँ
कहां हो अब तुम ?

*प्रीत पुराण*

प्रीत के बादल
उमड़े इधर
घुमड़े उधर
मन का मोर
नाचा बहुत
ताता थइया
कड़कीं बिजलियां
इसी ऊहापोह मेँ
बिन बरसे लौट गए ।

अब लोग कहेँ
मौसम नहीं बारिश का
औढ़ रजाई दुबको
नहीँ भरोसा शीत का
छोड़ो आमंत्रण
मीत का-प्रीत का ।

यक-ब-यक लौटे
बादल प्रीत के
आते तो हैं
हमारी प्रीत की
भरने साख
देर रात जाग जाग
अर्थाते हम उसको
दिखती छवियां
लेती नहीं आकार
भोर सुहानी
करे मनमानी
तृण दल ऊंचे
आंसू कातर
मान औसकण अपने तन
अपना मन
बांधे रखता
आस पुरातन !

[<>] नया साल [<>]

हर साल की तरह
इस बार फिर
आ रहा है 
नया साल
ले कर नए सपने
आगत के स्वागत में
इस बार फिर 
भूल जाएंगे हम
विगत के सपने
जो बोए थे हम ने
खुद अपने हाथों
समय के खेत में !

कुछ ही दिन बाद
अपने ही हाथों
फाड़ देंगें हम
प्राकृतिक दृश्यों वाला
वह मोहक कैलेण्डर
जो टांगा था हम ने
खुद अपने हाथों
पहले ही दिन
ड्राइंगरूम की दीवार पर
पिछले नए साल !

नए साल में
अम्मा हो जाएगी
एक साल और बूढ़ी
गुड़िया कद के साथ बढ़
हो जाएगी एक साल बड़ी
घर में एक नया डर
जन्म लेगा नए साल !

नन्हें नाती के
निकल आएंगे दांत
छुटके के उग आएगी
अक्ल दाड़
हमारे कितने गिरेंगे
गिनेंगे हम नए साल !

बाजार तो बाजार है
ठोक बजा कर बढ़ेगा
वेतन जोर शोर से
खर्च बढ़ेगा मगर चुपचाप
सैंसैक्स चढ़ेगा
गिरेगी मगर मानवता
नेता नहीं बदलेंगे
किसी हाल नए साल !

नया साल मुबारक
कहेंगे हम दौड़ दौड़
अपने इष्ट मित्रों को
संगी-साथियों को
मगर भूल जाएंगे खुद
हम जिएंगे अब
एक साल कम
नहीं रहेगा मगर मलाल
नए साल
जो आता रहेगा हर साल !

*बेबस है मां*

1.
जिस घर में 
कभी बजे थे
घनघना कर थाल
खूब पका था माल
आज उस घर में
मौन हैं सारे बर्तन
उदास है चूल्हा !
2.
आज भी घर से
निकले थे बच्चे
ले कर बस्ता
दोपहर का टिफिन
लौटते थे सांझ ढले
मेरी गौद में
आज क्यों आया है
केवल बस्ता
ज्योँ का त्यों टिफिन
कब लौटेंगे बच्चे
पूछ-पूछ हारी मां !
3.
बस में जाते थे
बच्चे हमेशा
आज
बेबस हैं माँ !

देह का होता है वैधव्य

उसे पता था
उसे प्रेम है
जिसका नहीं था
किसी को भी पता
शादी वाले दिन
आज भी नहीं है
जब छोड़ गया संसार
फेरों वाला
उसकी आंखों में
आज भी हैं आंसू
उसी बेबसी के
जो थे फेरों वाले दिन
दुनिया ने
नाहक फोड़ दीं
आगे बढ़ कर चूडियां
सूनी कर दीं कलाइयां
मन नहीं हुआ सूना !

उसे
आज भी सुहाता है
लाल जौडा
हरे कांच की चूडियां
बहुत भाता है
पल-पल संवरना
दुनिया सोचती है
केवल उसका वैधव्य
वह तो हर पल
उसे ही सोचती है
जो उसे नहीं मिला !

सफेद कफडों में ढकी
उस देह के भीतर
आज भी बैठी है
एक सधवा
जो चाहती है
सावन की बारिश में
खिलखिला कर नहाना
वह कहना चाहती है
मन का नहीं
देह का होता है वैधव्य 

अब बाज पालने होंगे

हम भ्रम में
नाग पालते रहे
पिलाते रहे दूध
जब कि 
उन्हों ने कभी
पीया ही नहीं दूध 
कभी पीया भी तो
निगल लिया खुद
अपना ही ज़हर
इस लिए वे
शत्रु के सामने
या तो खेत रहे
या फिर कमजोर !

वे चतुर-चालाक
हमारे सांपों की
जान कर कमजोरियां
पालते रहे नेवले
नेवले उन के
हमारे सांपों को
बिलों में जा कर
मारते रहे
इन सांपों के भरोसे
हम बिना लडे ही
हारते रहे !

वक्त का तकाजा है
अब हमें
बाज पालने होंगे
जो झपट सके
खूंखार नेवलों पर
दंशहीन हो चुके
अपने ही सांपों पर
एक साथ
ताकि हम जीत सकें
हम पर आ पडी
भीतर-बाहर की जंग !

*ईश्वर से कुछ सवाल*

हे ईश्वर !
तूं सर्वशक्तिमान है
इसका तुझे
कितना अभिमान है
आरती-भजन
कीरतन-जागरण
स्तोत्र-मंत्र-पूजा-पाठ
सोने-चांदी के छत्र
हीरे-मोती के मुकुट
चढावा-प्रशाद के बिना
होता नहीं मेहरबान
चाहे कितना ही
टूट जाए इन से
तुम्हारा कद्रदान !
*
हे ईश्वर !
बड़े-बड़े मंदिरों में
क्यों लगता है
तुम्हारा मन
कीमती धातुओं-पाषाणों में
क्यों करता है प्रवेश
निराकार है यदि तूं
तो क्यों चाहिए तुम्हें
इतने सारै
भौतिक आकार ?
*

हे ईश्वर !
सदियों से तुझे
धोकते मानवी
बुढ़ाए और चले गए
तुम मगर कभी
हुए नहीं कभी बूढ़े
आज भी जवान पड़ी हैं
तुम्हारी तस्वीरें
आओ हो जाए
एक फोटो सेशन
तुम्हारा बुढ़ाया चेहरा
सामने तो आए !
*
हे ईश्वर !
कहां जरूरी है
बुराई को पैदा करना
फिर उसे मारना
असत्य को रचना
फिर उसे पराजित कर
सत्य की स्थापना करना ?
इन समस्त
मानवी कर्मों का
जब तूं ही है कर्ता
तो क्यों करवाता है
उल्टे काम
सीधे ही करवा
बन्द क्यों नहीं करता
व्यर्थ की उधेड़-बुन !

फ़िर दे ताली-मना दिवाली

अंतिम पंक्ति में खडे़
आम आदमी के पास
हो अपना घर
अपनी छत
अपना आंगन
उस आंगन में सज़े रंगोली
चहूं ओर पसरी हो खुशहाली
फ़िर दे ताली
मना दिवाली !

घर-घर पसरे
खुशियां ही खुशियां
हर आंगन में जले
शिक्षा का दीपक
छत हो सुरक्षित
जिस के नीचे
दिल नहीं
हर दिन जलता हो चूल्हा
पकती हो दो वक्त
मेहनत की रोटी
न कोई छीने रोटे
न कोई झपटे रोटी
न कोई मांगे रोटी
न कोई सेके रोटी
फ़िर दे ताली
मना दिवाली !

घर-घर हों
खुशियों के धूम-धडा़के
जिसकी धमक
पहुंचें गांव-गली
नगर-नगर और डगर-डगर !
गम का तम मिट जाए
हों रोशन खुशियों के दीपक
दुख दारिद्र्य का धूम्र
निकले घर-घर से
अनंत क्षितिज में जाए समा!
फ़िर फ़ैले चहूं ओर
महक लुटाती पौन छबीली
हवा निराली खुशियों की
फ़िर दे ताली
मना दिवाली !

अघट घटे न कभी
घट-घट सुघट घट सरसाए
सड़क न खाए आदम जाए !
आदम न हो आदम का बैरी
आतंकी छाया की माया का
टूटे तिलसम बीच चौराहे !
घर से निकला
घर का जाया
घर ही लौटे
मिट जाए भय के साये !
सम्बन्धों की चादर का
तान-बाना फ़िर जुड़ जाए
घरजाई बहिनों सरीखी हो
परजाई सब बहिनों की अस्मत
फ़िर दे ताली
मना दिवाली !

जनमत ना हो लाचार कभी
सरकार करे सपने साकार सभी
घोटालों  पर न्यायिक घोटे से
सरकार करे वार सभी
न मिलावट हो
न मुनाफ़ाखोरी
न तेजी-मंदी तेजडि़या
न सट्टा हो साकार कभी
सेंसैक्स न उछले-फ़िसले
थम जाए मुद्रा प्रसार कभी !
न पुल टूटे न नदियां छलकें
मर जाएं नकली ठेकेदार सभी !
कांडों का भांडा फ़ोडा़ जाए
कांडवती न हो सरकार कभी !
फ़िर दे ताली
मना दिवाली !

हम तोआशा लिए बैठै हैं

अपनी हर बात पर तमाशा किए बैठै हैं ।

बडी़ ही सही हम तोआशा लिए बैठै हैं ॥

अपने दिल-ए-कांच की हिफ़ाजत करूं कैसे ।
वो शहर  भर के पत्थर ज़ब्त किए बैठै हैं ॥

उनके गम का हमसाकी बनूं भी तो कैसे ।
वो तो दुनिया के तमाम अश्क पिये बैठै हैं ॥

क्या जाने उनके भी दिल में है इधर सा ।
वो जो अर्से से अपने लब सिये   बैठै हैं ॥

कहां तक थामेंगे हाथ    सफ़र-ए-ज़िन्दगी में ।
वो जो उम्र का हर लम्हा आज जिए बैठै हैं ॥

वो क्योंकर आने लगे अब मेरे अलाव पर ।
जो अपने  दामन में आफ़ताब लिए बैठै हैं ।

सात हिन्दी कविताएं

[1] आग
जब जंगल में
लगती है आग
तब
केवल घास
या
पेड़ पौधे ही नहीं
जीव-जन्तु भी
जलते हैं
अब भी वक्त है
समझ लो
जंगल के सहारे
जीव-जन्तु ही नहीं
आदमी भी पलते हैं ।

[2] याद

यादें ज़िन्दा हैं
तो ज़िन्दा है आदमी
जब जब भी
यादें मरती हैं
मर जाता है आदमी !
भुलाना आसान नहीं ;
षड़यंत्र है
जिसे रचता है
खुद अपना ही ।
भुलाना शरारत है
और
याद रखना है इबादत ।
भुलाना भी
याद रखना है
अपने ही किस्म का ।
कुछ लोग
कर लेते हैं
कभी-कभी
ऐसे भी
जानबूझ कर
भूल जाते हैं
लेकिन नहीं हैं
ऐसे शब्द
मेरे शब्दकोश में ।

[3]  खत

जब खत न हो
गत क्या जानें
गत-विगत सब
खत-ओ-किताबत में
खतावर क्या जानें
नक्श जो
छाया से उभरे
उन से कोई
बतियाए कैसे
बतिया भी ले
उत्तर पाए कैसे ?
बिन दीवारों के
छत रुकती नहीं
फ़िर हवा में मकां
कोई बनाए कैसे ?

नाम ले कर
पुकार भी लें
वे सुनें क्योंकर
लोहारगरों की बस्ती में
जो बसा करे !

[4] सबब

धूप की तपिश
बारिश का सबब
बारिश की उमस
सृजन की ललक
सृजन की ललक
तुष्टि का सबब
यानी
हर क्षण
हर पल
विस्तार लेता अदृश्य सबब !
सबब है कोई
हमारे बीच भी
जो संवाद का
हर बार बनता है सेतु ।
मेरी समझ से
कत्तई बाहर है
कि मैं किसे तलाशूं
संज्ञाओं को
विशेष्णों को
कर्त्ताओं को
या फ़िर
संवाद के सबब
किन्हीं तन्तुओं को
या कि सबब को ही !

[5]  कब

कलि खिलती है तो
फ़ूल बन जाती है
फ़ूल खिलते हैं तो
भंवरे गुनगुनाते हैं
धूप खिलती है तो
चेहरे तमतमाते हैं
चेहरे खिलते हैं तो
सब मुस्कुराते हैं
यूं सब मुस्कुराते हैं

यहां जमाना हो गया
कब खिलखिलाते हैं ?

[6]  चेहरा मत छुपाइए

हर आहत को
मिले राहत
ऐसा कदम उठाइए
खुशियां हों
हर मंजिल
ऐसी मंजिल चाहिए ।
हो कठिन
अगर डगर
खुद बढ़ कर
कंवल पुष्प खिलाइए ।
चेहरे पढ़ कर भी
मिल जाती है राहत
खुदा के वास्ते
चेहरा मत छुपाइए !

[ 7] मन निर्मल

न जगें
न सोएं
बस
आपके कांधे पर
सिर रख कर
आ रोएं !
पहलू में आपके
सोना
रोना
थाम ले मन
बह ले
अविरल
दिल का दर्द
आंख से
आंसू बन कर ।
हो ले मन निर्मल
औस धुले
तरू पल्लव सरीखा ।
कितना ज़रूरी है
तलाशूं पहले तुम्हें
तुम जो अभी
अनाम-अज्ञात
हो लेकिन
कहीं न कहीं
बस मेरे लिए
मेरी ही प्रतिक्षा में !
यही प्रतिक्षा जगाती है
हमें देर रात तक
शायद हो जाएगी
खत्म कभी तो
कहता है
सपनों में
हर रात कोई !

दो कविताएं



1.गलियं 

कुछ गलियां
छोड़नी पड़ती हैं
कुछ आदमियों के कारण
और
कुछ गलियों में
जाना पड़ता है
कुछ आदमियों के कारण ।

गलियां
वहीं रहती हैं
वही रहती हैं
बदलते रहते हैं
आपसी सम्बन्ध
ठीक मौसम की तरह !
2. रास्ता 
=======

चलें
ऐसे रास्तों पर
जहां चल सकें
जूते पहन कर ।

अधिक से अधिक
ऐसा रास्ता भी
हो सकता है ठीक
जहां चल सकें
जूती हाथ में थाम कर ।

भला कैसे हो सकता है
वह रास्ता
जहां चलना पडे़
सिर पर उठा कर
अपने ही जूते !

** धिक गई ज़िन्दगी **

थोडी़ सी धिकाई और धिक गई ज़िन्दगी ।
दो नर्म आसूं गिरे और टिक गई ज़िन्दगी ॥

ये फ़लक था बडा़ हम लुंज-पुंज लाचार ।
टीचर जी के चाक सी घिस गई ज़िन्दगी ॥

सपनों की बारिश और लम्बा रहा सफ़र ।
इंद्रधनुष सी उभरी और मिट गई ज़िन्दगी ॥

ठंठारों की बस्ती में रहा बंजारों का महल ।
दीवार-ओ-नींव तलक चटख गई ज़िन्दगी ॥

रेत की नदी   और नाव रही   कागज़ की ।
सफ़र के अंजाम ही से सहम गई ज़िन्दगी ॥