रविवार, अप्रैल 13, 2014

*हारे भी क्यों पानी*

पानी में हलचल है
भीतर-बाहर जरूर
कोई हरकत है
किसी ने फैंका होगा
पानी में पत्थर
या फिर
पानी के नीचे से
खिसकी है जमीन ।

पानी तो
हो जाएगा स्थिर
देखना एक दिन
उस के विरुद्ध
जारी रहेंगे षड़यंत्र ।

पानी को
नहीं जीतना है
कोई युद्ध
मगर हारे भी क्यों
किसी का पानी !

वोटर और नेता उवाच

चुनाव आते ही
आ गए नारे
अज़ीब-अज़ीब
और प्यारे-प्यारे
कुछ कह रहे हैं
हमारे संग चलो
यदि आपको
ये देश बचाना है
वोटर बोला
हम को बख्शो भाई
आप ही चल लो
हम तो दो रोटी खाते हैं
दोनों ही पच जाती है
चल -कर आपको ही
अब तक "खाया" पचाना है
देश क्या खाक बचाना है ।

एक बोला
फ़लाना जी को लाओ
देश बचाओ
वोटर बोला


ये फ़लाना जी
कहीं गए हुए हैं क्या
क्या खुद उनको
अपना देश नहीं दिखता
दिखता है तो फ़िर
खुद आ क्यों नहीं जाते ।

एक बोला
आधी रोटी खाएंगे
फ़लाना जी को जिताएंगे
वोटर बोला
हम खद कमाएंगे
और पूरी रोटी खाएंगे
यदि फ़लाना जी
सो करोड़ लोगों की
आधी-आधी रोटियां खाएंगे
तो उनका पेट फ़ट जाएगा
क्या वो मर नहीं जाएंगे ।
=

*कबुत्तरपन*

आप
कबूतर की तरह
आंख मूंद कर
नहीँ बच सकते
आपको देखना ही होगा
जो तुम्हारी ओर 
बढ़ रहे हैं वे
पालतू बिल्लियोँ सरीखे
हरगिज नहीँ हैँ 
तुम्हारा ये कबूतरपन
उनकी पूंजी
और
आपकी मौत का
साक्षात कारण है !

या तो आपको
दौड़ कर
बिल्लियों से
निकलना होगा
बहुत दूर
या फिर
झपटना ही होगा
पलट कर उन पर !

याद रखना
आपका कबूतरपना
जंग मेँ 
हार की स्विकारोक्ति है
आपकी अपनी !

* चिंताएं *

दम तोड़ती सड़क के किनारे
फुटपाथ पर छितराए
कंकरीट पर तप्पड़ बिछा
अपनी गृहस्थी के संग
सांझ ढले से बैठा
कितना खुश है नत्थू !
रोटी आज नहीँ मिलेगी
जानते हैँ उसके परिजन
मग़र उनकी चिंताओँ मेँ
रोटी नहीँ
फिक्र है
नींद मेँ सोई अम्मा की
जो नहीँ है शामिल
आज रात हथाई मेँ ।

उधर
अघाए पेटोँ के ऊपर
अटकी है सांसे
गिरवी पड़ी है
कई दिनोँ की नींद
अज्ञात चोरोँ के यहां !

*पहाड़ बिफर गया*

ऊपर उठे-तने
पहाड़ोँ के शिखर
छू कर क्या बोली हवा
पूछने झुका दरख्त
चरमरा कर टूट गया
अंग अंग बर्फ रमा
बैठा मौन साधक 
साक्षात शिव सरीखा
कई कई नदियोँ से
अभिषेक पा कर भी
पहाड़ नहीँ बोला
बोला तो तब भी नहीँ
जब तूफानोँ ने झकझोरा !
पहाड़ उस दिन
बोला और सरक गया
जब उसके भीतर
कुछ दरक गया
अंतस की अकुलाहट
लावा दर्द घुटन का
बिखर गया
दूर जंगल मेँ
मौन पहाड़ बिफर गया ।

*मेरे भीतर*

मेरे भीतर
एक बच्चा
एक युवा
एक जवान
एक प्रोढ़
एक स्त्री भी है
स्त्री डरती है
बाकी मचलते हैँ
बुढ़ापे के जाल फैँक
मेरे भीतर को
कैद किया जाता है
इस जाल से भयभीत
मेरे भीतर के सभी
मेरा साथ छोड़ जाते हैँ
पासंग मेँ रहती है
एक स्त्री
जो हर पल
डरती रहती है !

**आओ खत लिखेँ**

मोबाइल और मेल से
समचारोँ का
नकद भुगतान रोक कर
आओ 
आज फिर से खत लिखेँ
खत मेँ 
सारी गत लिखेँ
खुशियां लिखेँ
गम लिखेँ 
शिकवे लिखेँ
शिकायत लिखेँ
फिर करेँ इंतजार
खत के पहुंचने का
कुछ वक्त मगर
जरूर लगेगा
आओ


तब तक सोचेँ
शायद तब तक
खुशियां फैल जाएं
दसोँ दिशाओँ मेँ
गम दम तोड़ जाएं
हमारे शिकवे शिकायत
हमारी ही
नासमझी घोषित हो जाए !

आओ उड़ाएं
अपनी अपनी छत से
एक एक कबूत्तर
जो ले कर जाए
अपनी चोँच मेँ
प्रीत की पाती
जिसे बांटे धरा पर
कुछ ले जाएं
बादलोँ के पार
जहां हो सकते हैँ
हमारे अंशी
मानव वंशी !

*हर बार हारत सूरज *

अनन्त काल से
अंधकार शाश्वत
अटल स्थिर
प्रकाश आता
झपटता अंधकार पर
कुछ काल रहता
आगोश मेँ ले उसे
फिर जाना ही होता है
क्षरित हो 
अस्ताचल मेँ
हर बार जीतता है
अंधकार ही !

प्रकाश होता है
उम्मीद हमारी
इसी लिए गाते हैँ
हम गीत उसी के
यह जानते हुए भी
कि अटल है अंधकार
हम उगाते रहते हैं
फसल प्रकाश
जिस मेँ लगता नहीँ
फल प्रकाश का !

गर्भ का अंधेरा
याद रहता नहीं
याद आता है
सुबह से शाम का
तमतमाता सूरज कल का
अंधकार से जूझता
हर बार हारता सूरज !

*पानीदार पानी*

मेरी प्यास के लिए
पानी नहीँ आया
पानी लाया गया
अपने पानी के लिए !

पानी के लिए
लोग दौड़े
पानी के लिए ही
अड़े-भिड़े
लड़े-मरे
कहीं पानी देखा गया
कहीँ देख लेने की बात हुई
कहीँ पानी बचाया गया
कहीँ कही उतर भी गया !

पानीदार चरित्रों की
कहानियां लिखी गईं
इतिहास रचा गया
पानीदारों का
हम तरसते रहे
प्यास भर पानी को !

पानी तो
हम भी बचाते रहे
बचा नहीँ मगर कभी भी
हमारा पानी
कभी भी


पानी की संज्ञा में
आंका ही नहीं गया ।

अब वे
लाए हैँ समाचार
दूर देश से ;
अगला युद्ध
पानी के लिए होगा
इस लिए पानी बचाओ !

मां कहती है
मैंने तो
घर के भीतर भी
भयानक युद्ध देखे हैँ
पानी के लिए
अब तो
उतरने लगा है
तांबे के गहनों से
सोने का पानी
जो कभी चढ़ाया गया था
घर के पानी के लिए !

*पेट दिखाता है दिशाएं*

मैं पंछी
कहां बैठता हूं
एक डाल 
उड़ उड़ जाता हूं
जंगल दर जंगल
पेड़ दर पेड़
शाख दर शाख
इस में
उपक्रम चाहे पंखों का है
हौसला तो पेट ही देता है !

पेट दिखाता है दिशाएं
मौन आंखे
देखती रहती है आगत
पंख फड़फड़ा कर
उड़ा ले जाते हैं
दूर देश
याद रहता है अंतस को
अपना आसमान
अपना पेड़
अपना घौसला
अपनी टहनी
अपनी वह ज़मीन
जिस पर खड़ा है
अपने वाला
वह बूढ़ा पेड़ !

चौंच का भक्षण वही
जो पेट की चाहत
रसना का वाक वही
जो ज़मीन की चाहत
ज़मीन ने उचरवाया
राम-राम !
अल्लाह-अल्लाह !!
वाहे गुरु-वाहे गुरु !!!
यीशु-यीशु !!!!
रसना ने उचारा !

पेट का पेटा भरते ही
गुलाम हुई स्वक्रियाएं
पंख छोड़ गए साथ
मीत हुए क्षुधा के
मूक संवेदानाएं
निहारती रहीं अंतस में
अपना पेड़-अपना घौसला !

*बच्चा बन जाएं*

आओ आज फिर
बच्चा बन जाएं
कुछ तोड़ें
कुछ फोड़ेँ
तोड़ फोड़ कर 
फिर से जोड़ें
जुड़ जाए तो जुड़ जाए
नहीं जुड़े तो मचलें,रोएं !

सरदी की बरखा में
नम हुई मिट्टी को
पैरोँ पर थाप-थाप
एक एक घरोंदा बनाएं
अपने घरोंदें पर इतराएं
साथी का सुन्दर हो तो
तोड़ें और भाग जाएं
अपना टूटे तो रोएं चिल्लाएं
सुबक सुबक नाक पौंछते
अपने घर को जाएं ।

लगी ठंड पर
खाएं डांट अम्मा की
रूठें और कुछ ना खाएं
दादी के हाथों
पीएं दूध सूखे मेवे वाला
सो जाएं सुन कर
फिर झूठी कहानी
इक थे राजा रानी वाली ।



सब कुछ भूल भाल कर
उठें भोर में
लिपट अम्मां से
प्यार जताएं
नहा धो कर
करें नाश्ता
उठा कर बस्ता
निकलें घर सै
छेड़ छाड़ का फिर से
रच डालें इतिहास
टन-टन की घंटी भीतर जाएं
टन-टन की घंटी बाहर आएं
लौटें घर को धूल सने !

दादा दादी लाल कहे
अम्मा बोले राजा बेटा
बहिना छुटकी की गोदी
बड़की दीदी का मिले दुलार
आओ फिर से
बच्चे बन जाएं इकबार !

बेटी का खत

नेट ओ मोबाइल के
इस शातिर युग में भी
खत आया है बेटी का
लिखी है बेटी ने
खत में गत अपनी ।

सच कहते थे पापा तुम ;
आती नहीं नींद 
रात रात भर बिस्तर में
छत निहारूं
देखूं आंगन
आंखें पसरी जाती हैं
सोए बच्चे
दिखते बढ़ते
बढ़ते खर्चे
गली गली में
होते चर्चे
दिखता खर्च त्यौहारी का !

सास बुढ़ाई
ससुर मुहाने
घर में लगते
सब बतियाने
गंगा चलो
चलें नहाने
सोने की सीढ़ी चढ़ें बडेरे
हाथ खोल कर
बढ़ लो आगे
बोला पंड़ित लगा गुर्राने !

दामाद आपके
बैठे ठाले
खर्ची खूटे आते घर
घर मेँ घुसते लगता डर
काम धाम हाथ नहीं
आमद की कोई बात नहीं
ना झगड़ें हम
ऐसी कोई रात नहीं
दुख मत करना पापा तुम
वैसी ही हैं बातें सारी
जो तुम अम्मां से करते थे
नई तो कोई बात नहीं !

नाती आपका
आया खा कर फेरे
बैठा चौबारे दे कर डेरे
कोई कलमुहा आवारा
नातिन के देता फेरे
यही चिंता रहती घेरे
पापा पड़ी पार आपकी
मेरी मुश्किल लगती है


इस दुविधा में पापा
रात बैठ बैठ गुजरती है ।

संकट सारे
मेरे द्वारे
दौड़ दौड़ क्यों आते हैं
घर में
सोते सभी चैन से
आंसू मेरी आंख भिगोने
क्यों किनारे आते हैं ?
छोड़ो पापा क्या गिनाऊं
दुख वही तो सारे हैं
जिनको ढोते ढोते
तुमने दिन उम्र के गुजारे हैँ
जाओ छुप कर सो जाओ
तुम भी रो कर हो लो हलके
मैंने तो दो पाव उतारे हैं !

बुढ़ापा हुआ बीमारी

तूं जनमा मैं बलिहारी बेटा।
वो खुशियां अब मैं हारी बेटा ।।
छोड़ा घर देश गांव भी अपना ।
ऐसी भी क्या लाचारी बेटा ।।
ममता छोड़ क्या ओहदा पाया ।
हो गए बड़े तुम व्यपारी बेटा ।।
जोड़ जोड़ सपने महल बनाया ।
लगती नहीं अब बुहारी बेटा ।।
बिना सहारे अब पांव न उठते।
बुढ़ापा हुआ बीमारी बेटा ।।
दूर देश मेँ जो जाया पोता ।
सुनी न आंगन किलकारी बेटा ।।
बहू आती घर आंगन सजाती ।
सध जाती दुनियादारी बेटा ।।

प्रीत

आपके किसी श्रम की
पगार नहीं होती प्रीत ।

तुम हंसे
मैं हंसा
दोनों मुस्कुराए
चल भी लिए
साथ-साथ
बहुत दूर तलक
यूं साथ होने का
होती नहीं आधार प्रीत !

मैले को उजला
अंतिम को पहला
कह मानली बातें
कर दिया समर्पण
तन मन सारा
कह दिया
तूं जीता मैं हारा
होती नहीं जीत-हार प्रीत !

मन के बदले मन
दिल के बदले दिल
दे डाला
हम ने तुम ने
तुम ने मारा
अपना मन
मैंने मारा
अपना मन
ले लो
दे दो
होता नहीं व्यपार प्रीत !

प्रीत बसती
भीतर कोठे
न दिल में जाती
न छूती दिमाग
लग जाती है
लगाई न जाती
आग प्रीत की
सुनी-सुनाई ना जाती
बज जाती बिना साज
ऐसी होती प्रीत राग
न जाने कौन रचे
कोई न सृजनहार प्रीत ।

मीठी लगती
प्रीत की बातें
कड़वी भी लग जाती
बातें सारी गुजर जाती
छन छन आती
बहुत सुहाती
आती जब लौट
अपनी मरजी
करती फिर संचार प्रीत !

*पुष्प और पत्तियां*

शाख पर साथ रहे
फूल और पत्तियां
लड़ते रहे साथ-साथ
मनचले झंझावातों से
फूल का रंग
चटख लाल
बहुत भाता
उसे अपलक निहार
मदमाती रहतीं पत्तियां
फूल भी मदमस्त सा
बीच पत्तियों के
करता मानो
रासलीला उपवन में
ना जाने कब यकबयक
पुष्प साथ छोड़ गया
या फिर कोई मनचला
शाख से तोड़ गया !

सौत थी हवा
आती नित उपवन में
छू-छू जाती पुष्प को
इधर-उधर डोलती
उन्मुक्त सी चहकती
आजकल महकती है
उसी ने किया होगा
वरण पुष्प का
सांय-सांय कसमसाती है !

*मौन वांछनाएं*

सकल जगत का
हो अगर मनवांछित
तौ अट जाएगा
जग समूचा
निज वांछनाओं के 
असीम अंबार से
फिर 
वांछना निर्लिप्त पांव
कहां कोई
रख पाएगा ?

मानवी वांछना की
सकल पूर्ति के बाद
फिर नहीं जन्मेंगी
नवीन वांछनाएं
इसकी कौन करेगा
अंतिम घोषणा
और फिर यह
बताए भी कौन ?

क्यूं दबी रहती हैं
कुछ वांछनाएं
मन के भीतर मौन
जिसकी पूर्ती के लिए
टूट ही जाते हैं
बहुत से मौन मन !

सौन्दर्य

सृष्टि में सौन्दर्य 
स्थाई भाव नहीं
उपस्थिति है
कुछ समय के लिए
जैसे लता के शीर्ष पर
चटख लाल पुष्प
जो नहीं था कल
आज है
कल रहेगा या नहीं
कौन बताए
जबकि मौन है कायनात!

देह हमारी
धारती है सौन्दर्य
देह की मौत
मौत है सौन्दर्य की ?

*अंतस की जाजम*

अंतस की जाजम 
पसरी मनगत सारी
मुखरित होने ढोती
अविरल लाचारी
जाजम का उलझा
कुल ताना-पेटा 
तार-तार है भारी 
मन की मन ही
बुने-उधेड़े
व्यथा गोटा-तारी
मन की उधड़ी
जाजम पर अब
लगे ना टांका-कारी
मन की सुन ले
मन ही कोई
वरना है लाचारी !

हकीक़त

रात और दिन
सामना था
मौन मगर प्रत्यक्ष
एकाधिक सपनों का
जो आ धमकते है
हकीकत में !

हकीक़त में
सपनें थे
सपनों में मगर
हकीक़त नहीं थी !

. *पेड़ की चिंता*

इधर शहर में
नित नए-नए 
कविता संग्रह
छप-छप आ रहे थे
उधर जंगल में
पेड़ बतिया रहे थे
अब हमारा बचना
बहुत मुश्किल है
हम से कहीं जादा
कवि उग रहे है
अब कविता संग्रह बिकेंगे
हम जादा दिन
धरती पर नहीं धिकेंगे !

सपना लिख दे

आंखों में कोई सपना लिख दे ।
सपनों में कोई अपना लिख दे ।।
लिख दी ढेरों कविताएं मैंने ।
आ अब तो उनका छपना लिख दे ।।
देवों जैसी है शक्ल ओ सूरत ।
मेरा भी अब तो जपना लिख दे ।।

बहुत दूर से आया हूं

वक्त गया है
या भाग गया 
जाते वक्त
वक्त ने
वक्त दिया या नहीं
कह तो नहीं सकता
वक्त के निशान मगर
आंखों में
झिलमिलाते जरूर हैं ।

बहुत दूर से
आया हूं मैं चल कर
जितना भी अब हूं
उस से भी पहले था
मैं कहीं और
वक्त तो
उस से भी पहले था
आज भी है
मैं ही भागा हूं।

जहां हूं
वहां आ कर
छुपाई है मैंने
अपनी पहचान
कोई तो बताए
मैं कहां से आया हूं
अब हूं तो
पहले भी
जरूर रहा होऊंगा
वक्त के साथ-साथ
क्यॊ कि मुझे में
आज भी नहीं है साहस
वक्त से


आगे-पीछे होने का ।

मेरे आंगन एक दोपहरी

[ यह प्रेम कविता नहीं है ]

फ़ट गया था आसमान 
तुम ने जब मौड़ लिया था
इधर से उधर
अपना बातूनी मुखडा़
धारण कर लिया
असीम मौन
जैसे चुक गए थे
तुम्हारे शब्द कोश से
"प्यार" के नाती
कोमल वाचाल शब्द ।

दूर तक चलने का
संकल्प था तुम्हारा
थाम कर हाथ
कदम से कदम मिला
बीच अधर में
पांव तुम्हारे
थक क्यों गए फ़िर
जबकि शेष है अभी
प्यार का सफ़र ।

तुम भूलते हो शायद
कितनी अपूर्ण हो जाती है
व्यापक पूर्णता लिए पंक्तियां
जब हट जाता है
कोई संयोजक शब्द
जैसे कि प्यार
इस एक शब्द के हटने पर
टूट जाता है दिल
देह होने लगती विदेह
हो जाती है अलसुबह भी
सूरज पर कालिख पुती सांझ सी
जब कि कभी
तुम्हारी एक मुस्कान पर
निकल आते थे
कई-कई सूरज एक साथ
और हो जाया करती थी
मेरे आंगन
एक चमदार दोपहरी !
=====
=

नया सूरज

आज फिर 
आया है सूरज
सहमा हुआ सा
मेरे घर की 
छत लांघ कर 
उदास सा
कंकरीट के
तिमंजलों से
बच कर
बादलों से लाया
मानो उधार में
धूप मांग कर !

आखिर
कितने दिन
रहेंगे हम
इस उधारी पर
आओ-उटो !
एक नया सूरज
उगाएं अपने लिए !

बेचारे

जो गए थे लाने
किसी के लिए
तोड़ कर चांद-तारे
वे आज पड़े हैं
खुद टूट कर बेचारे !

सोना

.
जो दिन भर 
कहते रहे
सोना है 
सोना है
वो रात भर 
करवटें बदलते रहे 
घर के बाहर
सोना लूटने
चोर भटकते रहे !

* प्यार : पांच चित्र *

1.
उस ने कहा
मैं तुम से 
बात नहीं करती
बात करते-करते
बात बढ़ जाती है
बात बढ़ जाती है तो
प्यार हो जाता है
सुना है ये प्यार
बहुत दुख देता है
मुझे दुख का जनक
नहीं चाहिए !
2.
गुरू जी ने
कहा था एक बार
खतरनाक होता है
ये कमबख्त प्यार
कभी मत करना तुम
किसी से प्यार
हो गया है तो समझो
तुम ने कह दिया ;
आ बैल मुझे मार !
3.
उस ने कहा-
कहते सुना है
प्यार में
नींद नहीं आती
तो फिर
मैं क्यों करूं प्यार
मुझे तो अभी
चैन सै सोना है यार !
4.
मैंने कहा
मुझे भी तो
नहीं आती नींद
प्यार तो नहीं मगर
इसका सबब
उस ने कहा
मौत के कारण
और भी तो हैं
तुम उनको ढूंढो
दोषी हर बार
नहीं होता प्यार !


5.
प्यार में होता है
छुपा हुआ डर
प्यार था
तभी तो आया था
डरते-डरते
कम फासले से भी
किसी का खत
जिसे तुम ने
उठाया था
डरते-डरते
छुपाया था
अपने वस्त्रों में
अज्ञात स्थान पर
डरते-डरते
खत में प्रेषक का
केवल नाम था
या फिर लिखा था
ठीक-ठीक कोई समय
उसको पढ़ कर
कितना डर गई थी
उस दिन तुम !

* इंतजार *

जो नहीं है अब
उस के इंतजार में
रात-रात भर जागना
जागने के ऐन वक्त
बुझे मन सो जाना
काम के वक्त
उचक कर जाग जाना
दिन भर एकांत में
खुद से बातें करना
मुस्कुराते हुए रोना
छुप कर आंखे पौंछना
निजी क्षणों के
इस अकथ क्रम को
कौन देखता है !

दुख से दूर घूमते
अपने सुख में झूमते
चैन की नींद सोने वाले
निकट के रिश्तेदार
भाई-बन्ध-मित्र वर्ग के
विचित्र लोग
उस के दुख में
नाटक देखते हैं
नींद की गोलियों से
बेफिक्री तक की सलाह
जाती हुई सरकार की तरह
मुफ़्त बांट जाते हैं
उन्हें लगता है
हम ने बंधवा दिया
स्थ्याई ढांढ्स !

उधर रात फिर
घिरने लगती है
रैंगने लगता है दर्द
सिहरने लगता है
बचा हुआ नेह
रिसने लगती हैं
अंतस से स्मृतियां
फिर से हो जाता है शुरू
नींद नहीं आने का
स्थाई होता उपक्रम !

*हम भोले नहीं थे*

कितने भोले थे
बचपन में हम
बहल जाया करते थे
खिलौनों से हम 
पापा बन जाते थे
कभी-कभी घोडा
मां हो जाती म्याऊं
हम बजा कर ताली
कितना खिलाते थे !

अब जब
खेलते हैं लौग
हमें खिलौना बना कर
सरेआम हम से
हम कितने उदास हैं !

अब
समझ आता है
दूसरों की
चालाकियां देख कर
बचपन में हम
भोले नहीं
चतुर-चालाक थे !

*बीज बंजारे*

बीज था 
उड़ना बेचारा
उड़ा
गिरा
पत्थरों में
हारी नहीं
पल भर भी
हिम्मत उस ने
पत्थरों में मिली
थोड़ी सी नमी
अंकुराया
बढ़ा
खिला
फला
पका
आई हवा
चला गया
अंतत: उसके संग
अपने अंशियो को
ले कर साथ
पत्थर फिर
बंजर हो गए
बीज बंजारे 

*मृत्यु : पांच हाइकु*

1.
दृश्यमान था
जगत से ओझल
कथ दी मृत्यु !
2.
चलाचली में
रुकना चल कर 
यात्रा अंतिम !
3.
मुख से हटा
नाम का उच्चारण
कह दी मृत्यु !
4.
घर में लौटी
जब केवल काया
मान ली मृत्यु !
5.
सब पुकारें
बोली जब ना देह
मृत्यु ही बोली !

*वज़ूद का गीत*

दिन भर की 
थकान उतारने के लिए
कुछ समय तक

अंधेरे में सो कर
बिस्तर छोड़ कर
उठ जाने से
नहीं हो जाती
सुहानी भोर
भौर के लिए
अपने आकाश में
सूरज का उगना
बहुत जरूरी है !

सोना-जागना तो
जरूरत है तन की
आओ , मन की सुनें
एक सूरज उगाएं
आसमान के ठीक बीच में
सब के ऊपर
ताकि फिर न हो
कभी काली रात
अंधेरा कौने लग
थर्राता रहे
तुम्हारे वज़ूद का
गीत गाता रहे !

*आंखों में झील*

बोल कर हसना
बहुत आसान था
हस कर बोलना
बहुत कठिन
तुम मगर बेखौफ
हसते रहे
दोनों ही स्थितियों में
चेहरे पर भी कभी
उभरे ही नहीं
दर्द-ओ-सकून
भले ही नम थीं
तुम्हारी आंखें !

सच बताना
तुम्हारा अंतस भी
क्या बेखौफ है
इतना ही
जितना है बाहर
तो फिर
कहां से उतर आई
आंखों में झील
मचलती हुई ?

* होना होता है होना*

होना
हर सू होना है
जो चलता रहता है
अपने ही तरीके से
होने के लिए होना
बिन रुके अनवरत 
हर पल-हर दिश !

इसी बीच
किसी की वांछनाओं को
परास्त कर
हमारी वांछनाए भी
चाहती हैं होना
इनके बीच उभरता
द्वंद्व भी तो
होना ही है होने का !

होने का न होना भी
होना ही है
अनहोना नहीं
जैसे कि चाहने पर
रात का
बड़ा-छोटा न होना
या फिर सब का
ढल जाना
हमारे अनुरूप
जीवन और मृत्यु
कुछ बड़े जरूर हैं
होने से मगर
नहीं है कत्तई विलग !