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रविवार, अक्टूबर 21, 2012

राजस्थानी कविता का हिन्दी अनुवाद

[] प्रीत []

हम नें भी की
तुम नें भी की
प्रीत ।

हम नें भी पाली
तुम नें भी पाली
रीत ।
परन्तु तुम
न छोड़ सके
रीत ।
और हम से
न छूटी
प्रीत ।

आज हमारे पास है
प्रीत ही प्रीत
परन्तु तुम पाले हुए हो
केवल
रीत की प्रीत !

सोमवार, सितंबर 20, 2010

पिताश्री को समर्पित कविताएं


पिताश्री को समर्पित कविताएं

मेरे पिताश्री श्री रिद्धकरण पुरोहित
का 92 वर्ष की वय में 5 सितम्बर 2010 को
रात्रि 7.30  बजे देहावसान हो गया ।
वे राजस्थानी लोकसाहित्य के मर्मज्ञ थे ।
स्वाध्याय उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा था ।
हिन्दी की स्थापना तथा राजस्थानी भाषा को
आठवीं अनुसूची मे शामिल करने की
मुहिम से वे गहरा जुडा़व रखते थे ।
उनकी चिरस्थाई स्मृति को समर्पित है
 मेरी तीन राजस्थानी कविताएं
जिनका अनुवाद मेरी पुत्री
अंकिता पुरोहित ने किया है !

पिताजी-१



कितनी कम थीं
जरूरतें !


फ़टे कपड़ो में भी
जी लेते थे हम
सालों-साल
बिना नहाए
साबुन से !


कितनी आसानी से
बताते हैं पिताजी
बदहाली को
खुशहाली में
बदल कर !


पिताजी-२


आजकल के नौजवान
हमेशा
थमाए रखते हैं
अपनी कलाई
नाडी़ वैद्य के हाथों में !


हमारे वक्त में
ऐसा नहीं था
बला के दिलेर होते थे
हम
जब जवान होते थे !


यह बताते हैं पिताजी
दमें की बलगम को
कंठ में उतार कर !
बडी़ माता के कारण
फ़ूटी आंख से
बहते पानी को पौंछ
घुटनों पर
हथेलियां रख
उठते हुए !


पिताजी-३


रिटायरमेंट के
बीस साल बाद भी
नौकरी पर
कार्यग्रहण करने के दिन
खरीदी बाईसाइकिल को
झाड़ते-पूंछ्ते रहते हैं पिताजी ।


यात्रा पर निकलते वक्‍त
सौंप-समझा
ताकीद कर
जाते हैं
बूढी मां को ।


कभी-कभी
बाज़ार भी ले जाते हैं
हाथों में थाम कर
लौटते हैं
हरी सब्जियों से भरे
थेले को
हैंडल पर लटकाए
पैदल-पैदल
धीरे-धीरे !

रविवार, जुलाई 11, 2010

ओम पुरोहित ‘कागद’ की सात राजस्थानी कविताओं का हिन्दी अनुवाद

बात तो ही (राजस्थानी कविता संग्रह)

हिन्दी अनुवाद-अंकिता पुरोहित ‘कागदांश’

१.पालते हैं धर्म


गांव में
अकाल है
साक्षात शिव रूप
नमस्कार है !


मेहमान होता है
भगवान
भूख पधारी है
पसरी है
आंगन में
स्वागत है !


दादा जी का अस्थिपंजर
खुराक के बिना
सर्दियों में
करता है नृत्य
और साथ देते हैं
पिताजी भी !


पोतों की
अकाल मृत्यु पर
दादी की आंखें
बहाती हैं
गंगा-यमुना
झर-झर
दादी नहाती है
हमेशा
करती है कीर्तन ।


मां के घुटने
गाते हैं
हरीभजन
बहुएं
अलापती हैं संग में
हमेशा ।


पूरे घर में
बरसात की
वंदना है
भावना है
नहीं मरे
कोई जीव-जन्तु
अन्न-पानी के अभाव में।


रखते हैं मर्यादा
पालते हैं धर्म !


२.मन करता है


मन
कुछ न कुछ
करता ही रहता है ।


मन करता है
पंखुड़ी बनूं
कली बनूंड
फल बनूं
अथवा
वह टहनी बनूं
जिस पर लगते हैं
पंखुड़ी
कली
फ़ल ।
और फ़िर करता है
बनूं भंवरा
सूंघूं फ़ूल
बेअंत
कभी करता है
बनूं रुत
केवल बसंत !


३.चांद नहीं दिखाया


उन्होंने
बार-बार
हमें
चांद पर
ले जाने के
स्वपन दिखाए
परन्तु
एक बार भी
चांद नहीं दिखाया ।


उस समय तक
हम
जिसको उन्होंने
चांद कहा
उसको ही
चांद कहते रहे ।


जिस दिन
हमारे ऊपर
चांद निकला
उस दिन
घर से बाहर
निकलने की
सख्त मनाही थी


४.लोकतंत्र


रामलाल !
तूं गाय जैसा आदमी है
इस लिए
घास खा !


वे बेचारे
शेर जैसे आदमी हैं
मांस खाएंगे
तेरा !


देखना !
भूखा न सोए
लोकतंत्र में ।


५.केवल मैं जानता हूं


अपनी
ज़मीन से
जुड़ा रहना
कितना जरूरी है
आप जानते हैं
या मैं जानता हूं
परन्तु
मेरे पैरों तले
ज़मीन कितनी
चिकनी है
फ़िसलने का
खतरा कितना है
यह केवल मैं जानता हूं
आप कहां जानते हैं


६.अमानत


पागल थे
हमारे पुरखे
जो दे गए
भूख के कारण
अपनी कंठी-माला ।


दंड़वत प्रणाम
ठाकुर जी !
लौटा दो
हमारे पुरखों की
वह अमानत
उसी के बल
हो सकता है
पेट पालने का
कोई जुगाड़ !


७. बात तो थी


चिड़ी बोली
चड़-चड़ !
चिड़ा बोला
चूं !
चिड़ी बोली
चूं-चूं !
चिड़ा बोला
चीं !
चिड़ी बोली
चीं-चीं !
दोनों उड गए
एक साथ
फ़ुर्र
बात तो थी।