मंगलवार, मई 18, 2010

ओम पुरोहित कागद की हिन्दी तीन कविताएँ

ओम पुरोहित कागद की तीन हिन्दी कविताएँ

(कविता संग्रह धूप क्यों chedh

ऋतुराज !पेड़ों की नंगी टहनियां देख,
तू क्यों लाया
हरित पल्लव
बासंती परिधान ?

अपने कुल,
अपने वर्ग का मोह त्याग,
,ऋतुराज!
विदाउट ड्रेस
मुर्गा बने
पीरिये के रामले को
सजा मुक्त कर दे।
पहिना दे भले ही
परित्यक्त,
पतझड़िया,
बासी परिधान।

क्यों लगता है लताओं को
पेड़ों के सान्निध्य में ?
उनको आलिंगनबद्ध करता है।
अहंकार में
आकाश की तरफ तनी
लताओं के भाल को
रक्तिम बिन्दिया लगा,
क्यों नवोढ़ा सी सजाता है ?

ऋतुराज !
बाप की खाली अंटी पर
आंसू टळकाती,
सुरजी की अधबूढ़ी बिमली के
बस,
हाथ पीले कर दे।
पहिना दे भले ही
धानी सा एक सुहाग जोड़ा।


तूं कहां है-
डोलती बयार में,
सूरज की किरणों में ?
कब आता है ?
कब जाता है
विशाल प्रकति को ?
लेकिन तू आता है
आधीरात के चोर सा ;
यह शाश्वत सत्य है।

तेरी इस चोर प्रवृति पर
मुझे कोई ऐतराज नहीं,
पर चाहता हूं ;
थोड़ा ही सही
ऋतुराज
खाली होने के कारण,
आगे झुकते
नत्थू के पेट में कुछ भर दे।
भर दे भले ही,
रात के सन्नाटे में
पत्थर का परोसा।



मैं देशद्रोही नहीं हूँमैं मानता हूं
मैं स्वतन्त्र भारत की देह पर फोड़ा हूं,
लेकिन मैं अजेय नही हूं।
बस,अपने भीतर दर्द रखता हूं,
इसीलिए अछूत हूं,
दोषी हूं।
मैं अक्षम नहीं हूं,
भूखा हूं।
भले ही आपने मुझ पर-
गरीबी की रेखापटक कर,
छुपाने का असफल प्रयास किया है।
फिर भी मैं
तुम्हारे लिए भय हूं,
कि, कोई दबा पड़ा है।

सामने सही
अपने ही मस्तिष्क में,
मुझ से हाथ मिलाते हो तुम।

मैं देशद्रोही नहीं हूं ;
भले ही मैं,
राष्ट्रीय ध्वज पहन लेता हूं।
क्यों कि मैं नंगा हूं।

मैं देशद्रोही नहीं हूं ;
चाहे मैं-
राष्ट्रीय गीत पर खड़ा नहीं होता,
क्यों कि, मैं
फावड़ा थामे कढ़ाई पर झुका हूं,
और पीठ पर समय
भूख के चाबुक लिए खड़ा है।

मैं बे-बस हूं।
तभी तो-
मैं अपना श्रम बेचता हूं।
मैं न्याय क्या मांगूं?
न्याय संविधान में छुपा है।
मेरी पीठ कमजोर है।
संविधान को ढ़ो कर
अपने गांव नही ला सकता।

मैं निराशावादी हूं।
तभी तो-
मैनें अपनी अंगुली,
तुम्हारे मुंह में दे रखी है,
खून चूसने के लिए।

मै इंसान नही हूं;
वोट हूं।
तभी तो-
आश्वासनों पर लुढ़कता हूं।
पेटी में बंद हो,
पांच साल तक-
शांत पड़ा रहता हूं।

मैं मॉं हूं!
तभी तो सह लेता हूं,
जमाने भर के कष्ट
तुम्हारी खुशी के लिए।


पत्थरों के शहर मेंवो जो दूर पहाड़ी पर
बड़ा सा मंदिर है
उसका देवता
अपनी बेजान दृष्टि के लिए
हीरे की आंखे रखता है
पत्थर के ठोस पेट के लिए
हजारों मन चढ़ावा लेता है
फिर भी भूखा सोता है।
चांदी का छत्तर,
बिजली का पंखा,
चंदन की खड़ाÅ,
रत्न जड़ित रक्त वस्त्र,
सचिव सा पुजारी धारण कर
ऐंठा रहता है
किसी चोर द्वारा कुरेदी गई
अपनी आंख
सप्ताह भर में
वैसी ही पा लेता है।

उधर उन पांच कोठियों के पीछे,
कीचड़ के गढ्ढों के पास
जो टाट सरकण्डे की झोपड़ी है,
उसमें सजीव किसनू रहता है।
आंख में आंसू,
पेट में भूख,
नंगे पांव,
चूती हूई छत,
आंधी के झौंके सह लेता है।
उसका नत्थू ;
आक को छेड़ते हुए अंधा हो लिया
डाक्टर के यहां
रोजाना लाइन में खड़ा हो
उम्र भर की कमाई खो
पत्थर की आंख भी नहीं ला पाया।
मांगने पर दुत्कारा गया।
पत्थरों के शहर में,
पत्थर की आंख के लिए मारा गया।
बस इतना सा अपवाद है,
वरना यहॉं पूरा समाजवाद है।

रविवार, मई 09, 2010


आंतरिक अकुलाहटयह लम्बी कविता ख्यातनाम शायर राजेश चड्ढ़ा के आग्रह पर मेरे कविता संग्रह "धूप क्यों छेड़ती है" (१९८६) से। कविता के साथ ख्यातनाम कार्टूनिस्ट मस्तान सिंह द्वारा बना कर भेंट किया मेरा कैरीकैचर।
आंतरिक अकुलाहट
परिवार नियोजन का पट्ट
आपने टांगा है
उस गरीब की झोंपड़ी पर।
‘दो या तीन’ का नारा
जुबान पर उसकी
सुराख निकाल कर टांग दिया है।

बच्चों की लम्बी भीड़ देख कर
तुम हंसे जरूर हो।
क्या कभी इसकी वजह पूछी है,
उस बिना छत की-
झोंपड़ी में रहने वाले सरजू से ?
मैने पूछा है!
तमतमाती धूप में
बोझा ढोने वाले उस ताड़ से।
वह बोला था ;
सा‘ब
आजादी की धूप में
अधिकारों की भूख में
हजारों पेट की क्षुधा मिटा
दिन भर हजारों मन ढो कर
तीन जनों के लिए
तीन रोटी जुटाता हूं।
इस बीच
यदि अपनी पीठ को
धनुषाकार में पाता हूं,
तो मखमली गद्दे कहां से जुटाउं ?
बस चमेली के बल,
पीठ के बल निकाल लेता हूं।
क्या करूं।
क्या दोष है मेरा ??
चम्पेली और सीतू
कम्बख्त मूर्ख है,
जो भूखी मां के पेट को छोड़ कर
इस भूखी दुनिया में आ गये।
भूखों मरेंगे साले!
ये भी भोगेंगे,
कोई और भोगेगा
इनके बाद।

चमेली भी बोली थी ;
सा‘ब
दिन भर
खाली हंडिया में--
कड़छी हिलाते-हिलाते
हाथ तो ऐंठ ही जाता है!
भूखे बच्चों का रोना-
बन्द तो करना ही होता है।
वो,जो रंगीन भीड़ है,
उसको-
गरीब बच्चे का रोना
कष्ट देता है।
बस,
उनका गाल रंगना पड़ता है।
ऐसे में हाथ ऐंठ ही जाता है।
यदि सीतू का बाप,
अपनी पीठ के बल निकालता है,
तो मैं भी अपने हाथों की ऐंठन
उसके पिंजराये सीने के इर्द-गिर्द
अपनी बाहें लपेट कर-
निकाल लेती हूं।
क्या दोष है मेरा ?

कल तक मैं बच्ची थी,
साड़ी बांधना सीखी थी
कि, सीतू आ गया,
सीतू आया नही
कि चम्पेली आ गई।
अब एक और मेरे पेट की भूख में
तप रहा है
बाहर आने को।
सा‘ब!
ये ‘दो या तीन’ का पट्ट
हमें दे दो ?
खुली छत है,
ढंप जायेगी,
इस बार-
सर्दी बे-औलाद चली जायेगी।
कुछ तो बोली थी
चमेली की पड़ौसिन झुनिया।
सा‘ब!
मैने परिवार नियोजित करने की सोच
कॉपर-टी लगवाई थी।
ये बिजिया कमबख्त
जन्म से पहले की भूखी थी
गर्भाशय में घुसते ही,
कॉपर-टी खा गई।
तभी तो-
कॉपर-टी सी बाहर आ गई
....ना मुराद.......अभी भी भूखी है।
गली की आवारा कुतिया के-
स्तन काटती है।
सामने वाले सा‘ब की कोठी पर,
जूठे बर्तन चाटती है
और
डांट खाकर,
दोपहर उनके ही फर्श पर काट लेती है।
कमबख्त,
रात भर मेरे खाली पेट पर,
लातें मार कर
बुढाये नन्हे हाथों से
मेरे स्तन ढूंढती है।
आकारोंकी अनुपस्थिति पा,
मुझे छोड़
सुबह,
कुतिया के सीने से लग कर रोती है।
मेरे हिस्से की रोटी से,
एक रोटी ले,
उस कुतिया को देती है।
कमबख्त, उसकी आंखों में
प्यार,
दुलार,
ममता
और मेरा अक्स तलाशती है।
मुझे दुत्कार,
उसे पुचकारती है।

सा‘ब
मुझे रोटी नहीं
मेरी ममता को
ममत्व का अधिकार दे दो!
रिक्त आंखों को दे दो!
किन्ही ऐसे क्षणों के लिए
वात्सलय के दो आंसू !!

मंगलवार, अप्रैल 20, 2010

एक कविता का वाचन- "थार में प्यास" / कवि श्री ओम पुरोहित "कागद"

जब लोग गा रहे थे
पानी के गीत
हम सपनों में देखते थे
प्यास भर पानी।
समुद्र था भी
रेत का इतराया
पानी देखता था
चेहरों का
या फिर
चेहरों के पीछे छुपे
पौरूष का ही
मायने था पानी।

तलवारें
बताती रहीं पानी
राजसिंहासन
पानीदार के हाथ ही
रहता रहा तब तक।

अब जब जाना
पानी वह नहीं था
दम्भ था निरा
बंट चुका था
दुनिया भर का पानी
नहीं बंटी
हमारी अपनी थी
आज भी थिर है
थार में प्यास।



नीरज दइया लिखते हैं- "इसै समै / कविता बांचणौ / अनै लिखणौ / किणी जुध सूं स्यात ई कम हुवै ।" (कविता) ओम पुरोहित कागदरा च्यार कविता संग्रह प्रकाशित हुया है- अंतस री बळत(१९८८), कुचरणी (१९९२), सबद गळगळा (१९९४), बात तो ही (२००२) अर आं रचनावां में कवि री सादगी, सरलता, सहजता अर संप्रेषण री खिमता देखी जाय सकै । कवि राजस्थानी कविता रै सीगै नैनी कविता री धारा नै नुवै नांव दियो- कुचरणीअर केई अरथावूं कुचरणियां रै पाण आधुनिक राजस्थानी री युवा-पीढ़ी री कविता में आपरी ठावी ठौड़ कायम करी है । कविता नै प्रयोग रो विसय मानण वाळा केई कवियां दांई ओम पुरोहित कागदरी केई कवितावां में प्रयोग पण देख्या जाय सकै है अर एक ही शीर्षक माथै केई-केई कवितावां सूं उण विसय नै तळां तांई खंगाळणो ई ठीक लखावै । कवि रो कविता में मूळ सुर अर सोच मिनखा-जूण अनै मिनख री अबखायां-अंवळ्या खातर है जिण में कवि ठीमर व्यंग्य ई करण री खिमता राखै ।

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सोमवार, अप्रैल 19, 2010

मायड़ भाषा पेटै ओम पुरोहित 'कागद' री दोय पंचलड़ी


१. आ मन री बात बता दादी

आ मन री बात बता दादी।

कुण करग्यो घात बता दादी।।


भाषा थारी लेग्या लूंठा।

कुण देग्या मात बता दादी।।


दिन तो काट लियो अणबोल्यां।

कद कटसी रात बता दादी।।


मामा है जद कंस समूळा।

कुण भरसी भात बता दादी।।


भींतां जब दुड़गी सगळी।

कठै टिकै छात बता दादी।।


२. पूछो ना म्हे कितरा सोरा हां दादा

पूछो ना म्हे कितरा सोरा हां दादा।

निज भाषा बिना भोत दोरा हां दादा।।


कमावणो आप रो बतावणो दूजां रो।

परबस होयोड़ा ढिंढोरा हां दादा।।


अंतस में अळकत, है मोकळी बातां।

मनड़ै री मन में ई मोरां हां दादा।।


राज री भाषा अचपळी कूकर बोलां।

जूण अबोली सारी टोरां हां दादा।।


न्याव आडी भाषा ऊभी कूकर मांगां।

अन्याव आगै कद सैंजोरा हां दादा।।

शनिवार, अप्रैल 17, 2010

ओम पुरोहित ‘कागद’ की चार हिन्दी कविताएं

१. थार में प्यास
जब लोग गा रहे थे
पानी के गीत
हम सपनों में देखते थे
प्यास भर पानी।
समुद्र था भी
रेत का इतराया
पानी देखता था
चेहरों का
या फिर
चेहरों के पीछे छुपे
पौरूष का ही
मायने था पानी।

तलवारें
बताती रहीं पानी
राजसिंहासन
पानीदार के हाथ ही
रहता रहा तब तक।

अब जब जाना
पानी वह नहीं था
दम्भ था निरा
बंट चुका था
दुनिया भर का पानी
नहीं बंटी
हमारी अपनी थी
आज भी थिर है
थार में प्यास।

२. स्वप्नभक्षी थार
हमने
गमलों में
नहीं उगाए सपने
रोप दिए थार में।

स्वप्नभक्षी थार
इतराया
बिम्बाई मृगतृष्णा
और दबी आहट
भख गया
रोपित सपने।
आरोपित हम
देखते रहे
आसमान में
उभरे अक्स बादल का
नहीं उभरा!

उनके सपने
गमलों रूपे
अंकुराए
गर्वाए
भरपूर लहलहाए
अब वे काट रहे हैं
सपनों की फसल
हमारे कटते नहीं दिन।

३. अभिव्यक्त नहीं मन

अपने हाथों
रचा अपना संसार
अपने शब्द
अपनी भाषा
फिर भी
अभिव्यक्त नहीं मन।

तन ढकना
पेट भरना
छत ढांप लेना
यही तो नहीं
जीवित होने का साक्षी।

पंचभूत की रची काया
रखती है
कोमल मन में
रची बसी संवेदना
मुखरित होने का
पालती सपना।

सालती है
जीवेषणा भी
कुछ न पाकर
जैसे कि एक स्त्री
मानव होने का
झेलती है दंश।

अंश हैं सब
उस परमात्मा के
तो फिर क्यों हैं
अपनी-अपनी भाषाएं
अपनी-अपनी आशाएं
यदि हैं भी
तो क्यों अभिव्यक्त नहीं मन
किसी-किसी का।

४. काया का भाड़ा माया
पत्थर तोड़ती
उस महिला को
या फिर
दिन तोड़ती अबला को
देख ही लिया कवि ने
नहीं देखा;
पत्थर टूटा कि नहीं
दिन टूटा कि नहीं
झांका नहीं वहां
जहां टूटा था कुछ
दरक गया था सब कुछ।

हा!
वह तो दे ही दिया था
उस महिला ने
परोस ही दिया था उसे
थाली में बापू ने
भरी पंचायत
जब वह बाला थी।

आज ही जाना
वह तो दिल था
दीवाना नहीं था
उसका दिल
दीवाने तो लोग थे
काया के
काया का भाड़ा माया
माया की मार से
टूट ही गया था दिल।

मंगलवार, अप्रैल 13, 2010

वर्तमान राजस्थानी कविता में एक भरोसेमंद नाम है कवि श्री ओम पुरोहितकागद । पिछले वर्ष श्री कागद के राजस्थानी में दो कविता संग्रह बोधि प्रकाशन, जयपुर से पंचलड़ी और आंख भर चितराम प्रकाशित हुए । इन दिनों आपकी कालीबंगा शीर्षक से लिखी कविताएं चर्चा में है पिछ्ले दिनों किसी कार्य के सिलसिले में कागद जी सूरतगढ़ आए थे तब उनसे कुछ बातें हुई । उनकी बातों को प्रश्नोत्तरी रूप में यहां प्रस्तुत किया जा रहा है- यह चित्र एक संयोग है और मेरा सबसे पहला सवाल यही है कि क्या आप आरंभ से ही गांधीवादी विचार-धारा के रहे हैं ? यानी जो भी बुरा है उस से दूर रहते हैं ?

रविवार, अप्रैल 11, 2010

ओम पुरोहित “कागद” की चार कविताएं


थिरकती है तृष्णा

थिर थार पर

थिरकती है तृष्णा

दौड़ता है मृग

जलता है जल

टलता है जल


मरता है मृग

फाड़-फाड़ दृग

रहती है तृष्णा

देखता है थार

पूछता है थार;

कौन है बड़ा,

मृग

तृष्णा

या फिर मैं

जो रहूंगा थिर ।



पांचवें तत्व का नाम

उगता है

जब कोई

नया नन्हा पौधा

और

पूछ बैठता है

उसके होने में

काम आए

उस पांचवें तत्व का नाम

तू कैसे बता पाती होगी

बरसों से

तुझ पर नही उतरे

उस पांचवें तत्व का नाम ।


ओ भटके प्रीतम मेघ

तेरे ही वियोग में

किए बैठी है सोलह श्रृंगार

और

तू इसे

बीते यौवन की प्रौढ़ा समझ

त्याग बैठा है

सोत चेरापूंजी के घर

ओ भटके प्रीतम मेघ !

घुमड़ कर आ

औढ़ा तीतर पांखी चूनर

बैठ सोनल सेज पर

फिर देख

कैसे टूटता है गुमान

सौत चेरापूंजी के रूप का ।



फलेंगे रसाल

जब तक

सांस है

आस है;

थार के रोम-रोम पर

उगेंगे

हरियल रूंख

फलेंगे रसाल

आच्छादित होंगे

हरितपर्ण अनायास

ज्यों रोही में

सूनसान धोरे पर

उग आता है

गीला गच्च भंपोड़ ।