गुरुवार, जून 06, 2013

दस डांखळा

[१]

हिलमिल होळी खेली      ऊंदरां दिखायो हेत ।
फ़ूल तोड़ ल्याया लाल-लाल जद गया खेत ।
                    रगड़ बणायो रंग
                     सागै    घोटी भंग
मिनकी रै डर सूं पीग्या भांग   रंग समेत ॥

[२]

सिर हो मोटो पण   पतळी ही कड़तू ।
ब्या होयो नीं अर कुंआरो रै’ग्यो पड़तू।
           बुडापै में लाग्यो नाको
           बोल्यो ऊंचो कर बाको
देखता रै’ईयो अब बांध देस्यूं भड़तू ॥

[३]

नरेगा रै कारड़ में चिपकावणी ही फ़ोटू !
मोटी जोडा़यत साथै कोड में बैठ्यो कोटू ।
           फ़ोटोग्राफ़र गिण्या तीन
           कैमरै में आयो नीं सीन
बो बोल्यो बाबै नै भेज तूं उठज्या छोटू ॥

[४]

रीसां में बोल्यो ऐक दिन खेमलो खिलाडी़ ।
दारू पीवण नीं देवै रांड आयगी अनाडी़ ।
                    गया नीं    होटल
                    खोली नीं बोतल
इयां तो भूखा ई मरजासी बापडा़ कबाडी ॥

[५]

ऊंदरै भेज्यो ऊंदरी नै        ऐक दिन ई मेल ।
धरती माथै तो है कोनी थारै जिसी फ़िमेल ।
                    ऊंदरी बोली     रुक
                     पै’ली देख फ़ेसबुक
बठै लाधसी  लाडी म्हारै जिसी रेल री रेल ॥

[६]

ऊंदरी बोली कार ल्याओ चढूं कोनीं बस में ।
जी घुटै म्हारो     भीड़-भाड़ अर भारी रस में ।
             ऊंदरो बोल्यो धिक्कै कोनीं
              तूं म्हारै अब टिक्कै कोनीं
थारै जिसी तो होवणी चाईजै     सरकस में ॥

[७]

ऊंदरी ही पेट सूं डागधर जी करी सोनोग्राफ़ी ।
पेट में दिख्या बच्चिया अणगिणत अर काफ़ी ।
                       करो ना रीस
                      लेऊं नीं फ़ीस
म्हारै कोनीं इत्ता पालणियां    म्हनै देवो माफ़ी ॥

[८]

देखो जमानै में फ़ैसन      बदळ्या है दस्तूर ।
ऊंदरी बोली ऊंदरै सूं     आपणो काईं कसूर ।
                 देखो टींगर-टींगरी
                  फ़ैसन में फ़ींगरी
हाथै फ़ाड़-फ़ाड़ पै’रै आपरा पै’रण आळा पूर ॥

[९]

ऊंदरो बोल्यो ऊंदरी सूं      सुणै है काईं स्याणी ।
आज तो लड़ मरिया आपणां सेठ अर सेठाणी ॥
                      बात कोनीं छोटी
                        पकै कोनी रोटी
ऊंदरी बोली डरो ना होटल सू आसी रासण पाणी ॥

[१०]

ऊंदरी जाम्यो ऊंदरो  ऐक सकल मिलै बिल्ली सूं ।
काईं बतावै दाई ऊंदरै रो फ़ोन आयो दिल्ली सूं ।
                   सतगुरू तेरी ओट है
                  ऊंदरी में तो खोट है
लाई ऊंदरो कींयां बचसी जग में उडती खिल्ली सूं ॥

[१]

खेमलै रै जंचगी      खेलण सारू होळी ।
दिनूगै उठतां ई खा ली भांग री गोळी ।
            नसै में पडी़ नी ठा
              लुगाई पै’रा दी ब्रा
फ़ेर घूम्यो सारै    दिन पै’र परो चोळी ॥

[२]

गैर रमण सारू निकळ्यो नंगियो नंग ।
गाबा खोल टाबरां करियो नंग धड़ंग ।
            आई जणां लाज
            धोरै चढ्यो भाज
फ़ेर बजायो बण आंख मींच’र चंग ॥

[३]

ऐसकै भड़तू खेली होळी बडी़ तेज ।
कोड-कोड में बण रंग दियो अंगरेज ।
        थे तो करियो तंग
       म्हे गेरां खाली रंग
रंगीज जा नीं तो बणा लेस्यूं मिसेज ॥

[४]

खड़कू खोडि़यै री भू भी खोड़ली ।
सुसरै नै रंगण लारै-लारै दौड़ली ।
          बूढियै नै पटक
         रंग दियो चटक
रीसां बळती सासूडी़ चूडी़ फ़ोडली ॥

[५]

दारू रै नसै में     भुणियों बेगो आयो घरां ।
बोल्यो- आज तो      किणीं सूं ई नीं डरां ।
               दीखी जद लुगाई
               पाछी दौड़ लगाई
बोल्यो आज फ़ेर मरस्यां जियां रोज मरां ॥

[६]

भांग रै नसै में हो भूंड मल भंडार ।
लुगाई घरां ल्याई पालणियों मंडा’र ।
      म्हारै साथै खेलो होळी
     बोल्यो,ना ऐ नार भोळी
थांनै रंगां तो कूटै बा म्हारली रंडार ॥

[७]

ऊंदरां मिल विचारी होळी रमण री ।
मिनकी तकाई बां हलवाई झमण री ।
         देखी बीं री आंख लाल
          हाथ सूं छूटगी गुलाल
फ़ेर तो खबर ई आई ऊंदरा गमण री ॥

[८]

होळी खेळण री ऊंदरां रै आई दिल में ।
खेलां तो खेलां    मिल’र अबकै बिल में ।
            ल्याया पिचकारी
              मार’र टिचकारी
बोल्या-दारू भी तो ल्याओ महफ़िल में ॥

[९]

गुड़गांवै री ऊंदरी अर ऊंदर हो दिल्ली रो ।
शेर नै मारता    पण डर तो हो बिल्ली रो ।
            ऊंदरी बोली होळी है
            मिनकी पूरी धोळी है
रंगो तो ठाह लागै आज      शेखेचिल्ली रो ॥

[१०]

आओ बेलियो छोडो सगळी राम्पारोळी ।
भेळा होय आपां सगळा मनावां होळी ।
              कविडो़ तो नटग्यो
              खड़्यै पगां अंटग्यो
बोल्यो-पै’ली बताओ कुणसो देस्सी न्योळी ॥


*** मुझे लड़ना है ***


अंधेरो से
लड़ना चाहता हूं
गर दिखता नहीँ
कोई साफ साफ अक्स
इस कलमस मेँ
सब के सब
धुआंए है
स्याह धुएं मेँ ।

चौतरफ़ा यह धुआं
आया कहां से
नहीँ बताया
धुआंए चेहरोँ ने
और धुआंने को आतुर
दूसरे लोगोँ ने !

कुछ लोग
कुछ लोगोँ का
जला रहे हैँ दिल
सुलगा रहे हैँ ज़मीर
कुछ लोग
बस केवल
हवा दे रहे हैँ
या फिर झोँक रहे हैँ
पना ईमान !

कुछ लोग
मुठ्ठियां भीँच रहे हैँ
दूर खड़े
दूर ही खड़े
कुछ और लोग
दांत पीस रहे हैँ
मुठ्ठियां भीँचने वालोँ पर !

कुछ लोगोँ ने
खोल दी हैँ मुठ्ठियां
और सुस्त चाल चलते
कर रहे हैँ
उनका या समय का
मौन अनुकरण !

मुझे तो अभी
लड़ना है
पहले खुद से
अंधेरोँ से
और फिर उनसे
जिनका आभामंडल है
यह स्याह अंधेरा !
[1]

न इश्क है
न बीमारी
न चिँता है
न खुमारी
फिर क्योँ उड़ गई
रातोँ की नीँद हमारी ?
सवाल तो
और भी हैँ
फिलहाल
इसी का चाहिए
हमेँ जवाब ;
पेट भरने के बाद भी
क्योँ चाहिए तुम्हेँ
दुनियां की दौलत सारी ?

[2]

हाड़ तोड़ मेहनत कर
घुटनोँ तलक पसीना बहा
पेट नहीँ भरता
मेरे नत्थू का
जब से उगी है मूंछ
मुठ्ठियां तानता है
अब खाता नहीँ
शपथ संविधान की !
क्योँ कहता है वह
एक संविधान से पहले
दो जून धान जरूरी है ?

[3]

क्या जवाब दूं
मेरे नत्थू को
जो बार बार पूछता है-
धाए अघाए लोग
संसद मेँ
और
जन्म के भूखे
दड़बोँ मेँ
क्योँ रहते हैँ ?

[4]

ब जब भी
चूल्हे से ज्यादा
दिल जलता है
मुझ से पूछता है
मेरा नत्थू ;
वाब दो
क्योँ पटक दी गई
हमारे ऊपर
जन्म से पहले
गरीबी की रेखा
क्योँ नहीँ उकेरी गई
अमीरी की रेखा ?

[5]

भूखे लोग
जब जब भी
संगठित हो
करते हैँ अनश
उन पर
क्योँ बरसाई जाती हैँ
खुले हाथ लाठियां
क्योँ नहीँ बरसाई जाती
दो जून रोटियां ?
मेरे पास
कोई जवाब नहीँ
नत्थू के इन सवालोँ का
तुम ढूंढ़ लो
वह दड़बे से
निकल गया है !

क्षणिकाएं

1.
वह बोला
अब यह सरकार गिरेगी
भीड़ बोली
गिर तो गई
अब इस से जादा क्या गिरेगी !
2.
मच्छर बोले
आतंकवादी भारतीयों को
मच्छर समझते हैं
हम मच्छरों ने तो
भारतीय होना दिखाया है
बस इसी लिए
कसाब को काट खाया है !

मेरे भीतर अंधेरा

मैंने सुना था
अंधेरों की तरफ
भागती है रोशनी
उस के आगमन पर
अंधेरे सिमट जाते हैं
पसर जाती है रोशनी !

रोशन होता है
आसमान में सूरज
मेरे भीतर से निकल
पसर जाता है अंधेरा
मेरे ही सामने
परछाई बन कर
मुझ तक आ कर
क्यों रुक जाती है
जग में चमक बिखेरती
बेखोफ़ रोशनी
हर ओर से
मेरी ही ओर
क्यूं उतर आता है
घनघोर अंधेरा !

मेरे ही भीतर है
शायद अंधेरा
फैल जाता है
बाहर आ कर
जो बड़ा है
बाहर की रोशनी से !

आओ !
ले कर एक दीया
भीतर बैठो तुम
शायद तुम से हो जाए
मेरा भीतर रोशन
शायद तब छोड़ दें
मेरी ओर आना अंधेरे !

अरमानों का कह

ये बदन तो दोस्त अब ज़ख्मों का घर है ।
अपनों     में  जैसे  गैरों  का  बसर है ।।
ढांप भी  नहीं सकते  अब तो ये बदन ।
सांपों  वाली  आस्तीनों  का  डर है ।।
सांझ  ढले  घर  लौटूं  भी  तो  कैसे ।
ये  घर  भी  उनकी  यादों  का दर है ।।
आह  की  लपटों  से जल  उठे चराग ।
जलते  हुए  अरमानों  का  कहर है ।।

याद

.
ना  आऊंगा  वो  इतना  कह गया ।
इस पर इधर इक समंदर बह गया ।।
यादों  का  नीर उड़  गया  भाप बन । 
दिल में बस कसक का नमक रह गया ।

====================
भाग    भाग कर  जिंदगी , थक गई  बेशुमार ।
मंजिल इसको ना मिली, मिली समय की मार ।।
घर  तो  मेरा  है  नहीं , सब  कहें बारम्बार । 
यायावर  मैं  जगत में , जाना  जग से पार ।।

कविता

हम ने जब कभी
दर्द की कविता लिखी
अकेले में गुनगुनाया
जग ने कहा
खुद को साला
कवि समझता है 
कविता करना
तेरे बस की बात नहीं
ये डायरी उठा ले
जा कहीं छुप कर
आंसू बहा ले !

तुम आए

चेहरे से अपने
हाव-भाव-घाव
सभी छुपा कर
चेहरे पर अपने
चेहरा लगा कर
अजब-गज़ब से
दांव लगा कर
तुम आए
दर्पण के संमुख
अब बेचारा दर्पण
क्या बताए
क्या छुपाए 

<*> घर <*>

उस ने
अपने दोस्त को 
बुलाया और दिखाया
देखो मैंनें घर बनाया है
दोस्त ने कहा
तुम्हारा घर तो 
गांव में था 
इस घर में फिर
कौन-कौन हैं
उस ने कहा
मैं और मेरी पत्नी
हमारा एक बच्चा
गांव में तो केवल
बहिन-भाई
माँ और बाप हैं !

दोस्त ने कहा
घर वह नहीं
जहां आप हैँ
घर तो वह है
जहां माँ बाप हैं
और सुनो
ईंट-कंक्रीट से नहीं
घर परिवार से बनता है
तुम्हारा परिवार
आज भी गांव में है
इस लिए तुम्हारा घर
आज भी गांव में है !

*नेह की बूंद*

आसमान में
बजे नगाड़े
ढमके ढोल
चमकी बिजली 
हुई आतिशबाजी
नवल दूल्हा बन
दौड़ पड़े पिय बादल
चढ़ पवन की घौड़ी
अब टूटेगा
वियोग मरुधरा का
नेह की बूंद
मेह के बहाने
टपकाने आए
बादल मरुधरा पर !

कण-कण मरुधरा का
आज लगा महकने
मन ही मन फूटे बोल
होगा मिलन
मिटेगी दाह चाह
आह !
मेरे आंगन चहकेगी
इस मौसम में
हरियल किलकारी
मेरे आंचल भी आएगा
सुख ममता का भारी !

भावना हार गई



कौन बडा़
मैं या तूं
इस बात पर
धन और भावन में
जंग छिड़ गई
बढी तकरार
धन जीता
भावना हार गई
हो गया तलाक
आज भावना अकेली
एक कौने में पडी़
सिसक रही है
चारों और धन की
चल रही है
भावना बेचारी
मर रही है !

कोई तो आगे बढ़
थाम लो हाथ
परित्यक्त भावना का
ताकि कुछ तो बचे
मानवता की संभाना का !

मुझ में ही हो कहीं*

बहुत दिन हुए
आया नहीं
तुम्हारा ख़त
आता भी कैसे
तुम ने लिखा ही नहीं
लिखते भी कैसे
तुम हो नहीं
कहीं बाहर
मुझ में हो कहीं
बहुत गहरे
जहां से आते नहीं
कभी ख़त
आती है केवल याद
जब कभी करता हूं
खुद से बातें
जैसे कि अब
लगता है
आना चाहिए
तुम्हारा ख़त !

रविवार, जून 02, 2013

चांद तो गांव में उगता है

गांव से फोन आया
चांद निकल आया है
व्रत खोल लो
समाचार पा कर
पांचवी मंजिल के
पूर्वी पिछवाड़े की और
दिया चंद्रदेव को अर्ध्य
कैलेण्डर में देखा चांद
व्रत खोल-पाया भोजन
सोते वक्त
बच्यों को सुनाई
चंदा मामा की कहानी
बच्चों ने पूछा
मां,कैसा होता है चांद
हमें दिखाओ ना
खिड़की खोल कर !

मां बोली
यहां कहां उगता है चांद
चांद तो गांव में उगता है
इस बार गांव चलेंगे
तब दिखाउंगी
अब खिड़की बंद करो
बाहर पॉल्यूशन है
टीवी ऑन कर लो
आज करवा चौथ है
दिखा रहा होगा
कोई न्यूज चैनल
फिलहाल उसी में
देख लो चांद !

अंधेरों से जीत

चौक-चौराहों पर लगे
बड़े-बड़े मर्करी बल्ब
साल भर जल कर भी
जब मिटा नहीं पा रहे
देश का तिल भर अंधेरा 
तो भला मिट्टी के दीपक
क्या हुनर दिखाएंगे कि 
वो इस अमावस की रात 
अंधेरों से जीत जाएंगे !

दो क्षणिकाएं

1.सोना

उनके पास
सोना है
इस लिए
उनको रात भर
नहीं सोना ।
.

2.

अब कहीं कुछ नहीं
सब कुछ है खाली
जो भी थी चीज
उन्होंने सब खा ली !

कैनवास पर स्त्री

वह बनाना चाहता था
एक पूर्ण स्त्री का चित्र
बना भी लिया एक बारगी
गोल गंदमी चेहरा
विशाल केशराशि
कज़रारे तीक्ष्ण मृगनैन
लम्बी सुराही सदृश्य गर्दन
उतिष्ठ ललाट
दाडि़म आभासी कपोल
पुष्टयौवना एक सम्पूर्ण स्त्री
उभर भी आई कैनवास पर
जो अपना तो नहीं
दृष्टा का मौन तोड़ने में
दिख रही थी सक्षम !

अचानक उस नें
फ़ाड़ दिया वह चित्र
नहीं,यह नहीं हो सकती
एक सम्पूर्ण स्त्री
कहां उतर पाई है इस में
ममता-दया-करुणां-क्षमा
प्यार की असीम ऐष्णां
इन के बिना
कैसे बन सकती हैं
कुछ रेखाएं मिल कर
एक सम्पूर्ण स्त्री !

नहीं !
हरगिज नहीं उतर सकती
कैनवास या कागज़ पर
रंगों सनी रेखाऒ के मेल से
या कलम के बहकावे में
ढल कर एक स्त्री !
=

असीम प्यार

मैंने कहा
प्यार चाहिए
उस ने उड़ेल दिया
मैं बुहारता रहा
इर्द-गिर्द बिखरा
उसका असीम प्यार !

आज तलक
संजो नहीं पाया
उसका उन्मुक्त प्यार
छोटी पड़ गईं
मेरी अंजुरियां !

किसी ने
सच ही कहा है
नहीं होती सीमा
माँ के प्यार की
खूटता नहीं कभी
माँ का खजाना
माँ तो बिन मांगे भी
यूं ही लुटाती है प्यार !

याचना में नहीं उठेंगे हाथ

किसी भूखे की 
कर अनदेखी
अपने पेट से अधिक
जुटा रहे हो
जो हाथ आया
आज उसे खा रहे हो
कल जब लोग
अपना हिस्सा मांगेंगे
तब कहां दुबकोगे
तब हाथ
याचना में नहीं उठेंगे
न याचना सुनी जाएगी
सारा हिसाब-किताब
सड़क पर होगा
बही-खाते
खोले नहीं जाएंगे
जलाए जाएंगे
तुम्हारे रक्त में
बह रही
उनके हक़ हलाल की पूंजी
नोच ली जाएगी
तब तुम कहां दुबकोगे !