रविवार, अप्रैल 13, 2014

बेटी का खत

नेट ओ मोबाइल के
इस शातिर युग में भी
खत आया है बेटी का
लिखी है बेटी ने
खत में गत अपनी ।

सच कहते थे पापा तुम ;
आती नहीं नींद 
रात रात भर बिस्तर में
छत निहारूं
देखूं आंगन
आंखें पसरी जाती हैं
सोए बच्चे
दिखते बढ़ते
बढ़ते खर्चे
गली गली में
होते चर्चे
दिखता खर्च त्यौहारी का !

सास बुढ़ाई
ससुर मुहाने
घर में लगते
सब बतियाने
गंगा चलो
चलें नहाने
सोने की सीढ़ी चढ़ें बडेरे
हाथ खोल कर
बढ़ लो आगे
बोला पंड़ित लगा गुर्राने !

दामाद आपके
बैठे ठाले
खर्ची खूटे आते घर
घर मेँ घुसते लगता डर
काम धाम हाथ नहीं
आमद की कोई बात नहीं
ना झगड़ें हम
ऐसी कोई रात नहीं
दुख मत करना पापा तुम
वैसी ही हैं बातें सारी
जो तुम अम्मां से करते थे
नई तो कोई बात नहीं !

नाती आपका
आया खा कर फेरे
बैठा चौबारे दे कर डेरे
कोई कलमुहा आवारा
नातिन के देता फेरे
यही चिंता रहती घेरे
पापा पड़ी पार आपकी
मेरी मुश्किल लगती है


इस दुविधा में पापा
रात बैठ बैठ गुजरती है ।

संकट सारे
मेरे द्वारे
दौड़ दौड़ क्यों आते हैं
घर में
सोते सभी चैन से
आंसू मेरी आंख भिगोने
क्यों किनारे आते हैं ?
छोड़ो पापा क्या गिनाऊं
दुख वही तो सारे हैं
जिनको ढोते ढोते
तुमने दिन उम्र के गुजारे हैँ
जाओ छुप कर सो जाओ
तुम भी रो कर हो लो हलके
मैंने तो दो पाव उतारे हैं !

बुढ़ापा हुआ बीमारी

तूं जनमा मैं बलिहारी बेटा।
वो खुशियां अब मैं हारी बेटा ।।
छोड़ा घर देश गांव भी अपना ।
ऐसी भी क्या लाचारी बेटा ।।
ममता छोड़ क्या ओहदा पाया ।
हो गए बड़े तुम व्यपारी बेटा ।।
जोड़ जोड़ सपने महल बनाया ।
लगती नहीं अब बुहारी बेटा ।।
बिना सहारे अब पांव न उठते।
बुढ़ापा हुआ बीमारी बेटा ।।
दूर देश मेँ जो जाया पोता ।
सुनी न आंगन किलकारी बेटा ।।
बहू आती घर आंगन सजाती ।
सध जाती दुनियादारी बेटा ।।

प्रीत

आपके किसी श्रम की
पगार नहीं होती प्रीत ।

तुम हंसे
मैं हंसा
दोनों मुस्कुराए
चल भी लिए
साथ-साथ
बहुत दूर तलक
यूं साथ होने का
होती नहीं आधार प्रीत !

मैले को उजला
अंतिम को पहला
कह मानली बातें
कर दिया समर्पण
तन मन सारा
कह दिया
तूं जीता मैं हारा
होती नहीं जीत-हार प्रीत !

मन के बदले मन
दिल के बदले दिल
दे डाला
हम ने तुम ने
तुम ने मारा
अपना मन
मैंने मारा
अपना मन
ले लो
दे दो
होता नहीं व्यपार प्रीत !

प्रीत बसती
भीतर कोठे
न दिल में जाती
न छूती दिमाग
लग जाती है
लगाई न जाती
आग प्रीत की
सुनी-सुनाई ना जाती
बज जाती बिना साज
ऐसी होती प्रीत राग
न जाने कौन रचे
कोई न सृजनहार प्रीत ।

मीठी लगती
प्रीत की बातें
कड़वी भी लग जाती
बातें सारी गुजर जाती
छन छन आती
बहुत सुहाती
आती जब लौट
अपनी मरजी
करती फिर संचार प्रीत !

*पुष्प और पत्तियां*

शाख पर साथ रहे
फूल और पत्तियां
लड़ते रहे साथ-साथ
मनचले झंझावातों से
फूल का रंग
चटख लाल
बहुत भाता
उसे अपलक निहार
मदमाती रहतीं पत्तियां
फूल भी मदमस्त सा
बीच पत्तियों के
करता मानो
रासलीला उपवन में
ना जाने कब यकबयक
पुष्प साथ छोड़ गया
या फिर कोई मनचला
शाख से तोड़ गया !

सौत थी हवा
आती नित उपवन में
छू-छू जाती पुष्प को
इधर-उधर डोलती
उन्मुक्त सी चहकती
आजकल महकती है
उसी ने किया होगा
वरण पुष्प का
सांय-सांय कसमसाती है !

*मौन वांछनाएं*

सकल जगत का
हो अगर मनवांछित
तौ अट जाएगा
जग समूचा
निज वांछनाओं के 
असीम अंबार से
फिर 
वांछना निर्लिप्त पांव
कहां कोई
रख पाएगा ?

मानवी वांछना की
सकल पूर्ति के बाद
फिर नहीं जन्मेंगी
नवीन वांछनाएं
इसकी कौन करेगा
अंतिम घोषणा
और फिर यह
बताए भी कौन ?

क्यूं दबी रहती हैं
कुछ वांछनाएं
मन के भीतर मौन
जिसकी पूर्ती के लिए
टूट ही जाते हैं
बहुत से मौन मन !

सौन्दर्य

सृष्टि में सौन्दर्य 
स्थाई भाव नहीं
उपस्थिति है
कुछ समय के लिए
जैसे लता के शीर्ष पर
चटख लाल पुष्प
जो नहीं था कल
आज है
कल रहेगा या नहीं
कौन बताए
जबकि मौन है कायनात!

देह हमारी
धारती है सौन्दर्य
देह की मौत
मौत है सौन्दर्य की ?

*अंतस की जाजम*

अंतस की जाजम 
पसरी मनगत सारी
मुखरित होने ढोती
अविरल लाचारी
जाजम का उलझा
कुल ताना-पेटा 
तार-तार है भारी 
मन की मन ही
बुने-उधेड़े
व्यथा गोटा-तारी
मन की उधड़ी
जाजम पर अब
लगे ना टांका-कारी
मन की सुन ले
मन ही कोई
वरना है लाचारी !

हकीक़त

रात और दिन
सामना था
मौन मगर प्रत्यक्ष
एकाधिक सपनों का
जो आ धमकते है
हकीकत में !

हकीक़त में
सपनें थे
सपनों में मगर
हकीक़त नहीं थी !

. *पेड़ की चिंता*

इधर शहर में
नित नए-नए 
कविता संग्रह
छप-छप आ रहे थे
उधर जंगल में
पेड़ बतिया रहे थे
अब हमारा बचना
बहुत मुश्किल है
हम से कहीं जादा
कवि उग रहे है
अब कविता संग्रह बिकेंगे
हम जादा दिन
धरती पर नहीं धिकेंगे !

सपना लिख दे

आंखों में कोई सपना लिख दे ।
सपनों में कोई अपना लिख दे ।।
लिख दी ढेरों कविताएं मैंने ।
आ अब तो उनका छपना लिख दे ।।
देवों जैसी है शक्ल ओ सूरत ।
मेरा भी अब तो जपना लिख दे ।।

बहुत दूर से आया हूं

वक्त गया है
या भाग गया 
जाते वक्त
वक्त ने
वक्त दिया या नहीं
कह तो नहीं सकता
वक्त के निशान मगर
आंखों में
झिलमिलाते जरूर हैं ।

बहुत दूर से
आया हूं मैं चल कर
जितना भी अब हूं
उस से भी पहले था
मैं कहीं और
वक्त तो
उस से भी पहले था
आज भी है
मैं ही भागा हूं।

जहां हूं
वहां आ कर
छुपाई है मैंने
अपनी पहचान
कोई तो बताए
मैं कहां से आया हूं
अब हूं तो
पहले भी
जरूर रहा होऊंगा
वक्त के साथ-साथ
क्यॊ कि मुझे में
आज भी नहीं है साहस
वक्त से


आगे-पीछे होने का ।

मेरे आंगन एक दोपहरी

[ यह प्रेम कविता नहीं है ]

फ़ट गया था आसमान 
तुम ने जब मौड़ लिया था
इधर से उधर
अपना बातूनी मुखडा़
धारण कर लिया
असीम मौन
जैसे चुक गए थे
तुम्हारे शब्द कोश से
"प्यार" के नाती
कोमल वाचाल शब्द ।

दूर तक चलने का
संकल्प था तुम्हारा
थाम कर हाथ
कदम से कदम मिला
बीच अधर में
पांव तुम्हारे
थक क्यों गए फ़िर
जबकि शेष है अभी
प्यार का सफ़र ।

तुम भूलते हो शायद
कितनी अपूर्ण हो जाती है
व्यापक पूर्णता लिए पंक्तियां
जब हट जाता है
कोई संयोजक शब्द
जैसे कि प्यार
इस एक शब्द के हटने पर
टूट जाता है दिल
देह होने लगती विदेह
हो जाती है अलसुबह भी
सूरज पर कालिख पुती सांझ सी
जब कि कभी
तुम्हारी एक मुस्कान पर
निकल आते थे
कई-कई सूरज एक साथ
और हो जाया करती थी
मेरे आंगन
एक चमदार दोपहरी !
=====
=

नया सूरज

आज फिर 
आया है सूरज
सहमा हुआ सा
मेरे घर की 
छत लांघ कर 
उदास सा
कंकरीट के
तिमंजलों से
बच कर
बादलों से लाया
मानो उधार में
धूप मांग कर !

आखिर
कितने दिन
रहेंगे हम
इस उधारी पर
आओ-उटो !
एक नया सूरज
उगाएं अपने लिए !

बेचारे

जो गए थे लाने
किसी के लिए
तोड़ कर चांद-तारे
वे आज पड़े हैं
खुद टूट कर बेचारे !

सोना

.
जो दिन भर 
कहते रहे
सोना है 
सोना है
वो रात भर 
करवटें बदलते रहे 
घर के बाहर
सोना लूटने
चोर भटकते रहे !

* प्यार : पांच चित्र *

1.
उस ने कहा
मैं तुम से 
बात नहीं करती
बात करते-करते
बात बढ़ जाती है
बात बढ़ जाती है तो
प्यार हो जाता है
सुना है ये प्यार
बहुत दुख देता है
मुझे दुख का जनक
नहीं चाहिए !
2.
गुरू जी ने
कहा था एक बार
खतरनाक होता है
ये कमबख्त प्यार
कभी मत करना तुम
किसी से प्यार
हो गया है तो समझो
तुम ने कह दिया ;
आ बैल मुझे मार !
3.
उस ने कहा-
कहते सुना है
प्यार में
नींद नहीं आती
तो फिर
मैं क्यों करूं प्यार
मुझे तो अभी
चैन सै सोना है यार !
4.
मैंने कहा
मुझे भी तो
नहीं आती नींद
प्यार तो नहीं मगर
इसका सबब
उस ने कहा
मौत के कारण
और भी तो हैं
तुम उनको ढूंढो
दोषी हर बार
नहीं होता प्यार !


5.
प्यार में होता है
छुपा हुआ डर
प्यार था
तभी तो आया था
डरते-डरते
कम फासले से भी
किसी का खत
जिसे तुम ने
उठाया था
डरते-डरते
छुपाया था
अपने वस्त्रों में
अज्ञात स्थान पर
डरते-डरते
खत में प्रेषक का
केवल नाम था
या फिर लिखा था
ठीक-ठीक कोई समय
उसको पढ़ कर
कितना डर गई थी
उस दिन तुम !

* इंतजार *

जो नहीं है अब
उस के इंतजार में
रात-रात भर जागना
जागने के ऐन वक्त
बुझे मन सो जाना
काम के वक्त
उचक कर जाग जाना
दिन भर एकांत में
खुद से बातें करना
मुस्कुराते हुए रोना
छुप कर आंखे पौंछना
निजी क्षणों के
इस अकथ क्रम को
कौन देखता है !

दुख से दूर घूमते
अपने सुख में झूमते
चैन की नींद सोने वाले
निकट के रिश्तेदार
भाई-बन्ध-मित्र वर्ग के
विचित्र लोग
उस के दुख में
नाटक देखते हैं
नींद की गोलियों से
बेफिक्री तक की सलाह
जाती हुई सरकार की तरह
मुफ़्त बांट जाते हैं
उन्हें लगता है
हम ने बंधवा दिया
स्थ्याई ढांढ्स !

उधर रात फिर
घिरने लगती है
रैंगने लगता है दर्द
सिहरने लगता है
बचा हुआ नेह
रिसने लगती हैं
अंतस से स्मृतियां
फिर से हो जाता है शुरू
नींद नहीं आने का
स्थाई होता उपक्रम !

*हम भोले नहीं थे*

कितने भोले थे
बचपन में हम
बहल जाया करते थे
खिलौनों से हम 
पापा बन जाते थे
कभी-कभी घोडा
मां हो जाती म्याऊं
हम बजा कर ताली
कितना खिलाते थे !

अब जब
खेलते हैं लौग
हमें खिलौना बना कर
सरेआम हम से
हम कितने उदास हैं !

अब
समझ आता है
दूसरों की
चालाकियां देख कर
बचपन में हम
भोले नहीं
चतुर-चालाक थे !

*बीज बंजारे*

बीज था 
उड़ना बेचारा
उड़ा
गिरा
पत्थरों में
हारी नहीं
पल भर भी
हिम्मत उस ने
पत्थरों में मिली
थोड़ी सी नमी
अंकुराया
बढ़ा
खिला
फला
पका
आई हवा
चला गया
अंतत: उसके संग
अपने अंशियो को
ले कर साथ
पत्थर फिर
बंजर हो गए
बीज बंजारे 

*मृत्यु : पांच हाइकु*

1.
दृश्यमान था
जगत से ओझल
कथ दी मृत्यु !
2.
चलाचली में
रुकना चल कर 
यात्रा अंतिम !
3.
मुख से हटा
नाम का उच्चारण
कह दी मृत्यु !
4.
घर में लौटी
जब केवल काया
मान ली मृत्यु !
5.
सब पुकारें
बोली जब ना देह
मृत्यु ही बोली !

*वज़ूद का गीत*

दिन भर की 
थकान उतारने के लिए
कुछ समय तक

अंधेरे में सो कर
बिस्तर छोड़ कर
उठ जाने से
नहीं हो जाती
सुहानी भोर
भौर के लिए
अपने आकाश में
सूरज का उगना
बहुत जरूरी है !

सोना-जागना तो
जरूरत है तन की
आओ , मन की सुनें
एक सूरज उगाएं
आसमान के ठीक बीच में
सब के ऊपर
ताकि फिर न हो
कभी काली रात
अंधेरा कौने लग
थर्राता रहे
तुम्हारे वज़ूद का
गीत गाता रहे !

*आंखों में झील*

बोल कर हसना
बहुत आसान था
हस कर बोलना
बहुत कठिन
तुम मगर बेखौफ
हसते रहे
दोनों ही स्थितियों में
चेहरे पर भी कभी
उभरे ही नहीं
दर्द-ओ-सकून
भले ही नम थीं
तुम्हारी आंखें !

सच बताना
तुम्हारा अंतस भी
क्या बेखौफ है
इतना ही
जितना है बाहर
तो फिर
कहां से उतर आई
आंखों में झील
मचलती हुई ?

* होना होता है होना*

होना
हर सू होना है
जो चलता रहता है
अपने ही तरीके से
होने के लिए होना
बिन रुके अनवरत 
हर पल-हर दिश !

इसी बीच
किसी की वांछनाओं को
परास्त कर
हमारी वांछनाए भी
चाहती हैं होना
इनके बीच उभरता
द्वंद्व भी तो
होना ही है होने का !

होने का न होना भी
होना ही है
अनहोना नहीं
जैसे कि चाहने पर
रात का
बड़ा-छोटा न होना
या फिर सब का
ढल जाना
हमारे अनुरूप
जीवन और मृत्यु
कुछ बड़े जरूर हैं
होने से मगर
नहीं है कत्तई विलग !

*मेरे भीतर चंद्रमा*

खंडित है
फिर भी
रात-रात भर
अटल चमकता है
दूधिया चांदनी बिखेरता
मेरी छत पर
मासूम सा चंद्रमा
एक मैं ऊपर से
समुचिम सालम
टूटा मगर भीतर से
देख-देख जागता हूं
उस पल की प्रतीक्षा में
चांद छिपे तो सोऊं !

मुझे
भय चांद का नहीं
वह तो है
भीतर कहीं
जहां छिपा है
कोई और चंद्रमा !

*मिटता नहीं प्रेम*

देह का देह से
होता है प्रेम
विदैही होते हुए भी 
अप्रत्यक्ष तो होती ही है 
प्रेम की आकांक्षी देह !

देह में ही जन्मता है
पलता है देह में
फिर
रमता भी देह में ही है
चाहत और अभिलाषा
त्याग और समर्पण के
ऊबड़-खाबड़ राह चल
देह पर आ कर रुकता है
देह ही जो है
अंतिम पड़ाव प्रेम का !

आसान भी नहीं है
प्रेम का मार्ग
बहुत मोड़ हैं
इस मार्ग में
यह मुड़ सकता है
किसी भी मोड़
ईश्वर की ओर
माँ-बाप
भाई-बहिन


वस्तु-जीव
क्षेत्र-राष्ट्र
भाषा-व्यवहार
घर-परिवार
विपरीत लिंगी की ओर
मगर हर बार
होता है परिभाषित
अपने ही पड़ाव से
जहां होती है
निश्चित ही कोई देह !

जिस देह जन्मता है
उसी देह में
मिलता है दाह प्रेम को
देह मिट जाती है
मिटता नहीं प्रेम
विदैही हो कर
निकल पड़ता है
कोई और देह ढूंढ़ने !

उसकी आंखों में

उसकी आंखों में
जूते तैर रहे थे
और
कसी मुठ्ठियों में
महीने भर की पगार थी
वह नंगे पांव
गांव से आया था
उसकी आंखों में देख
सिंहासन चकराया था !

स्वेटर के धागों में

दीपावली है आज
सब सजे-धजे हैं
दमकते चेहरे
चमकती आंखें
एक हाथ पटाखे
दूजे हाथ मिठाई
झूमते से निकलते हैं
पहन कर नवल परिधान ।

मैंनें भी
पहन ली स्वेटर
ठंड जो है गुलाबी
न जाने कहां से
सिमट आया
स्वेटर के धागों में
सजीव होता अतीत
विस्मृत सा चेहरा
आ गया सामने
मांगता हुआ पठाखे
सूतली वाले ।

लक्ष्मी पूजन के बाद
जैसे वह मांग ही लेगा
बोनस के पैसों में से
कुछ पैसे
पटाखों के लिए
इसी ऊहा पोह में
मैं आज
कर नहीं पाया
पूजन के बाद
जगदीश जी की आरती ।

मैंने
प्यार से फ़िराया हाथ
स्वेटर के डिज़ाइन पर
आज जैसे अटक गईं
ऊन की स्वेटर
स्मॄतियों की
नुकीली कील में
फ़िर उधड़ती चली गईं
उधड़ती चली गईं
जिसे समेट कर
बना रहा हूं गोला
ठीक वैसे ही
जैसे स्वेटर बुनती हुई
अपनी मां के पास बैठ
"गौरव" ने बनाया था कभी ।

सफ़र

राह मिली नहीं
न हुई पूरी चाह
बिना चले ही
सफ़र ज़िंदगी का
सिफर हो गया
फिर भी कहते हैं लोग
सम्भल कर चलना
आगे का सफ़र
जरा कठिन है भाई
अब तलक जो रही
वह देह भी आगे
नहीं रहेगी संग
जरा सम्भल कर भाई !

तुम कहां हो

कमरे में मैं अकेला
मौन कुछ किताबें
या फिर पसरा है अंधेरा
कीट-पतंगों के लिए नहीं है
कोई गुंजाइश
वज़ह चाहे है ऑलआउट 
दीवार घड़ी की टिक-टिक है
उस से बतियाऊं कैसे
सुनाती है
सुनती नहीं
तुम कहां हो ?

सोना नहीं है

सोना नहीं है 
इस लिए 
सोना है
सोनें में
है फायदा 
मेरे सोने का 
घर में है
सब को इंतजार
बस इसी लिए
अब सोना है !

किसी का अंतस बांचने के लिए

लोग आते रहे
बैठ-बैठ जाते रहे
संवेदनाएं भी व्यक्त कीं
लाख दिलासों के बाद भी
आंसू मगर थमे नहीं
शून्य में ताकती
मौन आंखों से झांकते
अबोलो सवालों को
कौन देता है जवाब-
क्यां शब्दों से थम जाते हैं
किसी के आंसू
क्या व्यक्त हो जाती हैं
सारी की सारी संवेदनाएं
शब्द कोश भर शब्दों से
क्या है कोई ऐसी भाषा
जो पढ़ ले किसी का
दिल और मन ।
कोई भी भाषा
किसी भी श्ब्द कोश के शब्द
शायद पर्याप्त नहीं है
किसी का अंतस
पूरा बांचने के लिए ।

भटनेर : राजस्थानी कविताओं की एक और कडी़

हनुमानगढ़ का भटनेर दुर्ग 52 बीघा भूभाग पर फ़ैला हुआ है । किले की दीवारों पर 52 बुर्ज़ बने हुए हैं । बहुत पहले इन 52 बुर्ज़ों में 52 कूएं बने हुए थे । कहते हैं कि इन कूओं का पानी मीठा था और किले के भीतर बसे नगर के लिए वर्षों तक पर्याप्त था । कई भयंकर युद्धो में ये कूएं दुश्मनों की लाशो से पट गए और कालान्तर में बन्द हो गए ।
भारत के इस गौरवशाली किले पर मेरी राजस्थानी कविताओं की एक और कडी़ प्रस्तुत है :-
=========
भटनेर-9
=====
मैंने देखा है
कभी भी नहीं लड़ते


कूएं -बावडी़
तालाब और नदी का पानी ।

मैंने सहेजे हैं
बावन बीघों में
बावन कूएं
जो पाते थे
सरस्वती से पानी

रहते थे सदैव एक रस ।

रहता है
रहता भी रहा है
आंतरिक प्रेम
आदान-प्रदान
एक दूसरे के
वज़ूद की रक्षा में ।

आदमी के भीतर
तिल भर पानी
उस आदमी के 

पानीदर होने के लिए
करता है युद्ध
उस युद्ध में
मिट जाते हैं कई सागर
यही पानी कर देता है
मुझ से खंडहर
कई-कई भटनेर !
====
भटनेर-10
=======
बच्चे-स्त्रियां
ज़मीन-गढ़-गढि़यां
पेड़-पौधे
पशु-पक्षी
नदी-तालाब
कोई नहीं चाहते युद्ध
मैंने देखा है प्रत्यक्ष ।

युद्ध उतरता है
दंभ के विमान से
छल-बल की ज़मीन पर
जो लील जाता है
बच्चों की खुशियां
स्त्रियों के प्रणय गीत
धरती की धमक
पक्षियों का कलरव
और नदी की कल-कल ।

मेरे यहां भी
उतरे कई-कई युद्ध
दंभियॊ के ज़हन में
खनकी तलवारें
जो कर गई मुझे खंडहर
दे गई आज को कल
आज जो हूं मैं भटनेर ।

भटनेर किले पर कुछ और राजस्थानी कविताओं का हिन्दी अनुवाद

भटनेर किले पर मेरी कुछ और राजस्थानी कविताओं का हिन्दी अनुवाद यहां तीसरी किस्त में प्रस्तुत है ।

भटनेर-6
======
युद्ध में
हर बार
मैं ही जीता
या फ़िर मां
मेरी ज़मीन
जो धारे रही मुझे
हर हार-जीत के बाद भी ।

राजा
राजाओं की दम्भी सेना
मनाते रहे ज़श्न
दरबार ओ चौगान में
अभिमान में
जो हो भी जाता था
कई बार चकनाचूर ।

यूं हारने
जीतने वाले की
संज्ञाओं को
बदलते देखा है मैंने
नहीं बदली
फ़कत मेरी ज़मीन
बहुत कुछ ले गए
मेरी देह से नो्च-नोच
परन्तु नहीं ले जा सके
ढो कर मुझे
मेरी ज़मीन को
जिस पर
खडा़ हूं मैं भटनेर
सदियॊ से अटल ।
=
भटनेर-7
======
मैंने देखा है
साफ़-साफ़ देखा है
युद्ध में कभी भी
नहीं जीतता आदमी
फ़िर चाहे वह
राजा हो या रंक
जीतता है
फ़कत काल
जो लील जाता है
दमकती संज्ञाओं को
समूचे लाव ओ लश्कर के साथ ।

मैंने
बहुत बार देखा है
मानवी दम्भ को
जो कभी नहीं रहा शेष
शेष रही फ़कत ज़मीन
जो आज भी है जरूरी
मेरे भटनेर होने की
अनंत यात्रा में ।
===
भटनेर-8
======
बच्चे कल हैं
आज भी और अब भी
सच है सकल


उतरता है बल
उनके यहां
भटक जाता है
बुद्धि से पहले
पहुंच जाता है
फ़ड़फ़डा़ती भुजाओं में ।

बल का
भुजाओं में पहुंचना
घातक है बहुत
देखा है मैंने प्रत्यक्ष
भुजाएं फ़ड़फ़डा़ती हैं
टकराती हैं
देती हैं जन्म
भयंकर युद्ध को
जो कर देता है
सुघड़ घट
भविष्य की यात्रा पर निकले
भटनेरों को खंडहर
जो हूं मैं आपके प्रत्यक्ष आज ।