रविवार, अप्रैल 13, 2014

*मौन वांछनाएं*

सकल जगत का
हो अगर मनवांछित
तौ अट जाएगा
जग समूचा
निज वांछनाओं के 
असीम अंबार से
फिर 
वांछना निर्लिप्त पांव
कहां कोई
रख पाएगा ?

मानवी वांछना की
सकल पूर्ति के बाद
फिर नहीं जन्मेंगी
नवीन वांछनाएं
इसकी कौन करेगा
अंतिम घोषणा
और फिर यह
बताए भी कौन ?

क्यूं दबी रहती हैं
कुछ वांछनाएं
मन के भीतर मौन
जिसकी पूर्ती के लिए
टूट ही जाते हैं
बहुत से मौन मन !

सौन्दर्य

सृष्टि में सौन्दर्य 
स्थाई भाव नहीं
उपस्थिति है
कुछ समय के लिए
जैसे लता के शीर्ष पर
चटख लाल पुष्प
जो नहीं था कल
आज है
कल रहेगा या नहीं
कौन बताए
जबकि मौन है कायनात!

देह हमारी
धारती है सौन्दर्य
देह की मौत
मौत है सौन्दर्य की ?

*अंतस की जाजम*

अंतस की जाजम 
पसरी मनगत सारी
मुखरित होने ढोती
अविरल लाचारी
जाजम का उलझा
कुल ताना-पेटा 
तार-तार है भारी 
मन की मन ही
बुने-उधेड़े
व्यथा गोटा-तारी
मन की उधड़ी
जाजम पर अब
लगे ना टांका-कारी
मन की सुन ले
मन ही कोई
वरना है लाचारी !

हकीक़त

रात और दिन
सामना था
मौन मगर प्रत्यक्ष
एकाधिक सपनों का
जो आ धमकते है
हकीकत में !

हकीक़त में
सपनें थे
सपनों में मगर
हकीक़त नहीं थी !

. *पेड़ की चिंता*

इधर शहर में
नित नए-नए 
कविता संग्रह
छप-छप आ रहे थे
उधर जंगल में
पेड़ बतिया रहे थे
अब हमारा बचना
बहुत मुश्किल है
हम से कहीं जादा
कवि उग रहे है
अब कविता संग्रह बिकेंगे
हम जादा दिन
धरती पर नहीं धिकेंगे !

सपना लिख दे

आंखों में कोई सपना लिख दे ।
सपनों में कोई अपना लिख दे ।।
लिख दी ढेरों कविताएं मैंने ।
आ अब तो उनका छपना लिख दे ।।
देवों जैसी है शक्ल ओ सूरत ।
मेरा भी अब तो जपना लिख दे ।।

बहुत दूर से आया हूं

वक्त गया है
या भाग गया 
जाते वक्त
वक्त ने
वक्त दिया या नहीं
कह तो नहीं सकता
वक्त के निशान मगर
आंखों में
झिलमिलाते जरूर हैं ।

बहुत दूर से
आया हूं मैं चल कर
जितना भी अब हूं
उस से भी पहले था
मैं कहीं और
वक्त तो
उस से भी पहले था
आज भी है
मैं ही भागा हूं।

जहां हूं
वहां आ कर
छुपाई है मैंने
अपनी पहचान
कोई तो बताए
मैं कहां से आया हूं
अब हूं तो
पहले भी
जरूर रहा होऊंगा
वक्त के साथ-साथ
क्यॊ कि मुझे में
आज भी नहीं है साहस
वक्त से


आगे-पीछे होने का ।

मेरे आंगन एक दोपहरी

[ यह प्रेम कविता नहीं है ]

फ़ट गया था आसमान 
तुम ने जब मौड़ लिया था
इधर से उधर
अपना बातूनी मुखडा़
धारण कर लिया
असीम मौन
जैसे चुक गए थे
तुम्हारे शब्द कोश से
"प्यार" के नाती
कोमल वाचाल शब्द ।

दूर तक चलने का
संकल्प था तुम्हारा
थाम कर हाथ
कदम से कदम मिला
बीच अधर में
पांव तुम्हारे
थक क्यों गए फ़िर
जबकि शेष है अभी
प्यार का सफ़र ।

तुम भूलते हो शायद
कितनी अपूर्ण हो जाती है
व्यापक पूर्णता लिए पंक्तियां
जब हट जाता है
कोई संयोजक शब्द
जैसे कि प्यार
इस एक शब्द के हटने पर
टूट जाता है दिल
देह होने लगती विदेह
हो जाती है अलसुबह भी
सूरज पर कालिख पुती सांझ सी
जब कि कभी
तुम्हारी एक मुस्कान पर
निकल आते थे
कई-कई सूरज एक साथ
और हो जाया करती थी
मेरे आंगन
एक चमदार दोपहरी !
=====
=

नया सूरज

आज फिर 
आया है सूरज
सहमा हुआ सा
मेरे घर की 
छत लांघ कर 
उदास सा
कंकरीट के
तिमंजलों से
बच कर
बादलों से लाया
मानो उधार में
धूप मांग कर !

आखिर
कितने दिन
रहेंगे हम
इस उधारी पर
आओ-उटो !
एक नया सूरज
उगाएं अपने लिए !

बेचारे

जो गए थे लाने
किसी के लिए
तोड़ कर चांद-तारे
वे आज पड़े हैं
खुद टूट कर बेचारे !

सोना

.
जो दिन भर 
कहते रहे
सोना है 
सोना है
वो रात भर 
करवटें बदलते रहे 
घर के बाहर
सोना लूटने
चोर भटकते रहे !

* प्यार : पांच चित्र *

1.
उस ने कहा
मैं तुम से 
बात नहीं करती
बात करते-करते
बात बढ़ जाती है
बात बढ़ जाती है तो
प्यार हो जाता है
सुना है ये प्यार
बहुत दुख देता है
मुझे दुख का जनक
नहीं चाहिए !
2.
गुरू जी ने
कहा था एक बार
खतरनाक होता है
ये कमबख्त प्यार
कभी मत करना तुम
किसी से प्यार
हो गया है तो समझो
तुम ने कह दिया ;
आ बैल मुझे मार !
3.
उस ने कहा-
कहते सुना है
प्यार में
नींद नहीं आती
तो फिर
मैं क्यों करूं प्यार
मुझे तो अभी
चैन सै सोना है यार !
4.
मैंने कहा
मुझे भी तो
नहीं आती नींद
प्यार तो नहीं मगर
इसका सबब
उस ने कहा
मौत के कारण
और भी तो हैं
तुम उनको ढूंढो
दोषी हर बार
नहीं होता प्यार !


5.
प्यार में होता है
छुपा हुआ डर
प्यार था
तभी तो आया था
डरते-डरते
कम फासले से भी
किसी का खत
जिसे तुम ने
उठाया था
डरते-डरते
छुपाया था
अपने वस्त्रों में
अज्ञात स्थान पर
डरते-डरते
खत में प्रेषक का
केवल नाम था
या फिर लिखा था
ठीक-ठीक कोई समय
उसको पढ़ कर
कितना डर गई थी
उस दिन तुम !

* इंतजार *

जो नहीं है अब
उस के इंतजार में
रात-रात भर जागना
जागने के ऐन वक्त
बुझे मन सो जाना
काम के वक्त
उचक कर जाग जाना
दिन भर एकांत में
खुद से बातें करना
मुस्कुराते हुए रोना
छुप कर आंखे पौंछना
निजी क्षणों के
इस अकथ क्रम को
कौन देखता है !

दुख से दूर घूमते
अपने सुख में झूमते
चैन की नींद सोने वाले
निकट के रिश्तेदार
भाई-बन्ध-मित्र वर्ग के
विचित्र लोग
उस के दुख में
नाटक देखते हैं
नींद की गोलियों से
बेफिक्री तक की सलाह
जाती हुई सरकार की तरह
मुफ़्त बांट जाते हैं
उन्हें लगता है
हम ने बंधवा दिया
स्थ्याई ढांढ्स !

उधर रात फिर
घिरने लगती है
रैंगने लगता है दर्द
सिहरने लगता है
बचा हुआ नेह
रिसने लगती हैं
अंतस से स्मृतियां
फिर से हो जाता है शुरू
नींद नहीं आने का
स्थाई होता उपक्रम !

*हम भोले नहीं थे*

कितने भोले थे
बचपन में हम
बहल जाया करते थे
खिलौनों से हम 
पापा बन जाते थे
कभी-कभी घोडा
मां हो जाती म्याऊं
हम बजा कर ताली
कितना खिलाते थे !

अब जब
खेलते हैं लौग
हमें खिलौना बना कर
सरेआम हम से
हम कितने उदास हैं !

अब
समझ आता है
दूसरों की
चालाकियां देख कर
बचपन में हम
भोले नहीं
चतुर-चालाक थे !

*बीज बंजारे*

बीज था 
उड़ना बेचारा
उड़ा
गिरा
पत्थरों में
हारी नहीं
पल भर भी
हिम्मत उस ने
पत्थरों में मिली
थोड़ी सी नमी
अंकुराया
बढ़ा
खिला
फला
पका
आई हवा
चला गया
अंतत: उसके संग
अपने अंशियो को
ले कर साथ
पत्थर फिर
बंजर हो गए
बीज बंजारे 

*मृत्यु : पांच हाइकु*

1.
दृश्यमान था
जगत से ओझल
कथ दी मृत्यु !
2.
चलाचली में
रुकना चल कर 
यात्रा अंतिम !
3.
मुख से हटा
नाम का उच्चारण
कह दी मृत्यु !
4.
घर में लौटी
जब केवल काया
मान ली मृत्यु !
5.
सब पुकारें
बोली जब ना देह
मृत्यु ही बोली !

*वज़ूद का गीत*

दिन भर की 
थकान उतारने के लिए
कुछ समय तक

अंधेरे में सो कर
बिस्तर छोड़ कर
उठ जाने से
नहीं हो जाती
सुहानी भोर
भौर के लिए
अपने आकाश में
सूरज का उगना
बहुत जरूरी है !

सोना-जागना तो
जरूरत है तन की
आओ , मन की सुनें
एक सूरज उगाएं
आसमान के ठीक बीच में
सब के ऊपर
ताकि फिर न हो
कभी काली रात
अंधेरा कौने लग
थर्राता रहे
तुम्हारे वज़ूद का
गीत गाता रहे !

*आंखों में झील*

बोल कर हसना
बहुत आसान था
हस कर बोलना
बहुत कठिन
तुम मगर बेखौफ
हसते रहे
दोनों ही स्थितियों में
चेहरे पर भी कभी
उभरे ही नहीं
दर्द-ओ-सकून
भले ही नम थीं
तुम्हारी आंखें !

सच बताना
तुम्हारा अंतस भी
क्या बेखौफ है
इतना ही
जितना है बाहर
तो फिर
कहां से उतर आई
आंखों में झील
मचलती हुई ?

* होना होता है होना*

होना
हर सू होना है
जो चलता रहता है
अपने ही तरीके से
होने के लिए होना
बिन रुके अनवरत 
हर पल-हर दिश !

इसी बीच
किसी की वांछनाओं को
परास्त कर
हमारी वांछनाए भी
चाहती हैं होना
इनके बीच उभरता
द्वंद्व भी तो
होना ही है होने का !

होने का न होना भी
होना ही है
अनहोना नहीं
जैसे कि चाहने पर
रात का
बड़ा-छोटा न होना
या फिर सब का
ढल जाना
हमारे अनुरूप
जीवन और मृत्यु
कुछ बड़े जरूर हैं
होने से मगर
नहीं है कत्तई विलग !

*मेरे भीतर चंद्रमा*

खंडित है
फिर भी
रात-रात भर
अटल चमकता है
दूधिया चांदनी बिखेरता
मेरी छत पर
मासूम सा चंद्रमा
एक मैं ऊपर से
समुचिम सालम
टूटा मगर भीतर से
देख-देख जागता हूं
उस पल की प्रतीक्षा में
चांद छिपे तो सोऊं !

मुझे
भय चांद का नहीं
वह तो है
भीतर कहीं
जहां छिपा है
कोई और चंद्रमा !