गुरुवार, अप्रैल 24, 2014

चलते हुए

चलते हुए लड़खड़ाने लगे हैं ।
नींद में भी बड़बड़ाने लगे हैं ।
ये मोहब्बत का ही असर है यार ।
नुस्ख़े नाहक आजमाने लगे हैं ।।

अंधेरा अब जाएगा नहीं

मेरे घर के ठीक सामने से
ऊपर उठता हुआ
दौड़ता आया सूरज
दिन भर भागा 
मेरे घर की छत के ऊपर से
लांघता हुआ
चढ़ गया
मेरे घर के पिछवाडे़
ऊंची पहाडी पर
मैं भागा उसे थामने
बहुत चिल्लाया भी-
पहाडी़ पर मत चढो़
उस पार लुढ़क जाओगे
वह नहीं माना
चढ़ ही गया आखिर
दिखता नहीं
लुढ़क ही गया होगा
उस पार
तभी तो
तब से पसर गया है
यह जो अंधेरा
अब जाएगा नहीं
जब तक सूरज आएगा नहीं ।

अब मैं ही जाऊंगी
तमतमाता हुआ सूरज लाने
सांझ से भोर तक
उसके पीछे दौड़ती
हांफ़ती हुई आई बोली
दम तोड़ती रात
मोहल्ला अब तक जो मौन था
उठ खडा़ हुआ अचानक
मेरी बांह थाम कर बोला
तुम नहीं जाओगे
हमारे लिए लाने एक सूरज
तभी से भिंची हैं शायद
मेरी मुट्ठियां मोहल्ले पर ।

हमारे बीच

निस्तब्धता थी
हमारे पासंग
ना मैंने 
मुंह से कहा
ना तुम ने 
कानों से सुना
फिर भी 
मैंने कहा
तुमने सुना
कोई और ही था
हमारे बीच माध्यम
जो जोड़े रहा हमें
आंख और दुख की तरह
बहता रहा वह
आंसू की तरह !

मैं काल के अंश का अंश

शब्द ही था
उसके भीतर-बाहर
वह मैं- मैं करता रहा
देह छूटी तो
मैं ही भागा पहले
शब्द तो फिर भी
भरता रहा साख
उसके कभी होने की ।

मेरे भीतर-बाहर भी
ध्वनित होता है शब्द
जो ढो रहा है
मुझ तक काल को
या फिर मुझे काल तक ।

शब्द ही लाता है
ढो-ढो नश्वर पीड़ाएं
नश्वर तन से बाहर
शब्द में ही बसता है
समूचा विराट
ब्रह्म और ब्रह्मांड भी
काल के सकल अंश
होते हैं बिम्बित
शब्द के ही प्रकाश में
मैं भी हूं
काल के अंश का ही अंश
मेरे भीतर भी हैं
उस सकल को धारते शब्द !

दर्द सने शब्द

हर बार
हंस कर बोलूं ;
कौशिस करता हूं 
दर्द सने शब्द
उदासियां ओढ़
आते हैं बाहर
ढोते नहीं हंसी
फिर भी
हंसना चाहता हूं
इस लिए
ढूंढ़ रहा हूं
उन्हें अपने भीतर
तब तक तुम
मायूस मत होना
हंस लेना मुझ पर
तुम्हारी हंसी
बहुत मायने रखती है
मेरे लिए !

रविवार, अप्रैल 13, 2014

*हारे भी क्यों पानी*

पानी में हलचल है
भीतर-बाहर जरूर
कोई हरकत है
किसी ने फैंका होगा
पानी में पत्थर
या फिर
पानी के नीचे से
खिसकी है जमीन ।

पानी तो
हो जाएगा स्थिर
देखना एक दिन
उस के विरुद्ध
जारी रहेंगे षड़यंत्र ।

पानी को
नहीं जीतना है
कोई युद्ध
मगर हारे भी क्यों
किसी का पानी !

वोटर और नेता उवाच

चुनाव आते ही
आ गए नारे
अज़ीब-अज़ीब
और प्यारे-प्यारे
कुछ कह रहे हैं
हमारे संग चलो
यदि आपको
ये देश बचाना है
वोटर बोला
हम को बख्शो भाई
आप ही चल लो
हम तो दो रोटी खाते हैं
दोनों ही पच जाती है
चल -कर आपको ही
अब तक "खाया" पचाना है
देश क्या खाक बचाना है ।

एक बोला
फ़लाना जी को लाओ
देश बचाओ
वोटर बोला


ये फ़लाना जी
कहीं गए हुए हैं क्या
क्या खुद उनको
अपना देश नहीं दिखता
दिखता है तो फ़िर
खुद आ क्यों नहीं जाते ।

एक बोला
आधी रोटी खाएंगे
फ़लाना जी को जिताएंगे
वोटर बोला
हम खद कमाएंगे
और पूरी रोटी खाएंगे
यदि फ़लाना जी
सो करोड़ लोगों की
आधी-आधी रोटियां खाएंगे
तो उनका पेट फ़ट जाएगा
क्या वो मर नहीं जाएंगे ।
=

*कबुत्तरपन*

आप
कबूतर की तरह
आंख मूंद कर
नहीँ बच सकते
आपको देखना ही होगा
जो तुम्हारी ओर 
बढ़ रहे हैं वे
पालतू बिल्लियोँ सरीखे
हरगिज नहीँ हैँ 
तुम्हारा ये कबूतरपन
उनकी पूंजी
और
आपकी मौत का
साक्षात कारण है !

या तो आपको
दौड़ कर
बिल्लियों से
निकलना होगा
बहुत दूर
या फिर
झपटना ही होगा
पलट कर उन पर !

याद रखना
आपका कबूतरपना
जंग मेँ 
हार की स्विकारोक्ति है
आपकी अपनी !

* चिंताएं *

दम तोड़ती सड़क के किनारे
फुटपाथ पर छितराए
कंकरीट पर तप्पड़ बिछा
अपनी गृहस्थी के संग
सांझ ढले से बैठा
कितना खुश है नत्थू !
रोटी आज नहीँ मिलेगी
जानते हैँ उसके परिजन
मग़र उनकी चिंताओँ मेँ
रोटी नहीँ
फिक्र है
नींद मेँ सोई अम्मा की
जो नहीँ है शामिल
आज रात हथाई मेँ ।

उधर
अघाए पेटोँ के ऊपर
अटकी है सांसे
गिरवी पड़ी है
कई दिनोँ की नींद
अज्ञात चोरोँ के यहां !

*पहाड़ बिफर गया*

ऊपर उठे-तने
पहाड़ोँ के शिखर
छू कर क्या बोली हवा
पूछने झुका दरख्त
चरमरा कर टूट गया
अंग अंग बर्फ रमा
बैठा मौन साधक 
साक्षात शिव सरीखा
कई कई नदियोँ से
अभिषेक पा कर भी
पहाड़ नहीँ बोला
बोला तो तब भी नहीँ
जब तूफानोँ ने झकझोरा !
पहाड़ उस दिन
बोला और सरक गया
जब उसके भीतर
कुछ दरक गया
अंतस की अकुलाहट
लावा दर्द घुटन का
बिखर गया
दूर जंगल मेँ
मौन पहाड़ बिफर गया ।

*मेरे भीतर*

मेरे भीतर
एक बच्चा
एक युवा
एक जवान
एक प्रोढ़
एक स्त्री भी है
स्त्री डरती है
बाकी मचलते हैँ
बुढ़ापे के जाल फैँक
मेरे भीतर को
कैद किया जाता है
इस जाल से भयभीत
मेरे भीतर के सभी
मेरा साथ छोड़ जाते हैँ
पासंग मेँ रहती है
एक स्त्री
जो हर पल
डरती रहती है !

**आओ खत लिखेँ**

मोबाइल और मेल से
समचारोँ का
नकद भुगतान रोक कर
आओ 
आज फिर से खत लिखेँ
खत मेँ 
सारी गत लिखेँ
खुशियां लिखेँ
गम लिखेँ 
शिकवे लिखेँ
शिकायत लिखेँ
फिर करेँ इंतजार
खत के पहुंचने का
कुछ वक्त मगर
जरूर लगेगा
आओ


तब तक सोचेँ
शायद तब तक
खुशियां फैल जाएं
दसोँ दिशाओँ मेँ
गम दम तोड़ जाएं
हमारे शिकवे शिकायत
हमारी ही
नासमझी घोषित हो जाए !

आओ उड़ाएं
अपनी अपनी छत से
एक एक कबूत्तर
जो ले कर जाए
अपनी चोँच मेँ
प्रीत की पाती
जिसे बांटे धरा पर
कुछ ले जाएं
बादलोँ के पार
जहां हो सकते हैँ
हमारे अंशी
मानव वंशी !

*हर बार हारत सूरज *

अनन्त काल से
अंधकार शाश्वत
अटल स्थिर
प्रकाश आता
झपटता अंधकार पर
कुछ काल रहता
आगोश मेँ ले उसे
फिर जाना ही होता है
क्षरित हो 
अस्ताचल मेँ
हर बार जीतता है
अंधकार ही !

प्रकाश होता है
उम्मीद हमारी
इसी लिए गाते हैँ
हम गीत उसी के
यह जानते हुए भी
कि अटल है अंधकार
हम उगाते रहते हैं
फसल प्रकाश
जिस मेँ लगता नहीँ
फल प्रकाश का !

गर्भ का अंधेरा
याद रहता नहीं
याद आता है
सुबह से शाम का
तमतमाता सूरज कल का
अंधकार से जूझता
हर बार हारता सूरज !

*पानीदार पानी*

मेरी प्यास के लिए
पानी नहीँ आया
पानी लाया गया
अपने पानी के लिए !

पानी के लिए
लोग दौड़े
पानी के लिए ही
अड़े-भिड़े
लड़े-मरे
कहीं पानी देखा गया
कहीँ देख लेने की बात हुई
कहीँ पानी बचाया गया
कहीँ कही उतर भी गया !

पानीदार चरित्रों की
कहानियां लिखी गईं
इतिहास रचा गया
पानीदारों का
हम तरसते रहे
प्यास भर पानी को !

पानी तो
हम भी बचाते रहे
बचा नहीँ मगर कभी भी
हमारा पानी
कभी भी


पानी की संज्ञा में
आंका ही नहीं गया ।

अब वे
लाए हैँ समाचार
दूर देश से ;
अगला युद्ध
पानी के लिए होगा
इस लिए पानी बचाओ !

मां कहती है
मैंने तो
घर के भीतर भी
भयानक युद्ध देखे हैँ
पानी के लिए
अब तो
उतरने लगा है
तांबे के गहनों से
सोने का पानी
जो कभी चढ़ाया गया था
घर के पानी के लिए !

*पेट दिखाता है दिशाएं*

मैं पंछी
कहां बैठता हूं
एक डाल 
उड़ उड़ जाता हूं
जंगल दर जंगल
पेड़ दर पेड़
शाख दर शाख
इस में
उपक्रम चाहे पंखों का है
हौसला तो पेट ही देता है !

पेट दिखाता है दिशाएं
मौन आंखे
देखती रहती है आगत
पंख फड़फड़ा कर
उड़ा ले जाते हैं
दूर देश
याद रहता है अंतस को
अपना आसमान
अपना पेड़
अपना घौसला
अपनी टहनी
अपनी वह ज़मीन
जिस पर खड़ा है
अपने वाला
वह बूढ़ा पेड़ !

चौंच का भक्षण वही
जो पेट की चाहत
रसना का वाक वही
जो ज़मीन की चाहत
ज़मीन ने उचरवाया
राम-राम !
अल्लाह-अल्लाह !!
वाहे गुरु-वाहे गुरु !!!
यीशु-यीशु !!!!
रसना ने उचारा !

पेट का पेटा भरते ही
गुलाम हुई स्वक्रियाएं
पंख छोड़ गए साथ
मीत हुए क्षुधा के
मूक संवेदानाएं
निहारती रहीं अंतस में
अपना पेड़-अपना घौसला !

*बच्चा बन जाएं*

आओ आज फिर
बच्चा बन जाएं
कुछ तोड़ें
कुछ फोड़ेँ
तोड़ फोड़ कर 
फिर से जोड़ें
जुड़ जाए तो जुड़ जाए
नहीं जुड़े तो मचलें,रोएं !

सरदी की बरखा में
नम हुई मिट्टी को
पैरोँ पर थाप-थाप
एक एक घरोंदा बनाएं
अपने घरोंदें पर इतराएं
साथी का सुन्दर हो तो
तोड़ें और भाग जाएं
अपना टूटे तो रोएं चिल्लाएं
सुबक सुबक नाक पौंछते
अपने घर को जाएं ।

लगी ठंड पर
खाएं डांट अम्मा की
रूठें और कुछ ना खाएं
दादी के हाथों
पीएं दूध सूखे मेवे वाला
सो जाएं सुन कर
फिर झूठी कहानी
इक थे राजा रानी वाली ।



सब कुछ भूल भाल कर
उठें भोर में
लिपट अम्मां से
प्यार जताएं
नहा धो कर
करें नाश्ता
उठा कर बस्ता
निकलें घर सै
छेड़ छाड़ का फिर से
रच डालें इतिहास
टन-टन की घंटी भीतर जाएं
टन-टन की घंटी बाहर आएं
लौटें घर को धूल सने !

दादा दादी लाल कहे
अम्मा बोले राजा बेटा
बहिना छुटकी की गोदी
बड़की दीदी का मिले दुलार
आओ फिर से
बच्चे बन जाएं इकबार !

बेटी का खत

नेट ओ मोबाइल के
इस शातिर युग में भी
खत आया है बेटी का
लिखी है बेटी ने
खत में गत अपनी ।

सच कहते थे पापा तुम ;
आती नहीं नींद 
रात रात भर बिस्तर में
छत निहारूं
देखूं आंगन
आंखें पसरी जाती हैं
सोए बच्चे
दिखते बढ़ते
बढ़ते खर्चे
गली गली में
होते चर्चे
दिखता खर्च त्यौहारी का !

सास बुढ़ाई
ससुर मुहाने
घर में लगते
सब बतियाने
गंगा चलो
चलें नहाने
सोने की सीढ़ी चढ़ें बडेरे
हाथ खोल कर
बढ़ लो आगे
बोला पंड़ित लगा गुर्राने !

दामाद आपके
बैठे ठाले
खर्ची खूटे आते घर
घर मेँ घुसते लगता डर
काम धाम हाथ नहीं
आमद की कोई बात नहीं
ना झगड़ें हम
ऐसी कोई रात नहीं
दुख मत करना पापा तुम
वैसी ही हैं बातें सारी
जो तुम अम्मां से करते थे
नई तो कोई बात नहीं !

नाती आपका
आया खा कर फेरे
बैठा चौबारे दे कर डेरे
कोई कलमुहा आवारा
नातिन के देता फेरे
यही चिंता रहती घेरे
पापा पड़ी पार आपकी
मेरी मुश्किल लगती है


इस दुविधा में पापा
रात बैठ बैठ गुजरती है ।

संकट सारे
मेरे द्वारे
दौड़ दौड़ क्यों आते हैं
घर में
सोते सभी चैन से
आंसू मेरी आंख भिगोने
क्यों किनारे आते हैं ?
छोड़ो पापा क्या गिनाऊं
दुख वही तो सारे हैं
जिनको ढोते ढोते
तुमने दिन उम्र के गुजारे हैँ
जाओ छुप कर सो जाओ
तुम भी रो कर हो लो हलके
मैंने तो दो पाव उतारे हैं !

बुढ़ापा हुआ बीमारी

तूं जनमा मैं बलिहारी बेटा।
वो खुशियां अब मैं हारी बेटा ।।
छोड़ा घर देश गांव भी अपना ।
ऐसी भी क्या लाचारी बेटा ।।
ममता छोड़ क्या ओहदा पाया ।
हो गए बड़े तुम व्यपारी बेटा ।।
जोड़ जोड़ सपने महल बनाया ।
लगती नहीं अब बुहारी बेटा ।।
बिना सहारे अब पांव न उठते।
बुढ़ापा हुआ बीमारी बेटा ।।
दूर देश मेँ जो जाया पोता ।
सुनी न आंगन किलकारी बेटा ।।
बहू आती घर आंगन सजाती ।
सध जाती दुनियादारी बेटा ।।

प्रीत

आपके किसी श्रम की
पगार नहीं होती प्रीत ।

तुम हंसे
मैं हंसा
दोनों मुस्कुराए
चल भी लिए
साथ-साथ
बहुत दूर तलक
यूं साथ होने का
होती नहीं आधार प्रीत !

मैले को उजला
अंतिम को पहला
कह मानली बातें
कर दिया समर्पण
तन मन सारा
कह दिया
तूं जीता मैं हारा
होती नहीं जीत-हार प्रीत !

मन के बदले मन
दिल के बदले दिल
दे डाला
हम ने तुम ने
तुम ने मारा
अपना मन
मैंने मारा
अपना मन
ले लो
दे दो
होता नहीं व्यपार प्रीत !

प्रीत बसती
भीतर कोठे
न दिल में जाती
न छूती दिमाग
लग जाती है
लगाई न जाती
आग प्रीत की
सुनी-सुनाई ना जाती
बज जाती बिना साज
ऐसी होती प्रीत राग
न जाने कौन रचे
कोई न सृजनहार प्रीत ।

मीठी लगती
प्रीत की बातें
कड़वी भी लग जाती
बातें सारी गुजर जाती
छन छन आती
बहुत सुहाती
आती जब लौट
अपनी मरजी
करती फिर संचार प्रीत !

*पुष्प और पत्तियां*

शाख पर साथ रहे
फूल और पत्तियां
लड़ते रहे साथ-साथ
मनचले झंझावातों से
फूल का रंग
चटख लाल
बहुत भाता
उसे अपलक निहार
मदमाती रहतीं पत्तियां
फूल भी मदमस्त सा
बीच पत्तियों के
करता मानो
रासलीला उपवन में
ना जाने कब यकबयक
पुष्प साथ छोड़ गया
या फिर कोई मनचला
शाख से तोड़ गया !

सौत थी हवा
आती नित उपवन में
छू-छू जाती पुष्प को
इधर-उधर डोलती
उन्मुक्त सी चहकती
आजकल महकती है
उसी ने किया होगा
वरण पुष्प का
सांय-सांय कसमसाती है !