मंगलवार, सितंबर 25, 2012
मुख्य अतिथि जरूरी है

आजकल
हर भले काम के
उद्घाटन व समापन पर
मुख्य अतिथि का होना
कितना जरूरी हो गया
इस सिलसिले में
मुख्य काम भी
गैरजरूरी हो गया !
मुख्य अतिथि के साथ
उतरवाई तस्वीरें
एल्बम में जमा हो
एक दिन
राजतिलक तक
करवाती नज़र आती हैं
शिलापट्टिका पर खुदा
मुख्य अतिथि का नाम
अटल रहता है
मगर उसका लगाया
एक मात्र पौधा
एकांत में मुरझा कर
दम तोड़ देता है
मुख्य अतिथि को भी
उद्घाटन व समापन पर
पौधा लगाना
बहुत भाता है
दुबारा मगर वह
उस पोधे को देखने
कभी नहीं आता है ।
रक्तदान का भी
होता है उद्घाटन
रक्तदाता एक
प्रेरक अनेक
खड़े हो जाते हैं उसे घेर
मुख्य अतिथि के साथ
जो हो जाते हैं गायब
कैमरे की क्लिक
और
मुख्य अतिथि के साथ
फिर चल पड़ती हैं
प्रेस विज्ञप्तियां
अगले दिन की
प्रतिष्ठा के लिए
ये अखबारी कतरने
सचमुच
बहुत काम आती हैं ।
मुख्य अतिथि के साथ
उतरवाई तस्वीरें
एल्बम में जमा हो
एक दिन
राजतिलक तक
करवाती नज़र आती हैं
शिलापट्टिका पर खुदा
मुख्य अतिथि का नाम
अटल रहता है
मगर उसका लगाया
एक मात्र पौधा
एकांत में मुरझा कर
दम तोड़ देता है
मुख्य अतिथि को भी
उद्घाटन व समापन पर
पौधा लगाना
बहुत भाता है
दुबारा मगर वह
उस पोधे को देखने
कभी नहीं आता है ।
रक्तदान का भी
होता है उद्घाटन
रक्तदाता एक
प्रेरक अनेक
खड़े हो जाते हैं उसे घेर
मुख्य अतिथि के साथ
जो हो जाते हैं गायब
कैमरे की क्लिक
और
मुख्य अतिथि के साथ
फिर चल पड़ती हैं
प्रेस विज्ञप्तियां
अगले दिन की
प्रतिष्ठा के लिए
ये अखबारी कतरने
सचमुच
बहुत काम आती हैं ।
गज़ब ग़ज़ल

बहुत सुन्दर है तस्वीर आप की ।
मिलती नहीं मगर शक्ल बाप की ।।
पहन कर भी दिखते हो नंगे ।
डाला करो पतलून नाप की ।।
खा कर आए हो जूत बीवी से ।
बातें करते हो संताप की ।।
अब समझ आया टूटी कैसे ।
लेडीज चप्पल बाटा छाप की ।।
मूंछें रख कर मत समझो यार ।
संतान हो राणा प्रताप की ।।
( दसवीं में पढ़ते वक्त 1974 में लिखी थी । आज सफाई के दौरान मिली )
मूंछें रख कर मत समझो यार ।
संतान हो राणा प्रताप की ।।
( दसवीं में पढ़ते वक्त 1974 में लिखी थी । आज सफाई के दौरान मिली )
आज कोई प्यारा सा सपना देख ।
आज कोई अपनों में अपना देख ।।
कयासों में गुजर जाती है ज़िन्दगी ।।
हकीक़त को पड़ता है तपना देख ।।
============================
.
आकाश में कौई रोया है जार-जार ।
तभी तो आंसू बरस रहे हैं बार-बार ।।
===============================
आज कोई अपनों में अपना देख ।।
कयासों में गुजर जाती है ज़िन्दगी ।।
हकीक़त को पड़ता है तपना देख ।।
============================
.
आकाश में कौई रोया है जार-जार ।
तभी तो आंसू बरस रहे हैं बार-बार ।।
===============================
मसला रोटी का था

भूखा था बच्चा
रोया-चिल्लाया
देखा ना गया तो
मां के मुख से
बात फिसल गई
मसला रोटी का था
घर से मचल कर
बाहर निकल गई ।
घर से निकली
आई सड़क पर
आए नेता न्यारे-न्यारे
लग गया मजमा
गड़ गए तम्बू
धरना चालू
हो गया चंदा
चल गया धंधा
लग गए नारे
प्यारे - प्यारे-
"रोजी-रोटी दे न सके
वो सरकार निकम्मी है
जो सरकार निकम्मी है
वो सरकार बदलनी है"
भूखा नत्थू
बैठा धरने
अनिश्चितकाल तक
भूखा मरने
कोई न उठ कर
ऐसा आया
जो बोले
मैं रोटी लाया
जो भी आया
नारे लाया
लाल-हरे
नीले-पीले
केसरिया-तिरंगे
झंडे लाया !
अखबारों में
छप गई खबरें
खबरों की खातिर
सब गर्जन आए
अगले ही दिन
नेताओं के वर्जन आए
पढ़-पढ़ नेता गले मिलें
और हाथ मिलाएं !
नत्थू बोला
इस खर्चे से
रोटी देते
काहे इतनी तुम
तोहमत करते
उठा रहा हूं
अपना धरना
धरने पर भी
जब भूखा मरना
फिर इस धरने का
क्या करना
मेरी भूख बहाना है
तुम को संसद जाना है ?
घर से निकली
आई सड़क पर
आए नेता न्यारे-न्यारे
लग गया मजमा
गड़ गए तम्बू
धरना चालू
हो गया चंदा
चल गया धंधा
लग गए नारे
प्यारे - प्यारे-
"रोजी-रोटी दे न सके
वो सरकार निकम्मी है
जो सरकार निकम्मी है
वो सरकार बदलनी है"
भूखा नत्थू
बैठा धरने
अनिश्चितकाल तक
भूखा मरने
कोई न उठ कर
ऐसा आया
जो बोले
मैं रोटी लाया
जो भी आया
नारे लाया
लाल-हरे
नीले-पीले
केसरिया-तिरंगे
झंडे लाया !
अखबारों में
छप गई खबरें
खबरों की खातिर
सब गर्जन आए
अगले ही दिन
नेताओं के वर्जन आए
पढ़-पढ़ नेता गले मिलें
और हाथ मिलाएं !
नत्थू बोला
इस खर्चे से
रोटी देते
काहे इतनी तुम
तोहमत करते
उठा रहा हूं
अपना धरना
धरने पर भी
जब भूखा मरना
फिर इस धरने का
क्या करना
मेरी भूख बहाना है
तुम को संसद जाना है ?
चिंतन और चिंताएं

चिन्ताएं अपनी-अपनी
उन पर
अपना-अपना चिंतन
किसी की चिंताओं में
बढ़ती चर्बी
घटता वज़न
चेहरे की झुर्रियां
फैलते मुहांसे
झड़ते बाल
बदलती स्किन
हेयर स्टाइल
आईब्रो शेप
टोटल लुक है ।
किसी को चिंताओं में
बैंक बैलेंस
शेयर का उतार-चढ़ाव
कार का मॉडल
नई पीढ़ी का बाइक
नया बंगला
घर में पड़ी नगदी
बिगड़ती औलाद है ।
कुछ की चिंताओं में है
हसीन चेहरा
उलझी-सुलझी लट
गाल गुलाबी
नयन शराबी
चाल मस्तानी
पायल की झंकार
पहला-पहला प्यार !
इन चिंताओं में
दुबले पड़ते लोग
लिख -लिख कविताएं
अपनी चिंताएं
संवार रहे हैं !
अपना नत्थू
रोटी की चिंता में
जागता है दिन भर
रोटी की चिंता में ही
सोता है रात भर
सपनों में भी
सेकता है रोटियां
जब खूट जाती हैं
सपनों में रोटियां
उचक कर
जाग जाता है
काम की तलाश में
भाग जाता है ।
झड़ते बाल
बदलती स्किन
हेयर स्टाइल
आईब्रो शेप
टोटल लुक है ।
किसी को चिंताओं में
बैंक बैलेंस
शेयर का उतार-चढ़ाव
कार का मॉडल
नई पीढ़ी का बाइक
नया बंगला
घर में पड़ी नगदी
बिगड़ती औलाद है ।
कुछ की चिंताओं में है
हसीन चेहरा
उलझी-सुलझी लट
गाल गुलाबी
नयन शराबी
चाल मस्तानी
पायल की झंकार
पहला-पहला प्यार !
इन चिंताओं में
दुबले पड़ते लोग
लिख -लिख कविताएं
अपनी चिंताएं
संवार रहे हैं !
अपना नत्थू
रोटी की चिंता में
जागता है दिन भर
रोटी की चिंता में ही
सोता है रात भर
सपनों में भी
सेकता है रोटियां
जब खूट जाती हैं
सपनों में रोटियां
उचक कर
जाग जाता है
काम की तलाश में
भाग जाता है ।
थूक मंथन

समुद्र मंथन कर
निकाल लिए थे
देवताओं ने रत्न
विष और अमृत
कर लिया था
मृत्युलोक को खुशहाल
फिलहाल
हमारे नेताओं ने
उसी तर्ज पर
किया है शुरु
थूक मंथन !
इस थूक मंथन में
पैंसठ सालों के दौरान
यत्न से भी
नहीं निकला
अब तक कोई रत्न
अमृत के आसार
देते नहीं दिखाई
यत्र-तत्र विष की
बह गई नदियां।
अनेकानेक राहू
बैठे हैं आंख गढ़ाए
अमृत के लिए
घात लगाए
विषपान के लिए
एक भी नहीं है शिव !
चलो !
हम ढ़ूंढ़ कर लाएं
कोई शिव
जो पी सके इस बार
थूक मंथन में निकलता
अविरल गरल
जो हो जाए नीलकंठ
या फिर
हम ही हो जाएं शिव !
उसी तर्ज पर
किया है शुरु
थूक मंथन !
इस थूक मंथन में
पैंसठ सालों के दौरान
यत्न से भी
नहीं निकला
अब तक कोई रत्न
अमृत के आसार
देते नहीं दिखाई
यत्र-तत्र विष की
बह गई नदियां।
अनेकानेक राहू
बैठे हैं आंख गढ़ाए
अमृत के लिए
घात लगाए
विषपान के लिए
एक भी नहीं है शिव !
चलो !
हम ढ़ूंढ़ कर लाएं
कोई शिव
जो पी सके इस बार
थूक मंथन में निकलता
अविरल गरल
जो हो जाए नीलकंठ
या फिर
हम ही हो जाएं शिव !
अपना घर

हर कोई
बहुत खुश है
अपने ही घर में
आदमी तो बहुत जादा !
घर से बिछुड़ते वक्त
होता है उदास
रोता है बहुत
जब होता है
घर से बहुत दूर
घर की याद में
घर का आदमी ।
कुछ आदमी
अपने घर
कांच के बर्तन में
रखते हैं मछलियां
जो नहीं है
उनका घर
मछलियों का दर्द
अपने दर्द सा
क्यों नहीं समझता आदमी !
जब होता है
घर से बहुत दूर
घर की याद में
घर का आदमी ।
कुछ आदमी
अपने घर
कांच के बर्तन में
रखते हैं मछलियां
जो नहीं है
उनका घर
मछलियों का दर्द
अपने दर्द सा
क्यों नहीं समझता आदमी !
====================
वक्त गुजरेगा ;
इसी इंतजार में
न जाने कितने लोग
वक्त से पहले
गुज़र गए ।
आस
.जब सब सो गए
अपने-अपने घरों में
पसर गया सन्नाटा
सड़कों पर आ
आसमान की तरफ
अपने मुख उठा
भौंकने लगे
मोहल्ले भर के कुत्ते
आवारा कुत्तों की
तान में मिला दी तान
पालतु कुत्तों ने ।
कुछ लोगों ने कहा
यह निनाद है कुत्तों का
पहरेदारी का ऊसूल
कुछ ने कहा
कुत्तों को दिखती हैं
मृत आत्माएं
ये भौंकते हैं उन पर
कुछ लोगों ने
दबी जुबान कहा
भूखे हैं कुत्ते
दरवाजा बन्द कर
सोने वालों को
दे रहे हैं गालियां
लोगों के सो जाने पर
रोटी की आस टूट गई
बस इसी बात पर
इनकी रुलाई छूट गई !
आवारा कुत्तों की
तान में मिला दी तान
पालतु कुत्तों ने ।
कुछ लोगों ने कहा
यह निनाद है कुत्तों का
पहरेदारी का ऊसूल
कुछ ने कहा
कुत्तों को दिखती हैं
मृत आत्माएं
ये भौंकते हैं उन पर
कुछ लोगों ने
दबी जुबान कहा
भूखे हैं कुत्ते
दरवाजा बन्द कर
सोने वालों को
दे रहे हैं गालियां
लोगों के सो जाने पर
रोटी की आस टूट गई
बस इसी बात पर
इनकी रुलाई छूट गई !
ओजोन में छेद
विश्व भर के
नेताओं ने कहा
आसमान की
ओजोन परत में
बड़ा सा छेद है
उस छेद को
जल्दी भरना होगा
वरना शीघ्र ही
समूचे विश्व को
बेमौत मरना होगा !
भारतीय नेता बोला
इस में तो जरूर
किसी दुष्यन्त कुमार का
खतरनाक हाथ होगा
भारत में जा कर
उसे ढ़ूंढ़-ढांढ़ कर
अंदर धरना होगा !
*
भारतीय नेता
भारत मे आ कर बोला
आसमान में एक छेद है
उसको भरना होगा
इसके लिए
गांव-गांव में जा कर
चंदा करना होगा
विपक्षी बोले
चंदा होगा तो
राजघाट पर
विशाल धरना होगा ।
आखिर में जा कर
संयुक्त रात्रि भोज पर
मसला हल हो गया
दिल मिल गए
छेद पड़ा रहा
भेद खुल गए !
समूचे विश्व को
बेमौत मरना होगा !
भारतीय नेता बोला
इस में तो जरूर
किसी दुष्यन्त कुमार का
खतरनाक हाथ होगा
भारत में जा कर
उसे ढ़ूंढ़-ढांढ़ कर
अंदर धरना होगा !
*
भारतीय नेता
भारत मे आ कर बोला
आसमान में एक छेद है
उसको भरना होगा
इसके लिए
गांव-गांव में जा कर
चंदा करना होगा
विपक्षी बोले
चंदा होगा तो
राजघाट पर
विशाल धरना होगा ।
आखिर में जा कर
संयुक्त रात्रि भोज पर
मसला हल हो गया
दिल मिल गए
छेद पड़ा रहा
भेद खुल गए !
आने दो सपनों को

लम्बी व सकून भरी
निरापद रात में भी
दिखें मनवांछित सपने
जरूरी तो नहीं !
हमारा जिस्म
चाहे गौरा हो
या फिर हो काला
कभी भी तन के रंग
सपनों में नहीं उतरते
मन को रंगते है
दुनियावी इन्द्रधनुष में
उभरे वर्ण-अवर्ण
चाहे अखरती रहें
रंगविहीन प्रतिक्रियाएं
सपनों में तो प्रतिबिम्ब
हो ही जाते हैं प्रत्यक्ष ।
स्याह रात में
उजले सपने
उजली रात में
स्याह सपने
आ ही जाते हैं
चाह के विरुद्ध
जिस दुनिया से
हम तक आते हैं
मीठे-कड़वे सपने
वह कहीं और नहीं
हमारे ही भीतर
रची गई होती है
हमारे ही द्वारा !
रोको नहीं
आने दो सपनों को
सपने जब भी आते हैं
ले कर कुछ नहीं
कुछ न कुछ
जाते हैं दे कर
चाहे वह हो
अगली रात की नींद !
कभी भी तन के रंग
सपनों में नहीं उतरते
मन को रंगते है
दुनियावी इन्द्रधनुष में
उभरे वर्ण-अवर्ण
चाहे अखरती रहें
रंगविहीन प्रतिक्रियाएं
सपनों में तो प्रतिबिम्ब
हो ही जाते हैं प्रत्यक्ष ।
स्याह रात में
उजले सपने
उजली रात में
स्याह सपने
आ ही जाते हैं
चाह के विरुद्ध
जिस दुनिया से
हम तक आते हैं
मीठे-कड़वे सपने
वह कहीं और नहीं
हमारे ही भीतर
रची गई होती है
हमारे ही द्वारा !
रोको नहीं
आने दो सपनों को
सपने जब भी आते हैं
ले कर कुछ नहीं
कुछ न कुछ
जाते हैं दे कर
चाहे वह हो
अगली रात की नींद !
घर भी करता है याद
घर से दूर होने पर
घर के लोग ही नहीं
घर भी करता है
हमारा इंतजार
भले ही है बेजान
घर की हर चीज
करती है याद
हमारी छुअन !
बहुत दिन बाद
हम जब आते हैं
अपने घर
घर की दहलीज
दरवाजा और खिड़ियां
लगते हैं मुस्कुराते हुए
मानो कर रहे हैं
खुल कर
हमारा स्वागत !
आंगन में बैठ
चाय पीते हुए
हर चुस्की में
टपकती सी लगती है
प्याले की खुशी
भोजन की थाली में
माँ के हाथ पकी
सब्जी और रोटियां
हमारे आगमन पर
झूमती सी दिखती हैं ।
गहन रात्रि में
जब हम जाते हैं
सोने के लिए
कितना खिलखिलाती हुई
हमें सुलाती सी लगती है
हमारे घर की खाट
छत तो जैसे
अपलक
निहारती ही रहती है
रात भर हमें !
हमारा इंतजार
भले ही है बेजान
घर की हर चीज
करती है याद
हमारी छुअन !
बहुत दिन बाद
हम जब आते हैं
अपने घर
घर की दहलीज
दरवाजा और खिड़ियां
लगते हैं मुस्कुराते हुए
मानो कर रहे हैं
खुल कर
हमारा स्वागत !
आंगन में बैठ
चाय पीते हुए
हर चुस्की में
टपकती सी लगती है
प्याले की खुशी
भोजन की थाली में
माँ के हाथ पकी
सब्जी और रोटियां
हमारे आगमन पर
झूमती सी दिखती हैं ।
गहन रात्रि में
जब हम जाते हैं
सोने के लिए
कितना खिलखिलाती हुई
हमें सुलाती सी लगती है
हमारे घर की खाट
छत तो जैसे
अपलक
निहारती ही रहती है
रात भर हमें !
मैं अब पेड़ नहीं

एक रात अचानक
मेरा समूचा कमरा
जंगल में तब्दील हो गया
दरवाजे-खिड़िकियां
मेज-कुर्सियां
पलंग-सोफों में
निकल आई टहनियां
टहनियों पर पत्ते
पत्तों के बीच फूल
फूलों के बीच फल
फलों पर पक्षी
फूलों पर भंवरे
समूचा कमरा
जंगल की तरह
चहक गया गुंजार से
महक गया महक से
फिर तो मेरे कमरे में
बहार सी आ गई !
जंगल की बहार में
मैं भी बह गया
पेड़-पौधों से लिपट
गाने लगा तराने
किसी की थर्राती हुई
तेज आवाज आई
"जंगल छोड़ दो"
मैँ चिल्लाया
मैं जंगल नहीं छोड़ूंगा
वह पेड़ भी बोला
जिस से लिपटा था मैं
मैं अब पेड़ नहीं
महज पलंग हूं
खिड़कियां-दरवाजे भी
नहीं हैं पुष्पित पौधे
हमें छोड़ दो
अचानक आंख खुल गई
सामने खड़ी
माँ कह रही थी
अब पलंग छोड़ दो !
पत्तों के बीच फूल
फूलों के बीच फल
फलों पर पक्षी
फूलों पर भंवरे
समूचा कमरा
जंगल की तरह
चहक गया गुंजार से
महक गया महक से
फिर तो मेरे कमरे में
बहार सी आ गई !
जंगल की बहार में
मैं भी बह गया
पेड़-पौधों से लिपट
गाने लगा तराने
किसी की थर्राती हुई
तेज आवाज आई
"जंगल छोड़ दो"
मैँ चिल्लाया
मैं जंगल नहीं छोड़ूंगा
वह पेड़ भी बोला
जिस से लिपटा था मैं
मैं अब पेड़ नहीं
महज पलंग हूं
खिड़कियां-दरवाजे भी
नहीं हैं पुष्पित पौधे
हमें छोड़ दो
अचानक आंख खुल गई
सामने खड़ी
माँ कह रही थी
अब पलंग छोड़ दो !
अपने दिनों की बात

वो कहा करते थे
बहुत सुन्दर हैं
तुम्हारे दांत
अनार के दानों सरिखे
मोती से बिखर जाते हैं
चारों दिशाओं में
जब खिलखिलाती हो
सुनाई देती है
तुम्हारी हसी की खनक
मैं मुस्कुरा कर कहती
कितना झूठ बौलते हो
देखो तो
आज चबाए नहीं जाते
रोटी के दो कोर
दादी बता रही थी
अपनी सहेली को
अपने दिनों की बात !
पास ही बैठा
ठहाका मार कर हसा
उसका पोता
बोला-
बुड्ढ़े भी देखो
कितना झूठ बोलते हैं !
मुस्कुराती हुई
दादी ढूंढ़ने लगी
पोते के चेहरे में
अपना और "उनका" चेहरा
दादी खो गई
और गहरे अतीत में !
तुम्हारी हसी की खनक
मैं मुस्कुरा कर कहती
कितना झूठ बौलते हो
देखो तो
आज चबाए नहीं जाते
रोटी के दो कोर
दादी बता रही थी
अपनी सहेली को
अपने दिनों की बात !
पास ही बैठा
ठहाका मार कर हसा
उसका पोता
बोला-
बुड्ढ़े भी देखो
कितना झूठ बोलते हैं !
मुस्कुराती हुई
दादी ढूंढ़ने लगी
पोते के चेहरे में
अपना और "उनका" चेहरा
दादी खो गई
और गहरे अतीत में !
प्रेम एक सफर है

एक लड़के से
एक लड़की मिली
दोनों में क्या बात हुई
इस पर
बातें घड़ी गई
बातें बनाई गई
बातें उड़ाई गई
बातें बिगाड़ी गई
बातें बिगड़ीं तो
बातें चलाई गई
बातें चल गईं तो
बात बिठाई गई
बात बैठ गई तो
बात बन गई
बात बन गई तो
बात जमीं नहीं
बात जमी नहीं तो
बात समझाई गई
बात मगर थमी नहीं
युग बीत गए
बात किस्सा बन गई
किस्से चल निकले तो
प्रेम कहानी कहलाए
फिर तो वही प्रेम
उदाहरण बन गया
मंदिर-मज़ार भी बने
किस्से सुनाए जाने लगे
कहानी पढ़ी जाने लगी
उदाहरण दिए जाने लगे
शीश नवाए जाने लगे
चादरें चढ़ने लगीं
मेले सजने लगे
प्रेम पर मगर
पाबंदी यथावत रही ।
आज भी
प्रेम उचकता है
कान उठते हैं
जुबान चलती है
बातें निकलती हैं
प्रेम मगर थमता नहीं ।
प्रेम एक सफर है
बातों पर ही
हो कर सवार
शायद आया है प्रेम
इस सदी तक !
बातें बिगड़ीं तो
बातें चलाई गई
बातें चल गईं तो
बात बिठाई गई
बात बैठ गई तो
बात बन गई
बात बन गई तो
बात जमीं नहीं
बात जमी नहीं तो
बात समझाई गई
बात मगर थमी नहीं
युग बीत गए
बात किस्सा बन गई
किस्से चल निकले तो
प्रेम कहानी कहलाए
फिर तो वही प्रेम
उदाहरण बन गया
मंदिर-मज़ार भी बने
किस्से सुनाए जाने लगे
कहानी पढ़ी जाने लगी
उदाहरण दिए जाने लगे
शीश नवाए जाने लगे
चादरें चढ़ने लगीं
मेले सजने लगे
प्रेम पर मगर
पाबंदी यथावत रही ।
आज भी
प्रेम उचकता है
कान उठते हैं
जुबान चलती है
बातें निकलती हैं
प्रेम मगर थमता नहीं ।
प्रेम एक सफर है
बातों पर ही
हो कर सवार
शायद आया है प्रेम
इस सदी तक !
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