मंगलवार, सितंबर 25, 2012

[] तलाश []


उनकी रसोई मेँ
पकते रहे
वे कबूतर
जो कभी हम नेँ
शांति और मित्रता की
तलाश मेँ
उड़ाए थे ।

हम


आज भी
शांति और मित्रता की
तलाश मेँ हैँ

वे फक़त
कबूतरोँ की फिराक मेँ !

<> करते हुए याचना <>


समूचे देश में
त्यौहार है आज
सजे हैं वंदनवार
बंट रहे हैं उपहार
हो रही हैं उपासनाएं
और अधिक की याचनाएं !

पाषाणी पेट वाले
देवता पा रहे हैं
धूप-दीप-हवियां
तेत्तीस तरकारी
बत्तीस भोजन
छप्पन भोग
अखंड-निःरोग !

आज निकले हैं

लाव-लाव करते
कुलबुलाते पेट
बचा-खुचा-बासी
पेट भर पाने
लौटेंगे शाम तक
न जाने कितनी खा कर
झिड़कियांसनी रोटियां !

आज रात

झौंपड़पट्टी में
मा-बाप निहाल
भर भर पेट
सो जाएंगे लाल
कल फिर ऐसा ही हो
करते हुए याचना
अपने देवता से
दुबक जाएंगे
पॉलिथिन की शैया पर !


दो गज़ल

एक-
यार था बेपनाह मुहब्बत कर गया ।
गया तो दर्दे दिल वसीयत कर गया ।।
अलकतरा की तामीर था यह शहर ।
जरा सी धूप उतरी तो पसर गया ।।
पहाड़ों से जो पत्थर उतारे गए ।
नीचे उन्हीँ मेँ लामकां उतर गया ।।
रात भर तलाश जारी रही उसकी ।
सुबह जो हुई तो वो चांद मर गया ।।
पत्थर से बहुत ठोस था दिल उसका ।
ना जाने कोई कैसे उतर गया ।।

================================= 
दो-

अपनी हर बात पर तमाशा किए बैठै हैं ।
बडी़ ही सही हम तोआशा लिए बैठै हैं ॥

अपने दिल-ए-कांच की हिफ़ाजत करूं कैसे ।
वो शहर  भर के पत्थर ज़ब्त किए बैठै हैं ॥

उनके गम का हमसाकी बनूं भी तो कैसे ।
वो तो दुनिया के तमाम अश्क पिये बैठै हैं ॥

क्या जाने उनके भी दिल में है इधर सा ।
वो जो अर्से से अपने लब सिये   बैठै हैं ॥

कहां तक थामेंगे हाथ    सफ़र-ए-ज़िन्दगी में ।
वो जो उम्र का हर लम्हा आज जिए बैठै हैं ॥

वो क्योंकर आने लगे अब मेरे अलाव पर ।
जो अपने  दामन में आफ़ताब लिए बैठै हैं ।

॥+॥ बिफरते थार में ॥+॥



पानी नहीं था
प्यास भर
सम्भावानाएं थी
असीम आस लिए
थिरकते जीवन की
बिफरते थार में
जो न जाने कब

खींच लाई
पुरखों को हमारे
अपने मरुथल द्वारे !

सांय-सांय करता

थरथर्राता थार
बाहें पसार
बुलाता रहा
सुलाता रहा
मीठी थपकियां दे ।

मैं भी बुनता रहा

सीने लग सपने
देखता रहा
दौड़ते मृग
तैरती तृष्णा
नहीं पकड़ पाए
हम तीनों
पानी जैसा पानी
फिर भी जी लिया
जीवन जैसा जीवन !

000 डबडबाई आंखें 000



आंख का काम
देखना था
देखते-देखते
क्यों भटक गई
आज अचानक
डबडबा गई क्यों !

दृश्यमान जगत
जगत की क्रियाएं
जरूरी तो नहीं-हों
आंखों की भावन
पवित्र-पावन
फिर क्यों हो जाती हैं
विचलित आंखें
झकझोर तार हृदय के
जोड़ कर खुद से
बह-बह जाती हैं ।

होना तो

होता ही है होना
होना तो नहीं होता
सब कुछ करना
होना करना जोड़ कर
क्यों टलकाती है आंखें
तरल गरल हृदय का
अपना दे कर सान्निध्य ।

मैं अकेला

बैठा मौन
भीतर घटता
घट-घट अघट
उल्टा-सीधा
उलट पलट
बिम्ब जबरी
उन सब का
बाहर बनाती क्यों
ये आंखें हम को
इतना भी
हर पल बरसाती क्यों !

जाना है मुझको

छोड़ जगत
आंख कहां फिर
ये रहने वाली है
इस बात पर भी देखो
आंख भरने वाली है ।


बस पढ़ लो


जिसने भी प्यार बोया है ।
वही जार जार रोया है ।।
प्रीत लाया और बांट दी ।
बस यूं रिश्तों को ढोया है ।।
बीज नफरत के थे हाथ में ।
उस ने भला क्या खोया है ।।
वो खूब उड़ा आकाश में ।

पंछी कब वहां सोया है ।।
आ कर मुझे भी देख यार ।
ये ज़िन्दा है या मोया है ।।

*कोई इंकलाब बोल गया *


लिखनी थी मुझे
आज एक कविता
जो छटपटा रही थी
अंतस-अवचेतन मेरे
अंतहीन विषय-प्रसंग
बिम्ब-प्रतीक लिए ।

अनुभव ने कहा
आ मुझे लिख
जगत के काम आउंगा
तुम्हारी यश पताका
जगत मेँ फहराउंगा !

प्रीत बोली

मुझे कथ
तेरे साथ चल
तुम्हारा एकांत धोउंगी
तू हंसेगा तो हंसूंगी
तू रोएगा तो रोउंगी !

दृष्टि कौंधी

चल सौंदर्य लिख
जो पसरा है
समूची धरा पर
अनेकानेक रंग-रूपों में
जो रह जाएगा धरा
जब धारेगा जरा ।

आंतों की राग बोली

मुझे सुन
जठर की आग बोली
मुझे गुण
पेट की भूख बोली
मुझे लिख
हम शांत होंगे
तभी चलेगा जगत
नहीं तो जलेगा जगत !

मैंने पेट की सुन

आंतो की भूख
जठर की आग लिखदी
कोई इंकलाब बोल गया
कौसों दूर नुगरों का


काग और मैं



 











मैं
जब तक
नहीं आया घर
तब तक
न जाने कितने
काग उड़ा दिए होंगे
मेरे परिजन ने

घर की मुंडेर से !

काग को

मैंने नहीं
उसी के पेट की
भूख ने भेजा था
जैसे भेजा है मुझे
मेरे घर से दूर

प्रीत की प्रीत


हवा के आंचल
बैठ अकेला
उड़ चला बीज
चाहे दिशा रही
गंतव्यहीन हर पल ।

पाया अचानक


स्नेहिल अपनापन
छोड़ हवा का आंचल
उतर गया जमीं पर
पा कर नमी अंकुराया
हुई पल्लवित प्रीत
नेह मुस्काया
हो पुष्पित महका
चहकी प्रकृति
छिड़ गई स्वर लहरी
भंवरों की गुंजन में
जिसे ले उड़ी बयार
मधुरिम महक फैलाने !

प्रकृति के आंचल

पगी प्रीत
प्रकट हो फड़फड़ाए
बीज के बीज
उड़ चले
हाथ बयार का थाम
पसरने लगी
प्रीत की प्रीत !

सपनों की मिट्टी


खुली आंख से
हम ने देखे
सालों सपने
अब तो
थक गईं आंखें
राह भटक कर
औरों की आंखों

सो गए सारे
सपने अपने !

कुछ सपने

थे जो निज अपने
अपनी आंखो में
दम तोड़ गए
सच कहूं तो
सपने खुद
अपना ही
दामन छोड़ गए ।

अब तो

इन आंखों में
सपनों की लाशों का
लगा है अंबार
जिन्हें दफनाता हूं
करता हूं दाह-दाग
दिन रात
मौए सपनों की मिट्टी
लगे ठिकाने
तब देखूंगा
नए सपनें
जो खड़े हैं
पलकों के बाहर
आने से डरते
मेरी भस्मीकुंड आंखो में !

हैप्पी बर्थ डे कान्हां

.

जब हुई धर्म की हानि
तब जन्में थे कान्हां तुम
कर धर्म की पुनर्स्थापना
हुए रवाना कान्हां तुम
अब फिर हालात वही हैं
आज ना धर्म बचा है
ना कर्म-शर्म शेष है

मानव तो बस सचमुच
जीवन का अवशेष है ।

देखो तो कैसे

मानव को मानव
लूट-मार रहा है
आओ तो कान्हां
अब आ जाओ
कण-कण तुम्हें
पुकार रहा है ।

इस बार बच कर आना

पग-पग पर
गप्प-गपोड़ी राधाओं की
भरमार मिलेंगी
कंस-शकुनि
जरासंध-दुर्योधन से
कहीं चतुर चालाक
सत्ता लोभी जनविरोधी
बाहूबली तैयार मिलेंगे !

इस बार कान्हां

बांसुरी मत लाना
तुम्हें नहीं मिलेगा वक्त
कि बजा सको
चैन की बांसुरी
सुनने वाली ना होगी
गोप-गोपियां
वो सेकेंगे रोटियां
तुम्हारी प्रिय गाय
गऊशाला या सड़क पर
मिलेगी
दूध-मक्खण डेयरी में है
तुम चख भी ना पाओगे
ऐसे में बांसुरी कैसे बजाओगे ?

धनुष-तीर-सुदर्शन

मत लाना इस बार
वरना ओलम्पिक में
भेज दिए जाओगे
लाओ तो कोई विचित्र
हथियार ही लाना
जो दिखे नहीं
पर चल जाए
वरना आर्मस एक्ट में
धर लिए जाओगे
फिर तो कान्हा कोर्ट में
लड़-लड़ सड़ जाओगे !

तुम्हारा पिछला जन्म

आज खाने-पीने के लिए
सेलिब्रिटे कर रहे हैं
देखो कितनी धूम मची है
तुम झांकियों में सजे हो
ताका-झांकियों में देखो
कितने युवा लगे हैं
खैर ! छोड़ो !
आओ जैसे आ जाना
मैं जादा बोला तो
तुम्हे बुलाने के जुर्म में
धर लिया जाऊंगा
उम्र भर छूट न पाऊंगा
सो फिलहाल तो
हैप्पी बर्थ डे कान्हा !

क्या कमी है शासन में


रोटी छप गई विज्ञापन में ।
कहो क्या कमी है शासन में ।।
भूखे हो तो चुप ही रहना ।
है लाभ बड़ा अनुशासन में ।।
मतदाता हो तुम देते रहना ।
दम अपना देखो भाषण में ।।
भाग्य अपना तो सत्ता वाला ।

तुम जाये अपने दासन में ।।
काम के बदले मिले अनाज ।
मत ताक राज के राशन में ।।

मजे रात के


मजे रात के
छूट रहे हैं
सोने वाले
सो गए
चांदी वाले
कूट रहे हैं
लोहे वाले

खो गए
मिट्टी वाले
फूट रहे हैं !

जलाना ही होगा अलाव


बर्फ जो जम गई है
तुम्हारे चारों ओर
उसे सिर से उतार
कदमों तले रोंद
दफना कर भूलना
नहीं है बचाव हरगिज !

बर्फ को स्मृतियों में रख
मुक्कमल नेस्तनाबूद की
रचनी ही होगी
कारगर व्यूह रचना
पग-पग सम्भल कर ।

मन-मस्तिष्क को

जमा-जमा कर
कुंद करने वाली बर्फ
कदमों तले दब
रोक देगी तुम्हारी गति
अपनी दुर्गति से
बचाव के लिए
अपने इर्द-गिर्द
जलाना ही होगा अलाव!

कल के लिए

अभी से सम्भलना होगा
रखनी भी होगी
बचा कर चिनगियां
ताकि वक्त जरूरत
जला सको अलाव !


आज़ादी का अर्थ


दादा जी कहते थे
अपने बच्चों को
जादा आज़ादी मत दो
बच्चे बिगड़ जाएंगे
फिर देखना
यही बच्चे एक दिन
आपको खूब रुलाएंगे !


दादा जी चले गए
बच्चों के बच्चे
आजाद हो गए
मचा दिया
घर में कोहराम
फिर घर को
नहीं बचा सके राम !

आज

यही हाल देश का है
आजादी पच नहीं रही
शर्म बच नहीं रही
आजादी के अधाए लोग
उद्दंड हो गए
अपने ही सपने
खंड-खंड हो गए !

आजादी के बाद

स्वशासन नहीं
अनुशासन चाहिए था
वह नहीं आया
इसी लिए
आज़ादी का अर्थ
समझ नहीं आया !

मेरा देश महान है

टेडियम के पीछे
झोंपड़ पट्टी में
15 अगस्त को
नत्थू गरजा
अपुन के
ना रोटी है
ना मकान है
ना कच्छा है
ना बनियान है
फिर भी
मेरा देश महान है!

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 आदमखोर तनहाई मे
कोई तो आओ करीब
दोस्त की बेवफाइ में
हम हैं देखो गरीब !

==================== 

मौत या मीत
कोई तो आ कर
सुला दे गहरी नींद
बहुत थक गया हूं !

===============================
 तुम्हारी अनुपस्थिति में
बहुत बढ़ रही है रात
मैं मगर इस रात में
पल-पल घट रहा हूं !

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आने वालों की कमी


 












मोत सिरहाने आ कर भी टलती रही ।
ज़िंदगी चिता की मानिंद जलती रही ।।
ना नींद आई ना मोत आई ना तुम ।
यूं आने वालों की कमी खलती रही ।।
झपकियों में उभरा आ चेहरा उसका ।
यादें यतीम औलाद सी पलती रहीं ।।
हम यादों में तड़पे तो वो कह गए ।

यह तो तमाम आपकी ही गलती रही ।।
पंचांगों में बदल गईं तारीखें सब ।
ज़िंदगी थाम हाथ अपने मलती रही ।।


( श्राद्धपक्ष में उसकी स्मृति को समर्पित )

आजकल आप


चेहरे पर आपके
आज कल
बहुत रंग
आने लगे हैं
जिन्हें देख कर
अब तो
गिरगिट भी

शर्माने लगे हैं !

रुत आने पर

बोला करते थे
कभी सड़कों पर
लोगों के बीच आप
आजकल तो आप
बेवजह टीवी पर
टर्राने लगे हैं !

पीने को नहीं

झौंपड़ पट्टी में पानी
आप तो जनाब
नहाए हुए भी
नहाने लगे हैं !

खाने पर

पहरा आपका
रहा उम्र भर
मगर
वो जो मर गई
भूख में बस्ती
आप हाथ
उस में भी
विदेशी बताने लगे हैं !

रात गुजरती है

लाखों की
खुले आसमान तले
बेखौफ-बेफिक्र
आप तो
बन्द कमरों में भी
घबराने लगे हैं !

वो लाया था

लाठी-लाठी लंगोटी में
छीन कर आज़ादी
आप तो उसे
पांच कपड़ों में भी
गंवाने लगे हैं !

वो बांट गए प्रेम

पढ़ कर ढाई आखर
आप पढ़-पढ़
हजारों ग्रंथ
ज़हर नफ़रत का
फैलान लगे हैं !

आम और खास


आम आदमी
अपने लिए नहीं
करता है काम
खास के लिए
चाहे तो
दिन भर
कर ले

हाड़ तोड़ काम
खा ले धक्के
मगर
खा नहीं सकता
पाव भर आम !
*
खास आदमी
नहीं करता
कोई भी काम
सोंप कर
आम आदमी को
काम दर काम
बस कमाता है
दाम से दाम !
*
आम के लिए
आम नहीं है
और खास
आम के लिए नहीं !

बुद्धिमान लोग


शब्दों पर
हो कर सवार
कहां से कहां
पहुंच गए
बुद्धिमान लोग !


पहुंचे हुए
यह शातिर लोग
अब
खुद मौन रह
लड़ा रहे हैं
परस्पर शब्दों को
उनकी व्यंजनाओं से
संवेदनाओं से !

उन्हें चिन्ता नहीं

शब्दों के घिसने की
उनके अर्थ खोने की
क्यों कि वे जान गए हैं
शब्द ब्रह्म है
अनश्वर है शब्द
इस लिए ब्रह्मास्त्र है
शब्द चल जाएगा तो
हम भी चल जाएंगे !

चले हुए शब्द

लौटते नहीं कभी
बींधते जाते हैं
सदियों को
सदियों तक
बुद्धि का साम्राज्य
फैलता जाता है
पराजित शब्दधारकों
और
शब्दहीन लोगों पर
अनंतकाल तक !