शुक्रवार, अप्रैल 25, 2014

*सपना*

सामने था
दृश्यमान जगत
आंखों ने देखा
मन मचला
बुद्धि भरमाई
सोच की कोख में
सपना पल गया !

*थमता नहीं मन*

मन उड़ता है 
विराट में बिन पंख
पहुंच जाता है
अवरोध पार कर
अपने वांछित तक
साक्षात पा लेता है 
निर्गंध में भी पूर्ण गंध
निराकार में भी
अपना लक्षित साकार !

किसी के थामे
थमता तो नहीं
व्यथित-प्रफुल्लित मन
व्यथित हो रो लेता है
अपने सुदूर प्रिय से
गले मिल अंतस में
प्रफुल्लित हो
चढा देता है भेंट
सारी प्रफुल्लताएं
अपने मीत की स्मृति को
फिर चाहे हो
नींद का सपना
या फिर खुली आंख का!

मीत का स्पर्श
कहां जरूरी है
जब वो थामे बैठा है
मन को इस तरह
जैसे ठुकी हो
कठोर काठ में
कोई अदृश्य कील
!

* समझो सार *

महका पुहुप उपवन में, चुरा लाई बयार ।
भंवरा जो मचल गया , वो दोषी क्यों यार ।।
चला चुराने महक को, ले कर हरख अपार ।
भंवरे का दोष नहीं, बहका गई बयार ।।
डाली पर वो नाचता, भाया खूब गुलाब ।
सुध-बुध अपनी खो गया, भंवरा बेहिसाब ।।
खुश्बू अपनी समेट लो, जिस पर तुमको नाज ।
बिखरी जो माहोल में , गिर जाएगी गाज ।।
भंवरे है मतवाले , मद पर मरते यार ।
मद को अपने रोक लो, या फिर समझो सार ।।

*प्यार का बीज*

वह बोता रहा
पन्नों पर प्यार
प्रीत के गीत
नहीं हुई वक्त पर
नेह की बारिश
मिली ही नहीं
निकटता की खाद
अवेहलाओं में उगा
उगते ही वह
प्रीत का बिरवा
कुम्हला गया
अब तो
प्यार की जमीन भी
हो चली है बंजर
फड़फडा कर
उड़ गया है
वो कागज भी
जिस पर बोया था
प्यार का बीज !

*मन है आज उदास*

आज मन उदास है
क्यों है उदास
यह तो मन ही जाने
जो बैठा है
फन फैला कर
बुद्धि पर कुंडली मारे !

कौन है दूर
कौन है पास
जिस के लिए है
मन है आज उदास !
किस को सोचूं मैं
कौन सोचता है मुझे
या कि कौन सोच गया
कभी किसी पल
जिसकी छवि
उकेर लेता है मन
एकांत में गुपचुप
फिर दौड़ता है
स्मृतियों के मरुस्थल में
जहां नहीं है कुछ भी
मृगतृष्णा के अतिरिक्त !

आ , लौट आ मन !
आ , मैं सुलाऊं तुझे
विस्मृतियों की
थपकियां दे कर
अपनी बुद्धि के आंगन !

*स्मृतियां:पांच सवाल*

1.
दिन भर 
बंधी रह कर
रात के सन्नाटे में
पा कर एकान्त
क्यों खुल जाती है
अपने आप
स्मृतियों की गठरी ?
2.
दिन भर
घर भर में
मिटाती है भूख
बेल कर रोटियां
कई-कई पेट की
रात की तनहाई में
देह से बडी
क्यों हो जाती है
नेह की भूख ?
3.
दिन भर
ताकती जगत को
देखती शंका से
गहराती रात में
खोया तलाशती
अपना सपना
क्यो झरने लगती हैं
मौन आंखें ?


4.
दिन भर
हर पल
खाली बर्तन सी
खनकती आंखें
रात के अंतिम पहर में
क्यों हो जाती है
यक-ब-यक लबालब
कहां से आता है
इतना पानी ?
5.
दिन भर
भीड़-भाड़ में
दौडता बदन
तोड़ता दिन
सांझ ढले
हो जाता है निढाल
क्यों नहीं तोड़ पाता
ढलती रात
अक्सर वही
तोतड़ती है उसे !

*आवारा नींद*

देह की विश्रांति हेतु
सब कुछ भूल कर
स्वतः चले जाना
अवचेतन में 
शायद होता होगा
नींद का आना
रात भर बिस्तर में 
पडे रहना तो
हरगिज नहीं हो सकता
आराम से सोना
देह के संदेह पर
तंद्रा का टूटना
किसी की स्मृति का
सदेह सा उपस्थित होना
घोषित कर ही देता है
सजग नींद का
असफल उपक्रम !

स्पष्ट है
नींद लाई नहीं जाती
वह तो आती है
आ कर छा जाती है
हमारे चेतन पर !

भला कैसे आएगी
आज आवारा नींद
जो भटक रही है
देह से दूर
पलक झपकते ही
तकिए की जगह /जब
महसूस होता है
तुम्हारा मुडा हुआ हाथ !

*घर जैसा घर हो*

भरा-भरा हो
हरा-भरा हो
घर में जाए
घर में आए
जिन से बंधी हो
प्रीत की डोर
सब हों घर में 
तब होता है
घर जैसा घर !

घर में हो
आटे से भरा कनस्तर
पर्याप्त मसाले
हरी शाक-सब्जियां
छौंक के लिए
तेल -घी
दो वक्त के लिए
चाय-चीनी-दूध
दिन-रात हो बिजली
दवा लायक पैसा
इन सब के लिए हो
दो हाथों को काम
फिर लगता है
घर जैसा घर
वरना भाई
छत से ढकी
इन दीवारों के बीच
बहुत लगता है डर !

घर जैसे घर मे ही
होता है प्यार
प्यार होता है तभी
मनता त्यौहार
चाहे फिर तीज हो
होली-दिवाली
ईद -मुहर्रम
या हो लोहडी-वैसाखी !

गज़ल

हर झूठ को ढोना जरूरी नहीं ।
झूठ पर सच खोना जरूरी नहीं ।।
माना जमाने का दर्द उठाए हो ।
इस बात पर रोना जरूरी नहीं ।।
माना बाकी रही नींद आपकी ।
हर रात तो सोना जरूरी नहीं ।।
माना तसल्ली से देखा है ख्वाब ।
ख्वाब सच तो होना जरूरी नहीं ।।
जरूरी है जंग छाया के लिए ।
सूरज मगर खोना जरूरी नहीं ।।

*उसकी बातें*

वह चुप नहीं रहा
हम बोल नहीं सके
उसकी बातों पर
हसना मुश्किल था
तो रोना गैरजरूरी
इस लिए
घुटन अपने हिस्से
और बातें
उसके हिस्से रहीं
वह अपनी तकदीर पर
इतराता रहा
हम अपनी किस्मत पर
खीझते रहे उम्र भर !

आंखे ही थी
जो थीं आमने-सामने
हमारी झपकती नहीं थी
उनकी उठती नहीं थी
आंखों की भाषा से
वह खाता था खौफ
इस लिए वह
हर मुलाकात में
आंखे निकालता था
हमारी आंखें
निकाल लेने की मुद्रा में !

*हाल सुना भाई*

आ बैठ सुना अपना हाल भाई ।
कैसे पिचके हैं ये गाल भाई ।।
मजूरी से आता केवल आटा ।
बता कहां से लाया दाल भाई ।
महंगाई के पड़ते चाबुक नित ।
बची कैसे तुम्हारी खाल भाई ।।
दिन भर खटता तूं और बढ़ते वे ।
कौन बुने है ऐसा जाल भाई ।।
वोट हो तेरा और राज उनका ।
यह कैसा जाल-जंजाल भाई ।।
दिन काटना  कठिन है कितना ।
कैसे काटेगा तूं साल भाई ।।

*कहां है भाषा*

कभी थी हमारे पास
एक समृद्ध भाषा
जो करती थी
मन को पूर्ण अभिव्यक्त
जो मौन में भी
उकेर देती थी
परस्पर संवेदनाओं के
सजीव चित्र
अब कहां है
वह सम्पूर्ण भाषा !

जब से हम
अतिसभ्य हुए हैं
संस्कारित कर ली है
तब से हम ने
अपनी भाषा
त्याग कर मूल भाषा
अपना ली है
एक व्याकरणिक भाषा !

व्याकरण के नियमों में
जो बंधी हो
भाषा वह तो नहीं होती
भाषा तो वह होती है
जिसे पढ़ लिया जाए
किसी लिपि के बिना
जिसे सुन लिया जाए
किसी वाणी के बिना
जिसे समझ लिया जाए
किसी शब्दकोश के बिना
जो लिखी जा सके
हृदय पटल पर !

भाषा तो
सचमुच होती है
माँ और शिशु के पास
जिसे खो देते हैं वे
समझदार होने के बाद !

*साफ दिखते बिम्ब*

1.
हाथ में थी
फिर भी
हाथ में नहीं थी
तकदीर की रेखा !
*
2.
उस के हाथ में
नहीं थी कोई रेखा
आखिर वक्त ने
लिख ही दी
गरीबी की रेखा !
*
3.
रिश्ते
खून के हैं
हमारे बीच
इसी लिए वे
आ जाया करते हैं
कभी-कभी पीने !
*
4.
बात प्रेम की थी
घर भें नहीं था प्रेम
वह तो
बाहर ही था कहीं
कभी-कभी आता था
उमड़-घुमड़ कर
बादल की तरह
कभी वह बरसता
कभी हम तरसते !
*
5.
वह नहीं लिखता
कभी कोई कविता
हर कविता में
रहता है मगर मौजूद !

अपनी हदों में

उनके इरादों की
आज तलक
कभी भी
हद नहीं हुई
यक-ब-यक 
हद पार हो गई
हम बंधे थे
अपनी ही हदों में
हमारी तो भाई
लाचारी भी
लाचार हो गई !

वे आज
हम से जुदा हैं
अपनी ही हदों में
हम हैं लाचार
वे हमारे खुदा हैं !

* विश्वास *

कांच से भी
कमजोर होती है
उम्मीद
तभी तो
टूटने में तनिक भी
देर नहीं लगती !

बीज गणित की
समीकरण से भी
कठिन होता है
इंतजार
जिसे करना 
बूते की बात नहीं
हर किसी के ।

पहाड़ से भी
भारी होता है
विश्वास
वह जहां होता है
वहीं होता है !

*वर्तमान ही है भोग्य*

हमारा वर्तमान ही
प्रत्यक्ष एवम भोग्य है
समस्त सुख भी 
वर्तमान ही देता है
अतीत एव भविष्य
परोक्ष या अपरोक्ष
दुख-संताप ही देते हैं !

वर्तमान से परास्त ही
अतीत एवम भविष्य में
शुभ के लिए झांकता है
अतीत देता है
सदियों का वैमनस्य
ईर्ष्या-राग-द्वेश
प्रतिशोध के विचार
जिन की आंच में
वर्तमान और प्राप्त भी
हो जाता है भस्म !

वहीं भविष्य देता है
वांछित एवम विजय की
कोरी कल्पनाएं
जिनके लिए भटकते
खो देते हैं हम
अपना वर्तमान !

* क्षणिकाएं *

1.
जब तक 
चारा था
चारा खाया
जब नहीं रहा
कोई चारा
तो बेचारा
गया मारा ! 
.
2.
जान बचाने
घुसा बिल में
बिल में था
सांप बेहोश
अचानक
उठ गया
कातर चूहे को
सांप डस गया !


.
3.
समाजवाद की
ले कर क्रेन
चला था उठाने
समाज को
बिगड़ गया
खुद का ब्रेन
समाज पीठ पर
आ बैठ गया
खुद उठ गए !
*दो क्षणिकाएं *
4.
हलकारे के पास
चलाने को है हल
मगर हल नहीं
नहीं चलने का !
5.
देश चलाने के लिए
उनके पास राज है
देश नहीं चल रहा
इस में भी राज है !

*कोई शक नहीं*

चलने से पहले
दूरी पूछते हो
दूरी से पहले
भाड़ा पूछते हो
भाड़े से पहले
पैट्रोल के दाम पूछते हो
दाम से पहले
उस पर टैक्स पूछते हो
फिर खीझते हो
और चल पड़ते हो ।

गर्मी में रात
और
सर्दी में दिन
पसन्द करते हो
आज के लिए नहीं


कल के लिए
बहुत जमा करते हो
खुद नहीं खाते
इस लिए
मिलावट करते हो
वोट डाल कर
भूल जाते हो
भाषण सुनते हो
छले जाते हो
मगर विश्वास करते हो
अत्याचार करते नहीं
सहन करते हो
हक के लिए लड़ते नहीं
चिंता खूब करते हो
और दुबक जाते हो
जागते जरूर हो
मगर
सिर से गुजरने के बाद
इंडियन हो
कोई शक नहीं !

गुरुवार, अप्रैल 24, 2014

*प्रिय मत कहो*

आप ने कहा
हम ने मान लिया
इतने भर से
सच नहीं हो गया
आपका कोई विचार
सच तो शाश्वत है
चाहे मिला नहीं
उसे कोई शब्द ।

यह भी तो सच है
सच मोहताज नहीं
केवल शब्दों का
क्यों कि शब्दों पर
चल जाता है
आपका वशीकरण
आपके अभिमंत्रित शब्द
उतना ही होते हैं व्यंजित
जितना चाहते हैं आप ।

साफ-साफ देखा है
आपके उच्चारित
शब्दों का अर्थ
वह नहीं होता
जो होता है
इस लिए आप मुझे
प्रिय मत कहो
बहुत डर लगता है मुझे !

मुक्कमल दिवाली

घर-घर जले
खुशहाली का दीया
अमन-चैन हो
गांव-गली
नगर-मोहल्ले
ढाणीं-ढाणीं
सब को मिले
घर-कपड़ा
और
रोटी-पानी !

जात-पात
धर्म-सम्प्रदाय
निज स्वार्थ से
उठ कर ऊपर
मत का अपने
लें काम सभी
अपना सब कुछ
करें देश के नाम सभी
बेदाग चुनें नेता अपना
ताकि ना हो फिर
कांडवती सरकार कोई !

ऐसा अगर हम
कर पाएंगे
तो सचमुच हम
इस बार
एक मुक्कमल दिवाली
गर्व से मनाएंगे
फिर सब जन मिल कर
गीत खुशी के गाएंगे
वरना भाई
इस दिवाली तो क्या
हर दिवाली पछताएंगे !