रविवार, अप्रैल 13, 2014

ऊंचो गढ़ भटनेर-दो : कुछ और कविताएं

भटनेर किला राजस्थान के उन कुछेक किलों में से एक है जहां "साका" हुआ था । यह साका भाटियॊ ने छठी शताब्दी में किया था ।
भटनेर और गज़नी तथा लाहौर व हिसार के शासक एक ही थे । एक बार हिसार का राज कुमार उज़्बेकिस्तान की उज़्बेक राजकुमारी का अपहरण कर ले आया । उज़्बेकों ने इसका बदला लेने के लिए लाहौर व गज़नी पर हमला कर भाटियों का नाश कर दिया । उस समय भी भाटियों ने लाहौर व गज़नी में साके किए । भा्टियॊ की बची-खुची सेना अपने राजा के साथ राज चिन्ह ले कर भटनेर आ गए । हिसार का राजकुमार उज़्बेकों से बचने के लिए छुपता फ़िर रहा था । उस ने भागते हुए रास्ते में अफ़वा फ़ैलाई कि "भटनेर का राज कुमार उज़्बेक राज कुमारी को ले गया " यह समाचार सुन कर उज़्बेक भटनेर पर चढ़ आए । उन्होंने भटनेर को तहस नहस कर दिया । उस वक्त भाटी राजपूतॊ ने भटनेर में यह इतिहास प्रसिद्ध "साका": किया था । भाटियों के लिए भटनेर किला एवम यह साका गर्व का विषय है ।
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मैंने भटनेर किले पर जो राजस्थानी कविताओं की सीरीज लिखी है उस में से कुछ का हिन्दी अनुवाद यहा दूसरी किस्त में प्रस्तुत है ।

भटनेर- 3
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महल-दुमहले
ड़्योढि़यां जनानी-मर्दानी
दरबार-दीवान
आम ओ खास
द्वार-मुख्यद्वार
द्वारपाल-पृथ्वीपाल
भट-सुभट
सभी थे घट-घट मेरे
तभी तो था मैं भटनेर ।

मेरी "सही" जाती थी
बहुत दूर-दूर तक
जो लौटती नहीं थी खाली
मेरे नाम में ही था कुछ
या कि काल में उच्चरी
मेरी सज्ञा में ही था सब कुछ
नतमस्तक हो जाते थे
मेरी "सही" के आगे पृथ्वीपाल
तभी तो था मैं भटनेर ।

आज क्यों नहीं है
कुछ भी सही
कहां है मेरी वह "सही"
आप बताओ तो सही ।
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भटनेर -4
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मैंने सुने हैं
विजय के उन्माद में 
निकले , नहीं लौटे
हर-हर महादेव के बोल
जौहर की चिताओं में
सुभट भटों की
नारियो के क्रंदन ।

मौत आई नहीं थी
की गई थी आमंत्रित
मुझ भटनेर में
उनके लिए
जो जीने की चाह में
करती थी श्रृंगार
प्रतिदिन नवेला
अपने सुभट पति को
रिझाने के लिए ।

दिखती थी मुझे उन में
देवी घोषित होने से
कहीं और कहीं अधिक
पूर्ण नारी होने की चाहत
पाती थीं राहत
जब लौटते थे
म्यान में डाले तलवार
उनकी सेजों के श्रृंगार ।
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भटनेर-5
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एक नहीं
अनेक संज्ञाएं 
पालीं मैंने
अपनी देह पर
भटनेर होने से पहले।

सोच टकराए
फ़िर टकराई तलवारें
जो भी जीती
उसी ने थमा दी
हर बार नई संज्ञा
मैं ढोता रहा
इतिहास के पन्नों में
संज्ञा दर संज्ञा
अपनी देह के लिए ।

मैं 
आज भी
अपनी ज़मीन पर हूं
भले ही है
देह जर्रजर
अटल हूं मगर मैं भटनेर
कहां हैं वे संज्ञादानी

बाहूबल के अभिमानी ?

"ऊंचो गढ़ भटनेर-एक : कुछ कविताएं

मेरे शहर हनुमानगढ़ का प्राचीन नाम "भटनेर" है । वैदिक नदी सरस्वती के किनारे बसे इस शहर का इस से पहले नाम "सारस्वत ब्राह्मणों का वाटधान" , लोहगढ , भगवान राम के भाई भरत के नाम पर भरतनेर भी रहा है । यहां मध्य ऐशिया का प्राचीनतम किला है जिसकी मुरम्मत 295 ईश्वी में हुई । तब भगवान श्रीकृष्ण के वंशज एवम भाटी राजवंश के भूपत भाटी ने इसे जीत लिया था । भूपत ने अपने पिता राव भाटी के नाम पर इसका नाम "भटनेर" रख दिया । यह किला अधिकांशत: भाटियों के ही अधीन रहा । भारत पर हुआ प्रत्येक हमला सब से पहले इसी किले पर हुआ--जो यहां जीता वही दिल्ली गया । अंतिम बार इस किले को वैसाख सुदि चौथ सम्वत 1805 वार मंगलवार को बीकानेर के शासक महाराजा सूरतसिंह ने जीता था । उस दिन मंगलवार होने के कारण इस किले का नाम भटनेर से बदल कर हनुमानजी के नाम पर हनुमानगढ़ रख दिया । 1962 में भाखडा़ नहर क्षेत्र में आने के कारण इसका नाम " सादुलगढ़" किया गया मगर थोडे़ समय बाद फ़िर से हनुमानगढ़ कर दिया गया ।
मैंने जरजर होते इस पुरा महत्व के ऐतिहासिक किले को घूम घूम कर पढा़ है । इसकी व्यथा कथा को मैंने सुना है , जो कि मेरी राजस्कथानी विताओं में ढल गईं । मैं उन कविताओं का हिन्दी अनुवाद आपके बीच ला रहा हूं । आप भी पढि़ए भटनेर की संवेदनाएं-------

भटनेर-1
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सदा ही
अनाथ नहीं था मैं
सनाथ था कभी तो
कई बार नाथा गया
ज्ञात-अज्ञात हाथों
चतुर मष्तिष्कों द्वारा ।

मेरी जर-जर देह के
कण-कण पर
मिल जाएंगे
अगणित जातियों के
आदिम स्पर्श ।

यूं ही नहीं पसर गया
बावन बीघों में
मैं भटनेर
कई-कई भट-सुभट
जने-पाले थे मैंनें
अपनी देह से
तभी हुआ होऊंगा भटनेर !
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भटनेर-2
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सरस्वती के जल से
धुलता था
प्रतिदिन मेरा तन
निखरता
औज प्रतिपल
जब छू कर जाता था
कल-कल बहता जल ।



मैं सुनता था
कल-कल
संकेत था शायद भविष्य का
मगर मैं समझ न सका
ऐसा होगा कल ।

आज
उसी कल में
जी रहा हूं मैं
किसी कल के लिए ।

मेरी बुढा़ई चिन्ता
उत्तराकांक्षा पाले
उकेरती है प्रश्न ;
शायद न कर सकूं
अपनी देह रक्षा
प्रश्न है-
कहां जाएगी
वह संज्ञा
जो है अभी भटनेर ?

नपुंसक सांत्वना

वे बेहद संवेदनशील हैं
उन्होंने इसका प्रमाण दिया है
रोने वालों को
अपने हाथों से अभी-अभी
रुमाल बांट कर आए हैं ।

यह अलग बात है कि
रोने वाले अब रो नहीं रहे
सुबक रहे हैं
वे रुमाल बांट कर
अब सिंहासन पर दुबक रहे हैं ।

शायद वे नहीं जानते
रोने वाले आंखों से नहीं
दिल से रोते हैं
दिल के आंसूं रुमाल से नहीं
फ़लवती सांत्वना से ही
पूंछे जाते हैं
उनकी नपुंसक सांत्वना से नहीं !

मेहनत

सारे मेहनतकश 
वहीं थे
उनके हाथों में
बहुत लकीर थी
मगर वह बस्ती
बरसों से फकीर थी ।

चौट

चौट तो दिल के अंदर है ।
आंख बेवज़ह समंदर है ।।

उड़ गई नींद

न देह थी
न थे पंख
फिर भी
न जाने कैसे
उड़ गई नींद..... !

आहिस्ता से आईं
लौट कर यादें
ठहरी आंखों में 
आंखें मुंद गई
फिर भी
न जाने कैसे
उड़ गई नींद.....!

पहले कभी
उड़ती थी नींद
उनकी याद में
अपने आप
अब उड़ती है
जब होता है
उच्च रक्तचाप !

शुक्रवार, अप्रैल 11, 2014

मुझे समन्दर करती वह

उसे भूख नहीं लगती
क्यों कि मैंने कुछ नहीं खाया

वह बेचैन है
क्यों कि मुझे चैन नहीं

उसे नींद नहीं आती
क्यों कि मुझे नींद नहीं आती

उसे गुस्सा नहीं आता
क्यों कि मुझे गुस्सा आता है

वह खुश है
क्यों कि मैं खुश हूं

वह चिंतित रहती है
क्यों कि मैं चिंता नहीं करता

वह उन सम्बन्धों को ढोती है
जिनको मैं उसे सौंपता हूं

सात फेरों के बदले
अपने स्वजन को त्याग
मेरे परिजन को
अपना स्वजन स्वीकारती
अपने स्व को होम
मुझ में आ मिलती है
किसी नदी की तरह
मुझे समन्दर करती वह !

उसके सुख

धर्मपत्नी है मेरी
यह सुन कर
वह पा जाती है
असीम सुख
यह शब्द
देते हैं जैसे उसे ऊर्जा
दिन भर 
यंत्रवत चलने के लिए ।

मुझे केन्द्र में रख
करती रहती है
दिन भर
घर के सारे काम


असंख्य चिंताओं के बीच
उसे बड़ी लगती हैं
मेरी चिंताएं
अपनी बीमारी से
बहुत बड़ी लगती है
मेरी बीमारी ।

चिंताएं औढ़ कर
देर रात तक
जाग कर सोती है
देखती है रात भर
मेरे ही सपने
भोर में जागती है तो
मेरे लिए ही जागती है
इसी उपक्रम में
वह ढूंढ़ती रहती है
अपने लिए सुख
जो उसे मिलता नहीं
मेरे सुख से पहले ।

गुरुवार, अप्रैल 10, 2014

प्रेम की करवट

प्रेम था किसान को
अपने गाँव से
अपनी जमीन से
वह छोड़ न सका
अपना गाँव और जमीन !

प्रेम था माँ से
माँ को छोड़ कर
जा न सका बेटा !

प्रेम था बेटे से
बेटे को छोड़ कर
जा न सकी माँ !

प्रेम था लड़के को
मोहल्ले की लड़की से
लड़का ले भागा
उस लड़की को
लड़की भी चल पड़ी
इस प्रेम के लिए
छोड़ कर
शेष सारे प्रेम !

जुड़े रहने से
छोड़ जाने के बीच
करवट लेता प्रेम
बदल लेता है
कितने-कितने मायने
एक जगह से टूट कर
दूसरी जगह होता है
नए अर्थों में स्थापित
जबकि हर मुकाम
होता तो है प्रेम !

रूह में थी मैं

प्रेम के नहीं
वशीभूत थे तुम
अपने ही मनोरथ के
जिसे पूरने
हो आए तुम 
मेरी देह तक
देह में कहीं भी
नहीं थी मैं ।

रूह में थी मैं
तुम भटकते रहे
देह में मेरी
मेरी देह में
रुके नहीं तुम
रुके तो कभी
मन में भी नहीं
सम्बन्धों में ही
चिपकाए रहे
और
मैं ढोती रही तुम्हें
अर्धनारी बन कर
तुम कभी
न अर्धनारीश्वर हुए
न पूर्ण पुरुष !

हम पेट वाले हैं

आप और हम
बहुत फ़र्क वाले है
हम नादान 
आप सतर्क हैं
आप सीट वाले 
हम वोट वाले हैं
आप बार-बार
जीत वाले
हम हर बार
हार वाले हैं !

आप
शहर में रहते हैं
ब्रेकफास्ट
लंच-डिनर
बैड टी वाले हैं
हम
गांव में रहते हैं
वक्त-बेवक्त
ठंडी-बासी
राबड़ी-रोटी वाले हैं ।

आप
दिल्ली में रहते हैं
इंडिया गेट वाले हैं
हम
गांव में रहते हैं
खाली पेट वाले हैं ।

मुझे कविता लिखनी नहीं आई

तुम नहीं पढ़्ते
मेरी कविताएं
मुझे पता है
मेरी कविताओं में
होता नहीं तुम्हारा 
मनवांछित कुछ भी 
जो उतार सके
तुम्हारी आंखों मे
लाल डोरे ढलती रात में।

मेरी कविताओं में
न जाने क्यूं
हर बार उतर आता है
कच्ची बस्ती वाला
मुट्ठियां भींचता
धाए-अघाए
हक भक्षियों पर
सवाल दर सवाल
उछालता नत्थू
जो तुम्हें कभी नहीं भाया ।



तुम्हें मेरी कविताएं
हमेशा लगती हैं
बहुत बोर और उबाऊ
क्यॊ कि उन में नहीं होते
कजरारे-नशीले नैन
पायल की झंकार
गोरे गाल
मस्तानी चाल
लाल-गुलाबी होंठ
गालों पर लटकती
लम्बी-काली जुल्फ़ें
तुम्हारे मुताबिक
इनके बिना भी साला
होती है क्या कोई कविता ?

माफ़ करना भाई
मुझे अब तक
तुम्हारे पसन्द की
कविता लिखनी नहीं आई !

नहीं जाती आदत

.
सच कहा है
नहीं जाती आदत
किसी की 
कभी भी !

लो आज फिर 
आ गया नया दिन
हम भी वही हैं
सितमगर भी वही
आज फिर
शुरु होगा
एक नया सितम !

आज फिर
आमने-सामने हैं
धूप और छांव
मंजिल और पांव
पड़ाव से पहले !

शांति चाहते हो तो

शांति के लिए
आज तलक आप ने
जितने भी कबूतर उड़ाए
क्या वे कभी
लौट कर घर आए ?

आप अगर सच में
शांति चाहते हो तो
चले क्यों नहीं जाते
खुद चल कर उस पार
क्यों उड़ाते हो
बेचारे कबूतरों को बार बार !

भूल क्यॊ जाते हो
हर बार
कबूतरों के भी होता है
घर परिवार !


पांच हाइकु

1.
खोया हमनें
हथियाया जग ने
बिलोया थूक !
*
2.
बातें अपनी
देता शब्द जगत
बना तमाशा !
*
3.
मेरे खातिर
पाली तुमनें प्रीत
जग पागल !
*
4.
घट अघट
सब अपने बीच
बातें पसरी !
*
5.
काग उडाया
आए ना कभी तुम
हंसी दुनिया !

पूजा घर और माँ

कई दिनों से
बिन खुले पड़े हैं
घर के पूजा-घर में
वह भग्वद पुराण
गीता और भविष्य पुराण
उनके पास ही पड़ी है
मोटे काँच वाली ऐनक
जिन्हें लगा कर
बांचती थी माँ प्रति दिन ।

ऐनक के पीछे
अब नहीं हैं माँ की आँखें
ऐहसास मगर है अभी भी
माँ के वहीं होने का
अभी भी लगता है
घर के पूजा-घर से
आएगी बाहर आंगन में
घंटी बजाती
मन ही मन गुनगुनाती
हाथ में लिए
मिश्री व तुलसी का पत्ता
सब को बांटने ।

आरती के वक्त
आज भी
सांझ-सवेरे
हम सब के कदम
बढ़ जाते हैं उस और
जिधर से आती थी मां
घर के पूजा-पूजा घर से बाहर !
=

नन्दू का ख़त नत्थू के नाम

शहर गए नत्थू को
नन्दू ने खत लिखा ;
भाई !
तुम्हें तो मिल रहा होगा
दो वक्त खाना !

पगार में रुपये मिले तो
हरगिज मत लाना 
रुपये की कीमत
इधर बहुत गिर रही है
रुपयों में कुछ नहीं आता
बच्चों ने कल से
कुछ नहीं खाया है
माँ ने लिखवाया है
ला सको तो
दाल-भात लाना !

रुपये तो यहां भी
मिल ही जाते हैं
रोजगार की गारंटी है
मगर काम नहीं मिलता
काम मिलता है तो
पूरा दाम नहीं मिलता
टास्क का झंझट है
दिन पूरा हो जाता है
टास्क नहीं होती पूरी!

तुम वहां
मन लगा कर
काम करना
यहां की चिंता मत करना
बिजली का बिल
नहीं भरने के कारण
कनैक्सन कट गया है
अब बिजली का बिल
भरने का टंटा नहीं है
तीनों बच्चे
स्कूल छोड़ आए
फीस का झंझट भी
अब मिट गया है ।

मेरी नोकरी के लिए
अम्मा व्रत रखती है
बापू को चिंता में
भूख नहीं लगती
भाभी को
काम के बदले
अनाज मिल जाता है
उस से काम चल जाता है ।

दो पोस्ट कार्ड लाया था
एक लिख दिया है
एक फिर लिखूंगा
यहां की चिंता छोड़
अपना खयाल रखना !

कागज़ पर सूरज

कागज़ पर लिखा सूरज
नहीं देता दुनिया को रोशनी
रोशन हो सकने का
महज देता है ऐहसास 
ऐहसास रहे अगर ज़िंदा तो
उगाया जा सकता है सूरज।

हमें उगाना है
अपने आसमान पर
एक तमतमाता सूरज
इस लिए फिलहाल
कागज़ पर लिख रहें हैं सूरज
ताकि ज़िंदा रहे
सूरज उग सकने का ऐहसास !

अबला स्त्री

.
सारा दोष 
जमाने की आंखों में था
घूंघट स्त्री को थमाया 
माँ स्त्री बनी
वंश अपना चलाया
बहुत कायर था
वक्त का पुरुष
जुल्म खुद ढाए
और
अबला स्त्री को बताया ।

शेष थी खुशी

इन दिनों
उन्मुक्त मुस्कुराना
मैंने ही छोड़ा है
वरना जग में 
सारी खुशियों का
अंत तो नहीं हुआ ।

मेरे घर
मातम को आए लोग
अपने घर से
खूब हंस कर आए होंगे
उन के यहां तो
नहीं था ग़म
मेरे ग़म को
पुख्ता करने के लिए
उन्हें भी औढ़नी पड़ी
कुछ पल के लिए मायूसी ।

मेरे घर
मातम मना कर
सांत्वना व्यक्त कर
अपने घर पहुंच
बहुत खुश हैं
मेरे मित्र
दूर के रिश्तेदार
कि चलो आज
वक्त निकाल कर
एक रस्म निभा आए


अपने मित्र के घर
दुख जता आए !

मेरे घर के बाहर
शेष थी खुशी
जिसे बहुत से लोग
लूट रहे थे
वह मेरी नहीं
उनकी अपनी थी
जिसे वे लोग
जी रहे थे !
.

पुजारी के बच्चे-1

चढ़ावे के लिए
चढ़ावा आता देख
मंदिर के देवता
कभी नहीं देखे गए
खुश होते हुए
जबकि
पुजारी के बच्चे
चढ़ावे के लिए आया
मिष्ठान देख कर
हर बार देखे गए
खुश होते हुए ।

माँ की बात
आती है याद ;
बच्चे ही होते हैं
भगवान का रूप !
*
पुजारी के बच्चे-2
===========
हाथ में लिए
फल-मिठाई का थैला
मंदिर में चढ़ावे के लिए
पुजारी को आता देख
मंदिर से कभी
बाहर नहीं आए
मंदिर के देवता ।

चढ़े हुए
चढ़ावे को ले कर
घर की ओर आते
पुजारी के स्वागत में
बापू आ गए
बापू आ गए / पुकारते
गली में निकल आए
पुजारी के बच्चे
पत्थर से नहीं बने थे
पुजारी के बच्चे !

मन्नत और दुआ

मंदिर के भीतर
मन्नत की पूर्ति हेतु
सवामण भोग लगा
बांटने के लिए
संकल्प के साथ
खड़ा है अमीर !

मंदिर के बाहर
अमीर की मन्नत
पूर्ण करने की
दुआ कर रहे हैं
बस्ती के गरीब !

मंदिर के भीतर
पलक तलक
झपकाने में असमर्थ
मौन है देवता
अपने ठोस पेट के साथ
दूसरी ओर
अमीर और गरीब की
आंखों मै है
कल्पनाओं की चमक !

यादें

जिनकी यादें
खो जाती हैं
वे सो जाते हैं
जिनकी यादें
हों रू-ब-रू
वे उन यादों में
खो जाते हैं !

बहुत छोटे हुए हैं बड़े हो कर

जब छोटे थे
सच बोलने के लिए
सोचा नहीं कभी
निकल ही जाता था
खुद-ब-खुद सच
बड़े हुए तो
बहुत सोचना पड़ा
फिर भी
नहीं निकला सच ।

सच बोलना
आदत थी
इसी आदत के चलते
झूठ बोलना
मजबूरी हो गई ।

छोटे थे तब
बड़ी-बड़ी बातें करना
बहुत अच्छा लगता था
आज जब बड़े हुए हैं तो
छोटी बातें करना
बहुत अच्छा लगता है
सच में
जब से बड़े हुए हैं
तब से बहुत छोटे हुए हैं !

सपने मत देखना बेटी

अपनी बच्ची को
गोद में बैठा कर
दुलारती-पुचकारती 
माँ कहती है
सुनो बेटी !
मेरे आंगन में कभी
सपने मत देखना
अभी तुम खेलो
जम कर खाओ
खुल कर हंसो
उन्मुक्त चहको !

मेरे आंगन में देखे
कुछ सपने
यहीं छूट जाएंगे
और कुछ सपने
तुम्हारे आंगन में
जा कर टूट जाएंगे
जैसे टूट गए
या माँ के घर
छूट गए मेरे सपने !

मेरी मां
बहुत कहती थी
लड़कियां कभी भी
खुद सपने नहीं देखती
जिस के देखती हैं सपनें
उसी की हकीक़त बनती हैं
आज जो न समझी तो
माँ बन कर समझोगी
तब वही सपने देखोगी
अपनी बेटी के लिए
जो मैं देख रही हूं आज
केवल तुम्हारे लिए !

रविवार, मार्च 30, 2014

बोलो ; चाहे मौन रहो

बहुत दिन हुए
तुम छोड़ गए 
चलो आज तुम्हें
आया हुआ मान कर
हमारी स्मृतियों से 
तुम्हारा स्वागत करुं !

तुम पास नहीं हो
फिर भी
तुम्हारे पास होने का
ऐहसास कर लूं
तुम हाथ न आओ
तो भी
तुम्हें बांहों में भर लूं !

तुम कुछ मत देखो
फिर भी मैं तुम्हें
देखता हुआ देखूं
तुम बोलो नहीं
फिर भी मैं तुम्हें
बोलता हुआ सुनूं !

तुम चाहे मौन रहो
मगर एक बार फिर
उसी तरह पुकार लो
जैसे पुकारा था
भीगने से बचने के लिए
माघ की बरसात में !

व्यर्थ में अनर्थ

बातों ही बातों में
अर्थ ढूंढ़ते-ढूंढ़ते
जो व्यर्थ ही
ढूंढ़ लाए अनर्थ
आज के समय
खुद को वही
समझता है समर्थ !

ऐसा समर्थ
स्वयंभु समझदार
भूल कर अपने
विनाशकारी भेद
ढूंढ़ता रहता है
दूसरों के कपड़ों में
छुपे हुए छेद !

इतिहास गवाह है
समर्थ ही करते हैं
व्यर्थ में अनर्थ

मुझे पुरुष करती हुई

उस ने दिन कहा
दिन लगने लगा
उस ने रात कहा
रात उतरने लगी
उस ने कहा वसंत
वसंत छाने लगा
उस ने फूल कहा
फूल खिलने लगे
महक पसर गई
मेरे चारों ओर
सब कुछ होता रहा
उसी के कहने पर
हर दिन
हर पल !

अब वह
उदास और मौन है
अब वैसे नहीं हैं
रात और दिन
नहीं है वसंत में
वैसी धमक
गंधहीन हो गए
सारे फूल !

यूं ही नहीं हो गई
वह अर्धांगिनी
सच है
वही तो है प्रकृति
मुझे पुरुष करती हुई !

कुछ तो बोल

चट्टान तोड़ कर भी
फूट जाते हैं
कोमल बिरवे
झूमने लगते हैं
हो उन्मुक्त
खिल जाते हैं
उन पर पुहुप
बिखेर देते हैं वे
चारों दिशाओं में
अंतहीन गंध !

तुम तो
पाषाण भी नही हो
फिर क्यों नहीं फूटते
तुम्हारे मुख से
दो मीठे बोल
कुछ तो बोल !

थमेगा नहीं समय

समय तो चलता रहा
अपने वेग से सतत
न ठहरा कहीं
न कटा किसी से
हम ही पालते रहे
समय को ले कर
अपने-अपने भ्रभ ;
थम गया समय
निकल गया समय
कट गया समय
या कि कट नहीं रहा
आज कल समय !

कितने आए
कितने ही चले गए
समय का रोना रोते हुए
इसी तरह हम भी
चले जाएंगे एक दिन
समय तो रहेगा फिर भी !

हमारे कर्म लग जाएंगे
चलते समय के हाथ
जिन्हे वह ढोएगा
अपने अदृश्य कंधों पर
तब होंगे नए लोग
समय पर चर्चा करने वाले
जो लगे होंगे हमारी तरह
समय का रोना
इसी तरह रोने में
अपने-अपने धंधों पर
सतत लगे हुए
समय थमेगा नहीं फिर भी !

गमले का पौधा

घर के बरामदे में
एक ओर पड़े
गमले का पौधा
नापना चाहता है
बढ़-चढ़ कर 
अपने ऊपर का आकाश
मगर बहुत लाचार है
सीमाओं के बीच
जो नहीं है
उसकी वांछनाओं में ।

वह
उतना ही बढ़ पाता है
मिलती है जितनी
उसे जमीन गमले में
जितना मिलता है
आकाश उसे
उतने ही धारता है
हरित पल्लव ।

पौधों जैसा ही है
गमले में लगा पौधा
हरा-भरा
पुष्पों से लकदक
फलों का मगर
नहीं कर पाता वरण ।

पौधे को यह ळाचारी
दी है बटौर कर
उसके मनोरम रूप ने
या फिर
मेरी आंख में था
सपना कोई जंगल का !