गुरुवार, अप्रैल 10, 2014

मुझे कविता लिखनी नहीं आई

तुम नहीं पढ़्ते
मेरी कविताएं
मुझे पता है
मेरी कविताओं में
होता नहीं तुम्हारा 
मनवांछित कुछ भी 
जो उतार सके
तुम्हारी आंखों मे
लाल डोरे ढलती रात में।

मेरी कविताओं में
न जाने क्यूं
हर बार उतर आता है
कच्ची बस्ती वाला
मुट्ठियां भींचता
धाए-अघाए
हक भक्षियों पर
सवाल दर सवाल
उछालता नत्थू
जो तुम्हें कभी नहीं भाया ।



तुम्हें मेरी कविताएं
हमेशा लगती हैं
बहुत बोर और उबाऊ
क्यॊ कि उन में नहीं होते
कजरारे-नशीले नैन
पायल की झंकार
गोरे गाल
मस्तानी चाल
लाल-गुलाबी होंठ
गालों पर लटकती
लम्बी-काली जुल्फ़ें
तुम्हारे मुताबिक
इनके बिना भी साला
होती है क्या कोई कविता ?

माफ़ करना भाई
मुझे अब तक
तुम्हारे पसन्द की
कविता लिखनी नहीं आई !

नहीं जाती आदत

.
सच कहा है
नहीं जाती आदत
किसी की 
कभी भी !

लो आज फिर 
आ गया नया दिन
हम भी वही हैं
सितमगर भी वही
आज फिर
शुरु होगा
एक नया सितम !

आज फिर
आमने-सामने हैं
धूप और छांव
मंजिल और पांव
पड़ाव से पहले !

शांति चाहते हो तो

शांति के लिए
आज तलक आप ने
जितने भी कबूतर उड़ाए
क्या वे कभी
लौट कर घर आए ?

आप अगर सच में
शांति चाहते हो तो
चले क्यों नहीं जाते
खुद चल कर उस पार
क्यों उड़ाते हो
बेचारे कबूतरों को बार बार !

भूल क्यॊ जाते हो
हर बार
कबूतरों के भी होता है
घर परिवार !


पांच हाइकु

1.
खोया हमनें
हथियाया जग ने
बिलोया थूक !
*
2.
बातें अपनी
देता शब्द जगत
बना तमाशा !
*
3.
मेरे खातिर
पाली तुमनें प्रीत
जग पागल !
*
4.
घट अघट
सब अपने बीच
बातें पसरी !
*
5.
काग उडाया
आए ना कभी तुम
हंसी दुनिया !

पूजा घर और माँ

कई दिनों से
बिन खुले पड़े हैं
घर के पूजा-घर में
वह भग्वद पुराण
गीता और भविष्य पुराण
उनके पास ही पड़ी है
मोटे काँच वाली ऐनक
जिन्हें लगा कर
बांचती थी माँ प्रति दिन ।

ऐनक के पीछे
अब नहीं हैं माँ की आँखें
ऐहसास मगर है अभी भी
माँ के वहीं होने का
अभी भी लगता है
घर के पूजा-घर से
आएगी बाहर आंगन में
घंटी बजाती
मन ही मन गुनगुनाती
हाथ में लिए
मिश्री व तुलसी का पत्ता
सब को बांटने ।

आरती के वक्त
आज भी
सांझ-सवेरे
हम सब के कदम
बढ़ जाते हैं उस और
जिधर से आती थी मां
घर के पूजा-पूजा घर से बाहर !
=

नन्दू का ख़त नत्थू के नाम

शहर गए नत्थू को
नन्दू ने खत लिखा ;
भाई !
तुम्हें तो मिल रहा होगा
दो वक्त खाना !

पगार में रुपये मिले तो
हरगिज मत लाना 
रुपये की कीमत
इधर बहुत गिर रही है
रुपयों में कुछ नहीं आता
बच्चों ने कल से
कुछ नहीं खाया है
माँ ने लिखवाया है
ला सको तो
दाल-भात लाना !

रुपये तो यहां भी
मिल ही जाते हैं
रोजगार की गारंटी है
मगर काम नहीं मिलता
काम मिलता है तो
पूरा दाम नहीं मिलता
टास्क का झंझट है
दिन पूरा हो जाता है
टास्क नहीं होती पूरी!

तुम वहां
मन लगा कर
काम करना
यहां की चिंता मत करना
बिजली का बिल
नहीं भरने के कारण
कनैक्सन कट गया है
अब बिजली का बिल
भरने का टंटा नहीं है
तीनों बच्चे
स्कूल छोड़ आए
फीस का झंझट भी
अब मिट गया है ।

मेरी नोकरी के लिए
अम्मा व्रत रखती है
बापू को चिंता में
भूख नहीं लगती
भाभी को
काम के बदले
अनाज मिल जाता है
उस से काम चल जाता है ।

दो पोस्ट कार्ड लाया था
एक लिख दिया है
एक फिर लिखूंगा
यहां की चिंता छोड़
अपना खयाल रखना !

कागज़ पर सूरज

कागज़ पर लिखा सूरज
नहीं देता दुनिया को रोशनी
रोशन हो सकने का
महज देता है ऐहसास 
ऐहसास रहे अगर ज़िंदा तो
उगाया जा सकता है सूरज।

हमें उगाना है
अपने आसमान पर
एक तमतमाता सूरज
इस लिए फिलहाल
कागज़ पर लिख रहें हैं सूरज
ताकि ज़िंदा रहे
सूरज उग सकने का ऐहसास !

अबला स्त्री

.
सारा दोष 
जमाने की आंखों में था
घूंघट स्त्री को थमाया 
माँ स्त्री बनी
वंश अपना चलाया
बहुत कायर था
वक्त का पुरुष
जुल्म खुद ढाए
और
अबला स्त्री को बताया ।

शेष थी खुशी

इन दिनों
उन्मुक्त मुस्कुराना
मैंने ही छोड़ा है
वरना जग में 
सारी खुशियों का
अंत तो नहीं हुआ ।

मेरे घर
मातम को आए लोग
अपने घर से
खूब हंस कर आए होंगे
उन के यहां तो
नहीं था ग़म
मेरे ग़म को
पुख्ता करने के लिए
उन्हें भी औढ़नी पड़ी
कुछ पल के लिए मायूसी ।

मेरे घर
मातम मना कर
सांत्वना व्यक्त कर
अपने घर पहुंच
बहुत खुश हैं
मेरे मित्र
दूर के रिश्तेदार
कि चलो आज
वक्त निकाल कर
एक रस्म निभा आए


अपने मित्र के घर
दुख जता आए !

मेरे घर के बाहर
शेष थी खुशी
जिसे बहुत से लोग
लूट रहे थे
वह मेरी नहीं
उनकी अपनी थी
जिसे वे लोग
जी रहे थे !
.

पुजारी के बच्चे-1

चढ़ावे के लिए
चढ़ावा आता देख
मंदिर के देवता
कभी नहीं देखे गए
खुश होते हुए
जबकि
पुजारी के बच्चे
चढ़ावे के लिए आया
मिष्ठान देख कर
हर बार देखे गए
खुश होते हुए ।

माँ की बात
आती है याद ;
बच्चे ही होते हैं
भगवान का रूप !
*
पुजारी के बच्चे-2
===========
हाथ में लिए
फल-मिठाई का थैला
मंदिर में चढ़ावे के लिए
पुजारी को आता देख
मंदिर से कभी
बाहर नहीं आए
मंदिर के देवता ।

चढ़े हुए
चढ़ावे को ले कर
घर की ओर आते
पुजारी के स्वागत में
बापू आ गए
बापू आ गए / पुकारते
गली में निकल आए
पुजारी के बच्चे
पत्थर से नहीं बने थे
पुजारी के बच्चे !

मन्नत और दुआ

मंदिर के भीतर
मन्नत की पूर्ति हेतु
सवामण भोग लगा
बांटने के लिए
संकल्प के साथ
खड़ा है अमीर !

मंदिर के बाहर
अमीर की मन्नत
पूर्ण करने की
दुआ कर रहे हैं
बस्ती के गरीब !

मंदिर के भीतर
पलक तलक
झपकाने में असमर्थ
मौन है देवता
अपने ठोस पेट के साथ
दूसरी ओर
अमीर और गरीब की
आंखों मै है
कल्पनाओं की चमक !

यादें

जिनकी यादें
खो जाती हैं
वे सो जाते हैं
जिनकी यादें
हों रू-ब-रू
वे उन यादों में
खो जाते हैं !

बहुत छोटे हुए हैं बड़े हो कर

जब छोटे थे
सच बोलने के लिए
सोचा नहीं कभी
निकल ही जाता था
खुद-ब-खुद सच
बड़े हुए तो
बहुत सोचना पड़ा
फिर भी
नहीं निकला सच ।

सच बोलना
आदत थी
इसी आदत के चलते
झूठ बोलना
मजबूरी हो गई ।

छोटे थे तब
बड़ी-बड़ी बातें करना
बहुत अच्छा लगता था
आज जब बड़े हुए हैं तो
छोटी बातें करना
बहुत अच्छा लगता है
सच में
जब से बड़े हुए हैं
तब से बहुत छोटे हुए हैं !

सपने मत देखना बेटी

अपनी बच्ची को
गोद में बैठा कर
दुलारती-पुचकारती 
माँ कहती है
सुनो बेटी !
मेरे आंगन में कभी
सपने मत देखना
अभी तुम खेलो
जम कर खाओ
खुल कर हंसो
उन्मुक्त चहको !

मेरे आंगन में देखे
कुछ सपने
यहीं छूट जाएंगे
और कुछ सपने
तुम्हारे आंगन में
जा कर टूट जाएंगे
जैसे टूट गए
या माँ के घर
छूट गए मेरे सपने !

मेरी मां
बहुत कहती थी
लड़कियां कभी भी
खुद सपने नहीं देखती
जिस के देखती हैं सपनें
उसी की हकीक़त बनती हैं
आज जो न समझी तो
माँ बन कर समझोगी
तब वही सपने देखोगी
अपनी बेटी के लिए
जो मैं देख रही हूं आज
केवल तुम्हारे लिए !

रविवार, मार्च 30, 2014

बोलो ; चाहे मौन रहो

बहुत दिन हुए
तुम छोड़ गए 
चलो आज तुम्हें
आया हुआ मान कर
हमारी स्मृतियों से 
तुम्हारा स्वागत करुं !

तुम पास नहीं हो
फिर भी
तुम्हारे पास होने का
ऐहसास कर लूं
तुम हाथ न आओ
तो भी
तुम्हें बांहों में भर लूं !

तुम कुछ मत देखो
फिर भी मैं तुम्हें
देखता हुआ देखूं
तुम बोलो नहीं
फिर भी मैं तुम्हें
बोलता हुआ सुनूं !

तुम चाहे मौन रहो
मगर एक बार फिर
उसी तरह पुकार लो
जैसे पुकारा था
भीगने से बचने के लिए
माघ की बरसात में !

व्यर्थ में अनर्थ

बातों ही बातों में
अर्थ ढूंढ़ते-ढूंढ़ते
जो व्यर्थ ही
ढूंढ़ लाए अनर्थ
आज के समय
खुद को वही
समझता है समर्थ !

ऐसा समर्थ
स्वयंभु समझदार
भूल कर अपने
विनाशकारी भेद
ढूंढ़ता रहता है
दूसरों के कपड़ों में
छुपे हुए छेद !

इतिहास गवाह है
समर्थ ही करते हैं
व्यर्थ में अनर्थ

मुझे पुरुष करती हुई

उस ने दिन कहा
दिन लगने लगा
उस ने रात कहा
रात उतरने लगी
उस ने कहा वसंत
वसंत छाने लगा
उस ने फूल कहा
फूल खिलने लगे
महक पसर गई
मेरे चारों ओर
सब कुछ होता रहा
उसी के कहने पर
हर दिन
हर पल !

अब वह
उदास और मौन है
अब वैसे नहीं हैं
रात और दिन
नहीं है वसंत में
वैसी धमक
गंधहीन हो गए
सारे फूल !

यूं ही नहीं हो गई
वह अर्धांगिनी
सच है
वही तो है प्रकृति
मुझे पुरुष करती हुई !

कुछ तो बोल

चट्टान तोड़ कर भी
फूट जाते हैं
कोमल बिरवे
झूमने लगते हैं
हो उन्मुक्त
खिल जाते हैं
उन पर पुहुप
बिखेर देते हैं वे
चारों दिशाओं में
अंतहीन गंध !

तुम तो
पाषाण भी नही हो
फिर क्यों नहीं फूटते
तुम्हारे मुख से
दो मीठे बोल
कुछ तो बोल !

थमेगा नहीं समय

समय तो चलता रहा
अपने वेग से सतत
न ठहरा कहीं
न कटा किसी से
हम ही पालते रहे
समय को ले कर
अपने-अपने भ्रभ ;
थम गया समय
निकल गया समय
कट गया समय
या कि कट नहीं रहा
आज कल समय !

कितने आए
कितने ही चले गए
समय का रोना रोते हुए
इसी तरह हम भी
चले जाएंगे एक दिन
समय तो रहेगा फिर भी !

हमारे कर्म लग जाएंगे
चलते समय के हाथ
जिन्हे वह ढोएगा
अपने अदृश्य कंधों पर
तब होंगे नए लोग
समय पर चर्चा करने वाले
जो लगे होंगे हमारी तरह
समय का रोना
इसी तरह रोने में
अपने-अपने धंधों पर
सतत लगे हुए
समय थमेगा नहीं फिर भी !

गमले का पौधा

घर के बरामदे में
एक ओर पड़े
गमले का पौधा
नापना चाहता है
बढ़-चढ़ कर 
अपने ऊपर का आकाश
मगर बहुत लाचार है
सीमाओं के बीच
जो नहीं है
उसकी वांछनाओं में ।

वह
उतना ही बढ़ पाता है
मिलती है जितनी
उसे जमीन गमले में
जितना मिलता है
आकाश उसे
उतने ही धारता है
हरित पल्लव ।

पौधों जैसा ही है
गमले में लगा पौधा
हरा-भरा
पुष्पों से लकदक
फलों का मगर
नहीं कर पाता वरण ।

पौधे को यह ळाचारी
दी है बटौर कर
उसके मनोरम रूप ने
या फिर
मेरी आंख में था
सपना कोई जंगल का !