बुधवार, जून 09, 2010

ओम पुरोहित कागद की पाच हिन्दी कविताएं

ओम पुरोहित कागद की पांच हिन्दी कविताएं

थिरकती है तृष्णा (कविता -संग्रह )२००५ से

पांच अकाल चित्र


१-चौपाल अकेली

जवान सूखे गाछ पर
बैठी है सोनचिड़ी
सूखे बूढ़े पीपल पर
बैठा है मोर बिन बोले
पथराई आंख से देखता टुकुर-टुकुर ।
गांव के किसी झूंपे से
दो वक्त क्यों नहीं उठता धुआं
सोचता है चौपाल पर बैठा
मुड़दिया काला कुत्ता
‘तू-तू’ की आस में
ऊँघता तक नहीं ।
चौपाल उडीकती
सो जाती है अकेली
नहीं निकलता
किसी घर से
लाठी टेकता कोई
हताई को खंखारता डोकरा ।


२-जूण भर चूण

आखा गांव धार्मिक है
सुगनी काकी भी आस्तिक है
इसी लिए धर्म पालती है
सात-सात रोज के व्रत करती है
ताकि किसी वार का
कोई देवता नाराज न हो
कभी आ कर दे जाये
जूण भर चूण गांव को
काकी ऐसी आस पालती है ।


3-जूण


सूने पड़े गांव के
ऊँचे से धोरे पर
लीर-लीर धोती
तार-तार पाग
लिगतर फट्टाक मोजड़ी पहने
सुगनिया ढूंढ़ता है
हुक्के के पैंदे में पानी
बुझी राख में आग
मिले तो खींच ले
दम भर एक सुट्टा
ले चले बुझती जूण को
दो पांवड़े आगे तक ।


4-गिलहरी

खेत के
सबसे ऊँचे धोरे पर
बनी मचाण पर बैठी
रात के सन्नाटे में
कुतरती है नाखून गिलहरी
कान लगाए,
फूटे तो सही
किसी ओर से
माणस के मिठड़े बोल
सपने सजाए बैठी है
योग माया सी गिलहरी ।


५-मौत का सन्नाटा


बे - खौफ हो आया है
गांव की
गली-गली
गुवाड़-गुवाड़
बाखल-बाखल
गांव में
मौत का सन्नाटा है
पर कहां है मौत ?
आती क्यों नहीं ?
दिशाओं से पूछता घूमता है
हथेली पर जान लिए
आवारा
वहशी
मुड़दल गादड़ा

13 टिप्‍पणियां:

  1. राजस्थानी के ख़ास आंचलिक शब्दों के साथ प्रस्तुत ओम पुरोहित कागद की पांच हिन्दी कविताओं को पढ़ना कुछ अलग ही अनुभूति है ।

    मुझे आपकी छंदबद्ध रचनाओं का इंतज़ार है , कुछ आपने मेरे घर पर सुनाई थी … !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  2. बहुत दिनों तक चूल्हा रोया
    चक्की रही उदास
    बहुत दिनों तक कानी कुतिया
    सोयी उसके पास.... बाबा नागार्जुन की ये कविता 'अकाल' बरबस याद आ गई आपकी कविता पढ़कर ! सुंदर और सार्थक रचना

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  3. आदरणीय ओम जी ,
    सादर प्रणाम !
    आप का कविताए पढ़ लगा मनो सामने कोई चित्र पड़ा हो , मैं कोई चल चित्र देख रहा हूँ , पूरी आंचलिकता , अगर रचनाकार जब तक अपने अंचल की बोल चाल का प्रयोग ना करे ये हो नहीं सकता , जैसा आप की रचनाओं में दिखा है वो लाजवाब है , साड़ी कविताए मनन करने योग्य है , जितनी बार पढो कम है !
    साधुवाद !
    आभार!

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  4. 'कागद'
    यहां भी 'कागद' , वहां भी 'कागद'
    कहां कहां मिलता है 'कागद'
    'कागद' थोक में अपने घर में
    थोड़ा थोड़ा दुनिया भर में
    हर ब्लॉगर के बक्से में है
    हर फॉलोअर नक्शे में है
    'कागद' मिलता है 'रांधण' पर
    'कागद'मिलता है 'कांकड़' पर
    'आखरकलश' है घर 'कागद' का
    है 'भटनेर' नगर 'कागद' का
    कलम तेज चलती 'कागद' की
    जय , महिमा सारी 'कागद' की
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  5. आज पहली बार आना हुआ पर आना सफल हुआ देर से आने का दुःख भी बेहद प्रभावशाली प्रस्तुति किस किस बात की तारीफ करूँ बस बेमिसाल..... लाजवाब.......

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  6. कलम तेज चलती 'कागद' की
    जय , महिमा सारी 'कागद' की

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  7. सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं.
    आपकी कवितायें उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.

    Sanjay kumar
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  8. सुन्दर कवितायें.....

    गांव में
    मौत का सन्नाटा है
    पर कहां है मौत ?
    आती क्यों नहीं ?

    एक से बढ़ कर एक....

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