गुरुवार, अक्तूबर 21, 2010

ओम पुरोहित कागद की हिन्दी कविता

ओम पुरोहित कागद की हिन्दी कविता

मेरा संघर्ष

मैं
पिछले साठ साल से
चिल्ला रहा हूं
मैं भूखा हूं
मेरे पास
तन ढकने को कपडा़
और
सिर छुपाने को
छत नही हैं।

वो
कहते आ रहे हैं
तुम आजाद देश के
आजाद नागरिक हो
मांग के साथ साथ
संघर्ष करो
यह तुम्हारा
मूल अधिकार है
तुम्हारी मांग
संसद तक पहुंचे
इस के लिए तुम
हमारे झंडे के नीचे आओ!


मैं
जब जब भी
संघर्ष के लिए
तैयार होता हूं
मेरे इर्द गिर्द
लाल
हरे
नीले
भगवां
सफेद
दुरंगे-तिरंगे-बहुरंगे
झंडे लिए
गिरगिट आ खडे़ होते हैं
मुझे बुलाते हैं
हाथों से झाला दे
मुझे रिझाते हैं
अपने मत की हाला दे।


मेरे साथ
दुविधा रहती है
किस की सुनूं
किसका थामूं झंडा
लाल को थामूं तो
मेरा आंदोलन
हिंसक हो जाता है
लाल को छोडूं तो
मेरा आंदोलन
आंदोलन नही
पूंजीवाद का विलाप
और
भगवां थामते ही
साम्प्रदायिक हो जाता है।
अलग-अलग रंगो के
दुरंगे-तिरंगे-बहुरंगे झंडों में
वो बात नहीं
या उनकी औकात नहीं
जो मेरे आंदोलन को
आंदोलन बना सकें।
कुछ झंडे मुझे भीड़ समझते है
कुछ केवल वोट मानते है
किसी को भाषा चहिए
किसी को प्रांत
किसी को जिला चाहिए
किसी क तहसील
किसी को भी नहीं चाहिए
मेरी मांगो की तफसील।


कुछ झंडे फोन से
कुछ झंडे लोन से
कुछ थानेदारी टोन से
कुछ जुलूस और मौन से
मेरी मांग को
मांग बना सकते हैं
लेकिन शर्त मे उनकी
अपनी मांग रहती है।


अपना संघर्ष
खुद करने की सोचता हूं तो
राष्‍ट्र की मुख्य धारा से
कट जाता हूं
बस इसी भय से
पीछे हट जाता हूं।


इस सब के बीच
मैं सोचता हूं;
इस देश में रोटी
डंडे के बिना
नहीं मिल सकती
यदि मेरा डंडा मजबूत है
तो हर कोई
मेरे डंडे में
अपना झंडा टांग देगा
और
अपनी पूरी ताकत से
मेरे लिए
रोटी मांग देगा।

9 टिप्‍पणियां:

  1. ॐ जी बहुत दिनों बाद...आपकी हिंदी कविता...पढ़ कर... लगा वही तेवर...धूप क्यूं..../ आदमीं नहीं है..../ वाले बरकरार हैं...शुभकामनाएं हैं

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  2. आम आदमी और आम आदमी की बातें हाशिये पर कर दी गई हैं.. साहित्य में भी.. आज मोबाइल के टावर तो गाँव गाँव पहुँच गए हैं लेकिन नहीं पहुँच सके हैं बिजली के खम्भे... कोल्ड ड्रिंक्स तो पहुँच गए हैं.. नहीं पहुँच सके हैं अस्पताल.. दवाइयां... और ये मुद्दे नहीं रह गए हैं... एक गंभीर कविता..

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  3. आदरणीय ओम साब प्रणाम !
    ये कविता सिर्फ ६० साल ही नहीं आज ६३ साल के बाद भी शायद इससे आगे भी गिनती हम करते रहे तो शायद हालत कितने सुधरंगे पता नहीं मगर हम आधुनिकता के और नज़दीक हो जायेगे मगर मूल भूत सुविधाए कितनी कारगर होगी पता नहीं ?
    बधाई !
    सादर !

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  4. वाह ओमजी !
    अपना डंडा मज़बूत रखिये झंडे आपके पीछे दौड़ते फिरेंगे !

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  5. कविता का अंतिम पैराग्राफ एक नयी आशा जगाता है |सुन्दर कविता हेतु आभार |

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