गुरुवार, अप्रैल 14, 2011

**** आज़ादी ****

सबद गळगळा सूं एक कविता


बां डूंडी पीट्टी

देस आज़ाद हुग्यो !
देस आज़ाद हुग्यो !!
अर
सगळा
नाचण कूदण
अर खावण पीवण लागगिया ।


मस्ती मांय
बां रै हाथ सूं छुट्योड़ी
दारु रा दो ढक्कण
सूंडी ढाळ'र
म्हे भी उछ्ळ्या
देस आज़ाद हुग्यो !


म्हे भी
बां मांय मिलगिया
बोदा मांचा बाळ दिया
पूर फाड़ लिया
अनै ढोह लिँधी
बोदकी छानड़ी !


ज्यूं ई दिन छिप्यो
अंधारो बध्यो
पेट री भूख
मद सूं बलवान होयगी
म्हे कै'यो
मालकां ! भूख लागगी
रोटी मंगाओ !


आ सुण'र
बां री डावी आंख फड़की
अनै
जबान कड़की-
आज काम कद करियो ?
काम रै बदळै
मिलै अनाज
आज़ादी रै उच्छब बदळै नीँ !
आज़ादी दाणां खातर नीँ
आज़ादी राणां खातर है
थे तो
काम करो
वोट घालण री
त्यारी करो
थारा म्हे
थांरै वोटां रै ताण
थां खातर राज करस्यां
जी करसी जकै रै आंगळी
अनै
जी करसी जकै रै खाज करस्यां !


थे आज़ाद हो
अब घरां जाओ
उच्छब मनाओ
घी रा दीया जगाओ
देस आज़ाद हुग्यो !
हां-हां
देस आज़ाद हुग्यो ! !


म्हे
टूट्योड़ी टापरी
खिँड्योड़ी गुवाड़ी मांय
चेता चूक हुयोड़ा सा आया
टाबर उछळ परा
रोटी मांगी तो
म्हारी लारली चेतना पाछी जागी
म्हैँ कूदण लाग्यो
पीँपो बजावण लाग्यो
हां-हां ! नाचो-गाओ !
देस आज़ाद हुग्यो
खुसियां मनाओ !


म्हनै यूं नाचतै नै देख
घर रा सगळा
नाचण लाग्या
नाचता रै'या !
नाचता रै'या !!
नाचता रै'या !!!
हाल नाच रै'या है
देस आज़ाद हुग्यो !
देस आज़ाद हुग्यो ! !
ओ मर्सियो बांच रै'या है !

[ कविता संग्रै "सबदगळगळा" 1984 सूं ]

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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर अभिब्यक्ति| धन्यवाद|

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  2. देस आज़ाद हुग्यो !
    देस आज़ाद हुग्यो ! !
    ओ मर्सियो बांच रै'या है !

    क्या खूब कटाक्ष किया है...वाह...

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