मंगलवार, नवंबर 01, 2011

दो ताज़ा हिन्दी कविताएं

*पेट दिखाता है दिशाएं*
 
मैं पंछी
कहां बैठता हूं
एक डाल
उड़ उड़ जाता हूं
... जंगल दर जंगल
पेड़ दर पेड़
शाख दर शाख
इस में
उपक्रम चाहे पंखों का है
हौसला तो पेट ही देता है !

पेट दिखाता है दिशाएं
मौन आंखे
देखती रहती है आगत
पंख फड़फड़ा कर
उड़ा ले जाते हैं
दूर देश
याद रहता है अंतस को
अपना आसमान
अपना पेड़
अपना घौसला
अपनी टहनी
अपनी वह ज़मीन
जिस पर खड़ा है
अपने वाला
वह बूढ़ा पेड़ !

चौंच का भक्षण वही
जो पेट की चाहत
रसना का वाक वही
जो ज़मीन की चाहत
ज़मीन ने उचरवाया
राम-राम !
अल्लाह-अल्लाह !!
वाहे गुरु-वाहे गुरु !!!
यीशु-यीशु !!!!
रसना ने उचारा !

पेट का पेटा भरते ही
गुलाम हुई स्वक्रियाएं
पंख छोड़ गए साथ
मीत हुए क्षुधा के
मूक संवेदानाएं
निहारती रहीं अंतस में
अपना पेड़-अपना घौसला !
 
 
*हमारे बीच नदी*
 
तुम्हे खत लिख दूं
उलट दूं मनगत उस पर
भले ही सारी गत लिख दूं
यकीन तुम करोगे
... मैं कैसे मान लूं
जबकि मैं जानता हूं
संदेह और सवाल
तुम्हारी आदत है !

तुम्हारे साथ
चलते चलते
मेरे पांवों मेँ
पड़ गए थे छाले
दर्म मेँ जब मैं कराहा
तुम्हें कहां हुआ यकीन
मेरे जूते उतरवा कर ही
माने थे तुम
और फिर
मेरे न चल पाने पर
तुम्हारा संदेह
यथावत ही रहा
मेरे लाचार पड़ाव में
पूरे वक्त !

सवाल और संदेह
तुम्हारी वृति है
और उन्हें टालना
मेरी प्रवृति
इस लिए
न कभी तुम्हारी हार होती है
न मेरी जीत
हम दोनों के बीच
बस तैरती रहती है
असीम अखूट घुटन
जो हमेँ जोड़े रखती है
एक दूसरे के भीतर
समूचा उतरने की चाह मेँ !

आओ !
सतत बहती नदी से
सीख लें
निरपेक्ष बहना
जिसे मिल ही जाता है
अन्त मेँ
अथाह समुद्र
बिना सोचे
बिना समझे !

1 टिप्पणी:

  1. "सवाल और संदेह
    तुम्हारी वृति है
    और उन्हें टालना
    मेरी प्रवृति
    इस लिए
    न कभी तुम्हारी हार होती है
    न मेरी जीत"

    और

    "आओ !
    सतत बहती नदी से
    सीख लें
    निरपेक्ष बहना
    जिसे मिल ही जाता है
    अन्त मेँ
    अथाह समुद्र
    बिना सोचे
    बिना समझे !

    मन को गहरे तक छू गई ये पंक्तियाँ ! गहरा भाव और संवेदना लिये श्रेष्ठ कृति !

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