रविवार, अक्तूबर 21, 2012

क्या पढे़गा भला कोई **

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आंखों से एक सपना खो कर आया हूं  ।
अपनों में एक अपना खो कर आया हूं ॥

कांधे पर मेरे  हाथ मत रख ऐ रकीब ।
यह लाश बडी़ दूर से ढो कर लाया हूं

न मांग मुझ से मेरी तन्हाईयां  इस कदर ।
मैं इन्हें अपना सब कुछ खो कर लाया हूं ॥

क्या पढे़गा भला कोई  इतिहास अब मेरा ।
मैं वो पृष्ठ स्याही में डुबो कर आया हूं ॥

न रुला अब किसी और अंजाम के लिए ।
अपने जनाज़े पर बहुत रो कर आया हूं ॥

निरी प्यास है इन में न कर तलाश पानी ।
मैं इन आंखों में अभी हो कर आया हूं ॥

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