रविवार, जनवरी 29, 2012

ेक हिन्दी कविता

*उसे चाहिए वही शब्द*



सत्ता के गलियारों में


घूमते-गूंजते शब्द


थाम कर अर्थाने


वह बहुत भागा


फिर भी


अभागा ही रहा !






वह जितना भागा


सफर उतना ही बढ़ा


दिन बदले


अमावस से पूनम हो गई


मगर उसका चांद


फीका ही रहा


अगस्त से जनवरी आई


पोथा रच गई


सुख नहीं रचे


गिरगिट की तरह


शब्द भी


बदलने लगे रंग


अब देते नहीं वही अर्थ


जिनके लिए


उन्हे रचा गया था !






उसे चाहिए वही शब्द


जिन से भगतसिंह ने


इंकलाब लिखा


सुभाष ने लिखा


जय हिन्द !


उसकी तलाश जारी है


हाथ भी आए हैं कुछ शब्द


जिन्हे वह अर्था ही लेता


जो निकल गए छिटक कर


उस से बहुत दूर ;


कुछ शब्दकोश में


कुछ संविधान की जटिल परिभाषाओं मेँ


वह जान पाता


तब तक उनके


हेतुक परन्तुक आ खड़े हुए


जो थे किसी और के लिए !






वह सोचता है


मेरे अलावा


और कौन है


जिनके लिए


घड़े जाते हैं


अलग शब्द


जो सदैव रहते हैं


उन "और" की पहुंच में ।


एक हिन्दी कविता

* ठंड में याद *




आज फिर


पौष में धुंध छाई


आज फिर


उनकी याद आई !






वो मेरा मफलर-टोपी


स्वेटर-कोट पुराना


ऊनी पट्टू-लोई


अम्मां के हाथों भरी


सिरख-रजाई !






अदरख-कालीमिर्च


भाप छोड़ती चुस्कियां


वो चाय अम्मां वाली


संग में तवे उतरा


ताज़ा कड़क परांठा


खा कर फिर ले अंगड़ाई !






बाड़ छोड़ कर


जले अलाव


भोर-सांझ बैठ हो हथाई


घर-गुवाड़-देश-दुनिया


सब मसले मेटे हथाई !






कौन भागा


भागी किस के संग


कौन अभागा-निरभागा


कौन आया-जाया


खोले राज हथाई !






वोट पड़ेंगे


जम गई चौसर


नेता आया-नेता आया


औढ़ दुसाला


सरपंच बोला


बाजी पलटो अबके भाई


राम दुहाई-राम दुहाई !

एक हिन्दी कविता

[0] आओ सुन लें याद[0]


आओ


उन्हें जरूर याद करें


जो हमें भूल गए हैं ।






उनकी हंसी को याद कर


हंसें मन भर


उनका उठना-बैठना


याद कर दोहरा लें


दिन भर ।






उनके सच में से


घटा कर झूठ


पकड़ लें कबूतर


उनके भीतर से


फिर उडाएं


दिन भर ।






उनके वादों को भी


अब याद कर ही लें


सुनाई देगी चटख


आओ सुन हीं लें


टूटन का संगीत


बन ठन कर ।






उनका चेहरा


याद क्या करें


जाता ही नहीं दूर


आओ डालें


समय की चादर


कबीर हाथों


बुन कर ।






यादों का वादा


रखें आओ सम्भाल कर


डाल देंगे


ये लबादा


अपने तन उतार कर


उनके तन पर ।

एक हिन्दी कविता

[<>] नया साल [<>]




हर साल की तरह


इस बार फिर
आ रहा है


नया साल


ले कर नए सपने


आगत के स्वागत में


इस बार फिर


भूल जाएंगे हम


विगत के सपने


जो बोए थे हम ने


खुद अपने हाथों


समय के खेत में !






कुछ ही दिन बाद


अपने ही हाथों


फाड़ देंगें हम


प्राकृतिक दृश्यों वाला


वह मोहक कैलेण्डर


जो टांगा था हम ने


खुद अपने हाथों


पहले ही दिन


ड्राइंगरूम की दीवार पर


पिछले नए साल !






नए साल में


अम्मा हो जाएगी


एक साल और बूढ़ी


गुड़िया कद के साथ बढ़


हो जाएगी एक साल बड़ी


घर में एक नया डर


जन्म लेगा नए साल !






नन्हें नाती के


निकल आएंगे दांत


छुटके के उग आएगी


अक्ल दाड़


हमारे कितने गिरेंगे


गिनेंगे हम नए साल !






बाजार तो बाजार है


ठोक बजा कर बढ़ेगा


वेतन जोर शोर से


खर्च बढ़ेगा मगर चुपचाप


सैंसैक्स चढ़ेगा


गिरेगी मगर मानवता


नेता नहीं बदलेंगे


किसी हाल नए साल !






नया साल मुबारक


कहेंगे हम दौड़ दौड़


अपने इष्ट मित्रों को


संगी-साथियों को


मगर भूल जाएंगे खुद


हम जिएंगे अब


एक साल कम


नहीं रहेगा मगर मलाल


नए साल


जो आता रहेगा हर साल !

एक हिन्दी कविता

[>0<] दोस्त [>0<]





बनाए नहीं जाते


खुद दोस्त
दोस्त तो


खुदा भेजता है


हर शख्स को मगर


जुदा भेजता है !






कूष्ण को सुदामा


राम को हनुमान


सकल जगत को


रहीम-रहमान


महावीर-ईसा


बुद्धा भेजता है ।






दोस्ती तोड़ना


खुदा की ही


नाफरमानी है


अभी समझ लो


दोस्तों के दोस्तो


ये इरादे शैतानी हैं ।

एक हिन्दी कविता

.


[<>] कयास बहुत हैं [<>]



कल क्या होगा


अच्छा-बुरा


यह-वह


कयास तो बहुत हैं


मेरे-तुम्हारे पास


उन में मगर


किन्तु-परन्तु बहुत हैं !






सायास न भी हो


अनायास तो कुछ न कुछ


हो ही सकता है


मसलन


सच्चाई को मिल जाए


उसकी उज्ज्वल कीमत


किन्तु देगा कौन ?






कल शायद


नेता के वादे


हो जाएं पूरे


पूरे हो जाएं


सपने अधूरे


पूरा का पूरा बजट


लग जाए योजना पर


परन्तु लगाएगा कौन ?






कल हो सकता है


वक्त पर आ जाए


रेल मेरे कस्बे में


देशद्रोहियों को


सरे राह लग जाए फांसी


डाले गए वोट की कीमत


पहचान ली जाए


मगर पहचानेगा कौन !






कल तो


यह भी हो सकता है


पेड़ों पर लगने लगें रोटियां


मिलने लगें डिब्बा बंद घर


शरीर पर चमड़ी की जगह


बनने लगे कपड़ा


यदि ऐसा हुआ तो


देश का बजट कैसे बनेगा ?


यदि देश का बजट


न बना तो


नेता चलेगा कैसे ?






कल कुछ न कुछ


होगा ज़रूर


और नहीं तो


तारीख तो बदल ही जाएगी


तारीख बदली तो


साल महीने भी बदलेंगे


फिर तो


आ ही जाएगा नया कैलेण्डर


जो लटकेगा दीवार पर


नत्थू की पगार की तरह ।

एक हिन्दी कविता

.


<> मेरी ज़िन्दगी <>



मुझे


मेरी ज़िन्दगी का


कभी साथ नहीं मिला


जब-जब भी


हम दोनों


पास-पास आए


ज़िन्दगी ने ही खुद


रुख पलट लिया


किसी और की तरफ


मैं तो आजतलक


बस हाथ ही मलता रहा !






बदलते परिदृश्य


बनते घटनाक्रम में


हाथ तो कोई न था


किसी किसी ने कहा


यह प्रारब्ध है मेरा


किसी ने नहीं माना


मैं कहता रहा ;


तो फिर मैं कहां था


बनते प्रारब्ध के वक्त ।






किसी ने कहा


समय की बात है


मैंने कहा


समय तो सब के लिए


समान रूप से चलता है


सतत्‌ सांझा


फिर मेरा समय


विभक्त हो


मेरे लिए पृथक से


आवंटित हो गया ?






मैंने कहा


बहुत लोग


पा जाते हैं वांछित


मेरी वांछना


मेरे ही भीतर


क्यों तोड़ देती है दम ?






जरूर मैं बुद्धू ही हूं


तभी तो मेरे प्रिय शब्द


मेरे ही मुख से हो मुक्त


अन्य के आगोश में


जा बैठते हैं


फिर वे खेलते हैं


खेलते ही रहते हैं


मेरे ही शब्दोँ से


अपने मन वांछित खेल !

एक हिन्दी कविता

<>मनभावन आ गया<>




नवल धवल


उज्जवल पावन


रश्मियां मनभावन


ओढ़ तन


उचका सूरज


समा बदल गया


पा नव मिलन


धरा धन्य


महक-चहक बोली


मन भावन आ गया


वो देखो दबे पांव


नया साल आ गया ।






पूर्व से पश्चिम


पासंग पिया


छूता अंग-अंग


धरा के चेहरे


छाई लालिमा


पसरा मधुरस


तन-मन को भा गया


साल नया आ गया !






अब आओ पिया


तुम भी आ जाओ


जैसे मिलते


पल-दिन-महीने


तुम भी आ कर


मुझ मेँ मिल जाओ


पा सान्निध्य


दोनो खिल जाएंगे


फिर कहे सृष्टि


सृजन क्षण आ गया


साल नया आ गया !

एक हिन्दी कविता

<0> बदला कुछ नहीं <0>





लोगों ने जश्न मनाया


बाकी दिनों की तुलना में
कुछ जादा खाया-उड़ाया


नाचे-कूदे


धूम-धड़ाका किया


शोर मचाया


साल बदल गया


मगर बदला कुछ नहीं ।






सब ओर


वही तस्वीर


वही क्रम-उपक्रम


वही नेता


वही वादे-इरादे


दर वही


लाओ-लाओ करते


घर वही


महज बारह पेज वाला


कैलेण्डर बदला


किसी किसी घर में ।






कैलेण्डर बदलने से


दिन नहीं बदलते


नहीं बदले


ओवर ब्रिज के नीचे


बसती दुनिया की बेबसी


कचरा बीन-बेच


पलती लाचारी


अधिकार के लिए


अनशन पर बैठ


हाथ मलती भीड़


वही का वही तो है शेष


नए साल में ।






गत की तरह


नवागत में भी


घड़े जा रहे हैं


लाखों रोजगार दिवस


जिनको अंततः


बन ही जाना है


ठेकेदार का मस्टर रोल


गत कि तरह आज भी


गरीबी की रेखा तले पड़ी अनाम भीड़ नहीं जानती


सैंसेक्स का अर्थशास्त्र !






खुले आसमान तले


बैठा नत्थू


बड़बड़ा रहा है


सारे वही हैं


तारे वही हैं


सूरज-चांद वही है


ज़मीन और ज़मीर वही है


जिस मौत बाप मरा था


वही दौड़ी आ रही है


नंगे पांव मेरी ओर भी


मुझे दिख रहा है


वही कफ़न


नगरपालिका वाला


जो मिला था बापू को ।






बड़बड़ाता नत्थू


बोल ही गया ;


इस बार


कैलेण्डर नहीं


दिन बदलो हुक्मरानों !

प्रीत :पांच चित्र

.


]()[ प्रीत :पांच चित्र ]()[



[1]




प्रीत में


भूखे रह


परस्पर


खाई कसमें


कुछ निभीं


कुछ टूटीं


टूटी जुड़ीं


निभी टूटीं


चला सिलसिला


पकती गई प्रीत !






[2]






प्रीत जगी


उठी


चली परस्पर


कदम जोड़


मरना सिखा गई


या कि जीना


मिला नहीं तलपट !






[3]






न प्रत्यक्ष थी


न अप्रत्यक्ष


न दिमाग में थी


न देह में


थी अमर


दिल में


दिल जला


मगर


पकी प्रीत !






[4]






आंखो में पगी


होंठो पर छाई


कदम मचल गए


यूं प्रीत के तीर


सध कर चल गए


मरी नफ़रत


मौन प्रीत को


प्राण मिल गए ।






[5]






न चांदनी थी


न बरखा-बहार


न अमराई थी


न कैफे-बार


कचरा बीनते


झरते पसीने


उतर गई प्रीत


न घर था


न बनाया


मजदूर के दर


बस गई प्रीत !

एक हिन्दी कविता

{()} चिंताएं {()}






कितनी देर चलूंगा


कितनी दूर चलूंगा


ज्ञात नहीं


तभी तो थक जाता हूं


अनजान राहों पर


चलते-चलते मैं ।






भाड़े का पगेरु


मांदा मजदूर


थक कर भी


नहीं थकता कभी


जानी पहचानी राहों पर ।






मैं


थक कर


सो जाना चाहता हूं


अगले काम के लिए


वह


सो कर


थकना नहीं चाहता


अगले काम के लिए ।






मेरी और उसकी यात्रा में


लाचारी प्रत्यक्ष है


फिर अंतर क्यों आ जाता है


हमारी थकावट में ।






शायद


उसकी यात्रा में


प्रयोजन पेट


मेरी यात्रा में


प्रयोजन चिन्ताएं हैं


चिन्ताएं भी सिरफिरी ;


यह यात्रा तो


कोई मजदूर भी कर लेता


अगर दिए होते


सो पच्चास !

एक हिन्दी कविता

[++] आती नहीं हंसी [++]




हंसी तो आती है


मगर वक्त नहीं अभी


खुल कर हंसने का


जब नत्थू रो रहा


अपनी बेटी के हाथ


पीले न कर पाने के गम में


धन्नू की भाग-दौड़


थम नहीं रही


खाली अंटी


पुत्र का कैंसर टालने मैं ।






वोट भी डालना है


अभी अभी


डालें किसे


सभी लिए बैठे हैं


वादों की इकसार पांडें


भाषणों की अखूट बौछारें


इरादे जिनके साफ


वोट डालो तो डालो


न डालो तो मत डालो


छोड़ें तो छोड़ें


मारें तो मारें


हम ही बनाएंगे सरकारें


ऐसे में हंसी आए भी तो कैसे !






फिर भी


हंस ही दिया था


गरीबी की रेखा के नीचे


बरसों से दबा


रामले का गोपा


नेता जी के सामने


भारत निर्माण का


विज्ञापन देख कर


तीसरे ही दिन


पोस्टमार्टम के बाद


मिल गई थी लाश


बिना किसी न्यूज के


उठ गई थी अर्थी


उस दिन जो थमी


आज तलक नहीं लौटी


हंसी गांव की !






अब तो


बन्द कमरे में


हंसते हुए भी


लगता है डर


सुना है


दीवारों के भी


होते हैं कान


लोग ध्यान नहीं


कान देते है


इस में भी तो


बात है हंसी की


मगर


दुबक कर कभी भी


आती तो नहीं हंसी !

एक बाल कविता

*उलट पुलट कविता*




डोर के पीछे पतंग भागा ।


बिल्ली के पीछे चूहा भागा।।


कार बैठी जा बस के भीतर।


आम बैठा गुठली के भीतर।।


कूआ मिला पानी के भीतर ।


राजा मिला रानी के भीतर।।