रविवार, जनवरी 31, 2010

ओम पुरोहित कागद की राजस्थानी कविताएं

१. मां

घर के अन्दर
एक जुदा घर
बसाए रखती है
मेरी मां

दमे से
उचाट हुई
नीन्द से उठकर
देर रात तक
समेटती रहती है
अपनी तार-तार हुई
सुहाग चूनरी.

बदलती रहती है ्कागज
हरी काट लगे
सुहाग-कङलों
रखङी-बोरियै-ठुस्सी के
पुडियों का
अमूमन हर रात.


२. लोकराज

रामलाल !
तुम गाय जैसे आदमी हो
इसलिए
घास खाओ.

वो बिचारा
शेर जैसा आदमी है
इसलिए मांस खाएगा
तुम्हारा.

देखा !
कोई भुखा नहीं सोता
लोकराज में.

३. दुनिया

बहुत छोटी है
यह दुनिया
आंख खोलें
तो दिखे
बन्द करें तो
अदीठ !


४. केवल में जानता हूं

अपनी
जमीन से
जुङा रहना
कितना लाजमी है
ये आप जानते हैं
या फिर मैं

पर
मेरे पांवों तले
जमीन कितनी
चिकनी है
फ़िसलने का
कितना खतरा है
केवल में जानता हूं
आप कहां ?

अनुवाद: डॉ. मदन गोपाल लढा



५. सर तक

पानी पहुंच जाने के पश्चात
हाथ-पांव मारने में
क्या सार है ?
ऐसी स्थिति में
बचने और बचाने की
आशा करना ही बेकार है ।

हवा में नमी देखकर ही
चेत जाना चाहिए
कि आने वाले समय में
दुर्घट घट सकता है ।
पानी सीधा ही कब पहुचा था
तुम्हारी नाक तक
पहले जरूर आया होगा
पांवों तक
तो पांवों से ले कर सिर तक
पानी की यात्रा
तुम्हारी मर्जी से हुई
इसे स्वीकारो,
तो पानी का दोष कहां
और आप निर्दोष कहां ?
पानी अपनी यात्रा में
बढ़ेगा ही
आप किसी के सामने
यदी घोड़ा बन जाएं
तो वह चढ़ेगा ही ।

अनुवाद : मोहन आलोक

1 टिप्पणी:

  1. Kagad Bhai,

    Aaj Pahli Baar aap're blog par aayon, Aapne taknik re e hindole mathe Pinga Badhawta dekh'r Ghani Khushi Hui..
    or sub aanad Mangal?

    aapro
    Vivek Chopra re sathe amit purohit ro pranam....

    उत्तर देंहटाएं