एक प्रोढ़
एक स्त्री भी है
स्त्री डरती है
बाकी मचलते हैँ
बुढ़ापे के जाल फैँक
मेरे भीतर को
कैद किया जाता है
इस जाल से भयभीत
मेरे भीतर के सभी
मेरा साथ छोड़ जाते हैँ
पासंग मेँ रहती है
एक स्त्री
जो हर पल
डरती रहती है !
*सन्नाटों में स्त्री*
दिन भर
आंखोँ से औझल रही
मासूम स्त्री को
रात के सन्नाटोँ मेँ ... क्योँ करते हैँ याद
ऐ दम्भी पुरुष !
दिन मेँ
खेलते हो
अपनी ताकत से खेल
सूरज को भी
धरती पर उतारने के
देखते हो सपने
ऐसे वक्त
याद भी नहीँ रखते
कौन हैँ पराये
कौन है अपने !
सांझ ढलते ही
क्यो सताती है
तुम्हेँ याद स्त्री की
भयावह रातोँ का
सामने करने को
साहस तुम्हारा
कहां चला जाता है ?
गौर से देखो
तुम्हारे भीतर भी है
एक स्त्री
जो डरती है तुम से
वही चाहती है साथ
सन्नाटोँ मेँ अपनी सखी का !
सच ||
जवाब देंहटाएंबहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति ||
बधाई ||
वाह..... बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंबढ़िया...
जवाब देंहटाएंस्त्री एकांत में ही स्त्री होती है बाकी समय तो वो बस सम्बन्ध होती है ..ओढ़े हुए
ek sateek saty jise koi bhi purush maanNe ko taiyar nahi hoga....apne likh diya.
जवाब देंहटाएंbahut prabhavshali.
sach kaha aapne aisa hi haal hota hai office jate samay. sunder
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