रविवार, सितंबर 18, 2011

ताज़ा हिन्दी कविताएं

दो हिन्दी कविताएं

 














*पहाड़ बिफर गया*
 
ऊपर उठे-तने
पहाड़ोँ के शिखर
छू कर क्या बोली हवा
पूछने झुका दरख्त
... चरमरा कर टूट गया
अंग अंग बर्फ रमा
बैठा मौन साधक
साक्षात शिव सरीखा
कई कई नदियोँ से
अभिषेक पा कर भी
पहाड़ नहीँ बोला
बोला तो तब भी नहीँ
जब तूफानोँ ने झकझोरा !
पहाड़ उस दिन
बोला और सरक गया
जब उसके भीतर
कुछ दरक गया
अंतस की अकुलाहट
लावा दर्द घुटन का
बिखर गया
दूर जंगल मेँ
मौन पहाड़ बिफर गया ।
*घटता नहीँ मगर*
 
जो घटा
वह चाहत नहीँ थी
जगत मेँ किसी की
... चाहत तो हमेशा
अघटित ही रही !

मैँने चाहा
खिले फूल
बंजर मेँ
बरसे पानी
मरुधर मेँ
नदियां आ जाएं
बह कर खेतोँ मेँ
शब्दोँ को मिल जाएं
निहित अर्थ
हाथ को मिल जाए
हाथ किसी का
अपना सा
स्पर्श मेँ अनुभूतियां
तैरने लगें मछलियोँ सी
याद आने पर
आ जाए अगले ही पल
वांछित दिल का
कोई अपना सा
लगने वाला
हो ही जाए अपना !

घटता नहीँ मगर
घटता जाता है विश्वास !

5 टिप्‍पणियां:

  1. विश्वास जब घटने लगे तो कुछ नहीं घट सकता ,इस जीवन में .सुन्दर प्रस्तुति!!!

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  2. दूर जंगल मेँ
    मौन पहाड़ बिफर गया ।
    प्रणाम !
    खूब सूरत पंक्तिया है कविता की. पंक्तिया एक दर्शन समक्ष रखती है ! सुदर .साधुवाद '
    सादर !

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  3. Om ji..bahut sundar kavitayen..aur samaan mil rha na aapko..uske liye bahut bahut badhai..

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