रविवार, जनवरी 29, 2012

गज़ल

बुढ़ापा हुआ बीमारी


तूं जनमा मैं बलिहारी बेटा।


वो खुशियां अब मैं हारी बेटा ।।


छोड़ा घर देश गांव भी अपना ।


ऐसी भी क्या लाचारी बेटा ।।


ममता छोड़ क्या ओहदा पाया ।


हो गए बड़े तुम व्यपारी बेटा ।।


जोड़ जोड़ सपने महल बनाया ।


लगती नहीं अब बुहारी बेटा ।।


बिना सहारे अब पांव न उठते।


बुढ़ापा हुआ बीमारी बेटा ।।


दूर देश मेँ जो जाया पोता ।


सुनी न आंगन किलकारी बेटा ।।


बहू आती घर आंगन सजाती ।


सध जाती दुनियादारी बेटा ।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. दूर देश मेँ जो जाया पोता ।
    सुनी न आंगन किलकारी बेटा ।।

    बहू आती घर आंगन सजाती ।
    सध जाती दुनियादारी बेटा ।।

    बहुत ही भावपूर्ण और सुन्दर शेर और ग़ज़ल ! जय हो कागद गुरु जी !

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