रविवार, अप्रैल 01, 2012

आए सपने

<> आए सपने <>
रात भर
जगी आंख
आए सपने
सपनों मेँ अपने
जो रहे मूक
हम न रहे मून ।

हमारा एकालाप
तलाश न पाया
मुकाम वांछित
फिर भी
थमा नहीं
सिलसिला बात का
थाम कर
डोर शब्दों की
करता रहा पीछा
तुम्हारे अंतस की

1 टिप्पणी:

  1. "थाम कर
    डोर शब्दों की
    करता रहा पीछा
    तुम्हारे अंतस की"
    यह भटकन हर किसी के जीवन से जुड़ी है ! सुंदर !

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