रविवार, मई 20, 2012

एक हिन्दी कविता

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उत्सव नहीं भय है मृत्यु
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जहां से होता है
अंत जीवन का
ठीक वहीं से
शुरु होती है मृत्यु !

किसी ने कहा है -
मृत्यु उत्षव है
जीवन के अंत का
या कि देह के
आत्मा से विलग हो
परमात्मा से मिलन की
अकूंत घड़ी का !

मृत्यु उत्सव है तो
भयभीत क्यों हूं मैं
मना क्यों नहीं पाता
इस उत्सव को
अपने परिजनों के साथ
गाता-नाचता हुआ ?

मेरे कदम स्थिर
अचल हैं
मैं नहीं जा रहा
वही आ रही है
मेरी ओर दौड़ती हुई
उस के स्वागत में
उठते क्यों नहीं
मेरे दो-चार कदम ?

जब भी उटे
मृत्यु के विरुद्ध ही उठे
मेरे कमजोर कदम
कर आए हैं पार
मृत्यु की पचपन सीढ़ियां
आवाज गूंजती है
मेरे कानों में ;
और आगे नहीं
आगे खड़ी है मत्यु
मुझे लगता है
उत्सव नहीं
भय ही मृत्यु !

आत्मा ओ परमात्मा
जो हैं अजर अमर
बैठै हैं क्यों छुप कर
मेरे बाहर भीतर
उनके मिलन के
उत्सव का माध्यम
मेरी मृत्यु ही क्यों है
इतने बड़े विराट में
क्या कोई और नहीं है
माध्यम सिवाय मृत्यु के ?
· · · Yesterday at 12:24am via mobile ·

    • Shankar Sharma mrityu ek katu satya ha,darne se kxa hoga ?lekin iska dar bhi to sarvbhoumik satya ha jo har ek ke dil me vyapt ha.....sundar prastuti guruji
    • Om Purohit Kagad बहुत अशुध्दियां छूट गईं । मोबाइल पर लिखने का यही संकट है । मोबाइल की छोटी स्क्रीन पर अक्षर भी छोटे दिखते हैं ।
    • राजेश चड्ढ़ा मानव परमात्मा की अनुपम रचना है और आत्मा सुख दुख से ऊपर है .. शायद यही स्वभाव भी ...
    • Narendra Kishore Vyas मुझे लगता है, उत्सव नहीं,भय ही मृत्यु ! ***एक कटु सत्य ** एक देह का आत्मा से विलग होना **** क्या .. सुंदर मंथन किया है गुरु जी ** एक अद्भुत प्रस्तुति के लिए आपको नमन है *****आभार ******
    • Divyanshu Srivastava bahoot khoob...
    • Deepti Sharma bahut sunder rachna h aapki
      .................
      bahut khub..
      Yesterday at 1:01am via mobile · · 2
    • Sagar Gharsanvi mrityu utsav honi chahiye lekin vastvikta me ye bhay hi hai..........Maut ka ek din muayyan hai, Neend kyun raat bar nahi aati
    • Poonam Matia Om Purohit Kagad ji ....kayal hain aapke khyaaalaton aur abhivyakti ke ..............vishay aur vishay ka pataakshep .......kitni aasaani se vartalaap dwara kar diya aapne .......vakai ....ek sach hai ......agar mrityu aatma-parmatma ke milan ka utsav hai to kyun koi bhi is utsav ko manane ke liye utsuk kyun nahi ............sabhi bhaybheet hain .....bhay hi hai mrityu
    • Deepak Barotia Kisi ne martyusayya pr lete huye kaha tha...
      "agr mujhme likhane ki takat hoti to m likhata... Ki Martyu kitni hasin h..."

      Or

      "agr mujhe ek or moka mile to m ek bar mar k dekhu..."
    • Neelam Sangwan Anteraatma ko choo lene wali abhivyakti....
    • Deepak Barotia Neelam ji atma se nikali huyi abhivaykti kahiye om ji ki lines ko...
    • Shobha Vashisht Anu bahut badia g
      Yesterday at 7:48am via mobile · · 1
    • Ashvani Sharma उत्सव ही है गुरु जी ........स्वतंत्रता दिवस ...गणतंत्र दिवस जैसा जिसे सरकारी आदेशों के तहत मनवा लिया जाता है ......आप मनाना चाहें या न चाहें
    • Raman Kathuria Kahte hain ke Mrityu shaashvat satya hai,
      Phir is satya ko mai pchaa kyu nhi pata.......... Good Morning ji.....
    • Ravindra Mothsara Mout bhi to ant h nahi,
      to mout se bhi kyu dara?
      Ye ja ke aasman me dahad do....
      Yesterday at 8:29am via mobile · · 1
    • Sushila Shivran ‎"आवाज गूंजती है
      मेरे कानों में ;
      और आगे नहीं
      आगे खड़ी है मत्यु
      मुझे लगता है
      उत्सव नहीं
      भय ही मृत्यु !"

      Om Purohit Kagad - क्या कोई अपनी मृत्यु को पहले ही देख पाया है? फिर आप कैसे इतने विश्‍वास से यह कह सकते हैं मृत्यु ने आपको रूक्का थमा दिया है कि "और आगे नहीं"।
      मैं शिल्प की बात तक तो पहुँच ही नहीं पा रही बस यही प्रश्‍न मन में घूम रहा है कि ऐसी क्या बात हुई कि मन में ऐसे भाव जगे?
      आज हर बीमारी का इलाज है और आदमी आखिरी साँस तक आस नहीं छोड़ता फिर आप कैसे इतने विश्‍वास से कह सकते हैं कि आप की मृत्यु आपके दरवाज़े खड़ी है?
      जीवन में इतनी हताशा ठीक नहीं। कहते हैं चिता और चिंता में बहुत बारीक अंतर है। वैसे मौत आए या ना आए चिंता अवश्‍य चिता तक ले जाती है।
      विषम परिस्थितियाँ हों, विपदा हो, बीमारी हो या दारूण दुख....संघर्ष ही जीवन है।
    • Om Purohit Kagad Sushila Shivran ji , यह मेरी मृत्यु की कविता नहीं है । मैंने अपने माध्यम से बात कही है । यह मेरा चिंतन है और सार्वभौमिक विचार है । यहां "मैं"में व्यष्टि नहीं समष्टि है । जरूरी नहीं कि जो मैंने कह दिया वह अंतिम सत्य है ।
      आपके विचार अपने स्थान पर सही हो सकते हैं ।
      Yesterday at 9:01am via mobile · · 3
    • Shuchita Srivastava atyant sundar....
    • Om Purohit Kagad परसों मैंने एक अंग्रेजी कहानी का हिन्दी अनुवाद "जाने नहीं दूंगी " पढ़ा । इस कहानी में पुत्रों व पुत्रवधुओं की अनदेखी से त्रस्त मृत्यु के अंक में बैठी वृद्धा मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए कहती है -मृत्यु तो उत्सव है आत्मा का देह से मुक्ति का । बस तभी से मन में कुछ घुमड़ रहा था ।
    • Pooran Singh Yadav Mratyu yadi bhay hai ,
      to jeewan bhi nirbhay kahan ?
      Ek hamesa shaalata hai aur ek
      shirf ek baar aata hai .
      Yesterday at 9:36am via mobile · · 1
    • Sushila Shivran प्रसन्नता हुई यह जानकर ,"यहां "मैं"में व्यष्टि नहीं समष्टि है । "
    • Atul Kanakk उनके मिलन के
      उत्सव का माध्यम
      मेरी मृत्यु ही क्यों है ...hai, lekin utsav dharmi log mrityu mei bhi utsav talaashte hain kyonki is anivaarya aapda ke bhay se mukta hone ka koi doosra upaay bhi nahin
    • Om Purohit Kagad भाई Atul Kanakk ji , मैं इन दिनों अस्वस्थ जरूर हूं मगर मृत्यु से भयग्रस्त नहीं हूं । मैं मृत्यु से तब भी नहीं घबराया जब सन 2000 में मेरे 8 ऑप्रेशन हुए । वजन 95 kg से 55 kg हो गया और डॉक्टर ने मेरे परिजनों को मेरे सामने कहा कि "इसे घर ले जाओ ! सेवा करो ! ये बस दो तीन महीने जीएगा !" तब मैंने मृत्यु के साक्षात दर्शन किए । मैं मृत्यु से लड़ा और जीता । तब मैंने हॉस्पीटल में जीवन मृत्यु पर 200 कविताएं भी लिखी !
      आज जो संकट है वह उस से बड़ा है । मेरे एक मात्र पुत्र की मृत्यु के बाद घर में सब मृतप्राय से हैं । पिता जी को इस हादसे के बाद दो बार ब्रेनहेमरेज हुआ और वे चले गए । मां को दो हर्ट अटैक हो चुके हैं । भाई अनिद्रा व बी.पी. का शिकार हो गया । पत्नी विक्षिप्त हो गई । मुझे उच्च रक्तचाप व हृदय रोग हो गया । 40% ब्लॉकेज है । बी पी 220/120 है । एक पूरा व एक सायलेंट हर्ट अटैक भी हो गया ।
      अब जब कुछ जादा तकलीफ हुई तो डॉक्टर घर आया । डॉक्टर के आगे पत्नी बच्चों की तरह बिलख पड़ी -"इन्हें कुछ नहीं होना चाहिए । ये चले गए तो मेरा क्या होगा ।"
      हम पति-पत्नी जब एकांत में होते हैं तो वह कहती है "थे म्हनै छोडगै ना जाया , बस !"
      बच्चे की मृत्यु व बेटियों की शादी के बाद वह बिल्कुल एकाकी हो गई है । मैं तो बाहर यायावरी कर ग़म से निजात पा लेता हूं । वह घर में घुटती रहती है । मैं तो इस महीने 15 दिन जिले में और कुछ दिन जयपुर , दिल्ली , अजमेर , बीकानेर आदि जगहों पर बीमारी के बावजूद जा आया । जबकि डॉक्टर ने बेडरेस्ट घोषित किया हुआ है । हाई बी पी के कारण सांस लेने में भी दिक्कत होती है । चार कदम चलते ही सांस फूल जाती है । कल पूरा दिन खाना नहीं खाया । आपको नहीं लगता कि मृत्यु ही डरती है, मुझ से, मैं नहीं ! मृत्यु से ये संघर्ष जारी रहेगा ।
    • Aparna Khare sir ji apka dard bahut bada hain..lekin apne ise jeeta hain..ye us se bhi badi baat hain...ap ko naman hain...patni ko kahe yu til til kar jeene se kya hoga..bahaduri se jiye maut to ek na ek din ayegi uske liye abhi se darna theek nahi unhe kisi racnatak karya me lagaye ya poori company de taki wo dukh se ubar sake....agar ap jaipur me hain to bataye...main kuch madad kar sakti hoon unki..
    • Raju Netewala o m g main aapka chota bhai hu , mafi chahta hu m, lekin koi kam aa saku to meri khushkismati hogi, main vayaqt nahi kar pa raha hu kya kahu.............
    • Sushila Shivran धन्य हैं आप Om Purohit Kagad गुरु जी ? मेरी किसी बात से आपको दुख पहँचा हो तो क्षमा ! मुझे लगा कि यह कविता बेहद हताशा का परिणाम है। पुन: क्षमा याचना करती हूँ।
    • Ravindra Mothsara Long Live Kagad.
    • Meenakshi Kapoor jab bhi udhe mrityu k virudh hi udhe ...............bahut gahraee hai aapk lekhan me Om ji .................
    • Navneet Pandey भय भी शक्ति देता है( लीलाधर जगूड़ी) बंधु!
      22 hours ago · · 1
    • Surendra D Soni WAAH....!
      22 hours ago · · 1

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