रविवार, मई 20, 2012

एक हिन्दी कविता

क्या तुम मुस्कुराई थी
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आज
चांद की रंगत
कुछ जादा ह
बदली-बदली है
शायद
तेरे घर के ऊपर से
हो कर आया है ।

खुले आसमान में 
बदलियां बेखौफ
भाग रहीं हैं
उसकी मोहक मौन
मुस्कान छूने
दौड़ तेज है परस्पर
मगर कुछ आगे है
आज चांद उन से
आतुर है शायद
मुझे कुछ बताने को !

सच बताना
क्या तुम आज
मुस्कुराई थी
शून्य में झांक कर
जिसे देख पहली बार
मैं भी भागा था
आंगन से छत की और !

1 टिप्पणी:

  1. "सच बताना
    क्या तुम आज
    मुस्कुराई थी
    शून्य में झांक कर
    जिसे देख पहली बार
    मैं भी भागा था
    आंगन से छत की और"

    वाह! अति सुंदर

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