सोमवार, अक्तूबर 22, 2012

*सम्बन्ध*

*

टूट कर
अलग हो जाए पत्ता
मगर
एहसास रहता है
शेष शाख पर
सम्बन्धोँ के अतीत
होने का !

थे जो कभी
साकार मुखर
आज निराकार
धार असीम मौन
स्मृतियोँ मेँ
फिर फिर से
लेते हैँ आकार
बतियाऊं कैसे
स्मृतियोँ के एहसास से !

सम्बन्ध नि:शब्द जन्मे
नि:शब्द रहे
नि:शब्द ही
कर गए प्रयाण
अर्थाऊं कैसे
असीम मौन औढ़ कर !

1 टिप्पणी:

  1. टूट कर
    अलग हो जाए पत्ता
    मगर
    एहसास रहता है
    शेष शाख पर
    सम्बन्धोँ के अतीत
    होने का !....और यादों के फल होने का

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