गुरुवार, जून 06, 2013

[1]

न इश्क है
न बीमारी
न चिँता है
न खुमारी
फिर क्योँ उड़ गई
रातोँ की नीँद हमारी ?
सवाल तो
और भी हैँ
फिलहाल
इसी का चाहिए
हमेँ जवाब ;
पेट भरने के बाद भी
क्योँ चाहिए तुम्हेँ
दुनियां की दौलत सारी ?

[2]

हाड़ तोड़ मेहनत कर
घुटनोँ तलक पसीना बहा
पेट नहीँ भरता
मेरे नत्थू का
जब से उगी है मूंछ
मुठ्ठियां तानता है
अब खाता नहीँ
शपथ संविधान की !
क्योँ कहता है वह
एक संविधान से पहले
दो जून धान जरूरी है ?

[3]

क्या जवाब दूं
मेरे नत्थू को
जो बार बार पूछता है-
धाए अघाए लोग
संसद मेँ
और
जन्म के भूखे
दड़बोँ मेँ
क्योँ रहते हैँ ?

[4]

ब जब भी
चूल्हे से ज्यादा
दिल जलता है
मुझ से पूछता है
मेरा नत्थू ;
वाब दो
क्योँ पटक दी गई
हमारे ऊपर
जन्म से पहले
गरीबी की रेखा
क्योँ नहीँ उकेरी गई
अमीरी की रेखा ?

[5]

भूखे लोग
जब जब भी
संगठित हो
करते हैँ अनश
उन पर
क्योँ बरसाई जाती हैँ
खुले हाथ लाठियां
क्योँ नहीँ बरसाई जाती
दो जून रोटियां ?
मेरे पास
कोई जवाब नहीँ
नत्थू के इन सवालोँ का
तुम ढूंढ़ लो
वह दड़बे से
निकल गया है !

1 टिप्पणी:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    चरखा चर्चा चक्र चल, सूत्र कात उत्कृष्ट ।

    पट झटपट तैयार कर, पलटे नित-प्रति पृष्ट ।

    पलटे नित-प्रति पृष्ट, आज पलटे फिर रविकर ।

    डालें शुभ शुभ दृष्ट, अनुग्रह करिए गुरुवर ।

    अंतराल दो मास, गाँव में रहकर परखा ।

    अतिशय कठिन प्रवास, पेश है चर्चा-चरखा ।

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