गुरुवार, अप्रैल 10, 2014

रूह में थी मैं

प्रेम के नहीं
वशीभूत थे तुम
अपने ही मनोरथ के
जिसे पूरने
हो आए तुम 
मेरी देह तक
देह में कहीं भी
नहीं थी मैं ।

रूह में थी मैं
तुम भटकते रहे
देह में मेरी
मेरी देह में
रुके नहीं तुम
रुके तो कभी
मन में भी नहीं
सम्बन्धों में ही
चिपकाए रहे
और
मैं ढोती रही तुम्हें
अर्धनारी बन कर
तुम कभी
न अर्धनारीश्वर हुए
न पूर्ण पुरुष !

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