रविवार, जनवरी 29, 2012

एक हिन्दी कविता

[++] आती नहीं हंसी [++]




हंसी तो आती है


मगर वक्त नहीं अभी


खुल कर हंसने का


जब नत्थू रो रहा


अपनी बेटी के हाथ


पीले न कर पाने के गम में


धन्नू की भाग-दौड़


थम नहीं रही


खाली अंटी


पुत्र का कैंसर टालने मैं ।






वोट भी डालना है


अभी अभी


डालें किसे


सभी लिए बैठे हैं


वादों की इकसार पांडें


भाषणों की अखूट बौछारें


इरादे जिनके साफ


वोट डालो तो डालो


न डालो तो मत डालो


छोड़ें तो छोड़ें


मारें तो मारें


हम ही बनाएंगे सरकारें


ऐसे में हंसी आए भी तो कैसे !






फिर भी


हंस ही दिया था


गरीबी की रेखा के नीचे


बरसों से दबा


रामले का गोपा


नेता जी के सामने


भारत निर्माण का


विज्ञापन देख कर


तीसरे ही दिन


पोस्टमार्टम के बाद


मिल गई थी लाश


बिना किसी न्यूज के


उठ गई थी अर्थी


उस दिन जो थमी


आज तलक नहीं लौटी


हंसी गांव की !






अब तो


बन्द कमरे में


हंसते हुए भी


लगता है डर


सुना है


दीवारों के भी


होते हैं कान


लोग ध्यान नहीं


कान देते है


इस में भी तो


बात है हंसी की


मगर


दुबक कर कभी भी


आती तो नहीं हंसी !

एक बाल कविता

*उलट पुलट कविता*




डोर के पीछे पतंग भागा ।


बिल्ली के पीछे चूहा भागा।।


कार बैठी जा बस के भीतर।


आम बैठा गुठली के भीतर।।


कूआ मिला पानी के भीतर ।


राजा मिला रानी के भीतर।।

दो हिन्दी कविताएं

*अविचल पहाड़*


खड़ा था पहाड़


अटल-अविचल


नभ को नापता


सूरज को तापता


आंधियों ने


वो अविचल पहाड़


हिला दिया


काट-तोड़-फोड़


हवाओं ने वो पहाड़


मिट्टी में मिला दिया !
 
 
.


[<0>]प्रीत की साख[<0>]



निराशा के थेहड़ में भी


आशा की उज्ज्वल किरण


सुरक्षित है हमारे लिए


जो आ ही जाएगी


आत्मीय स्पर्श ले


हमारे सन्मुख


समय के साथ


इस लिए


मैं कर रहा हूं इंतजार


समय के पलटने का ।






समय दौड़ रहा है


आ रहा है समीप


या जा है रहा दूर


अभी तो देता नहीं


वांछित ऐहसास


आश्वस्त हूं मगर मैं


एक हो ही जाएगा


हमारे सन्मुख नतमस्तक !






इसी लिए


कहता हूं प्रिय


तुम भी करो इंतजार


बैठ कर अपने भीतर


बदलते समय का


यही आएगा


बन साक्षी


भरने प्रीत की साख !

पांच हिन्दी दोहे

.


[<*>] सरदी के दोहे [<*>]


हाड़ काम्पते देह में,ठंड ठोकती ताल ।


भीतर बैठी शान से,नहीं बचेगी खाल ।1।


धुंध फड़कती छा गई, हवा बिगाड़े तान ।


होंठों पपड़ी आ गई,ठंडे होते कान ।2।


कपड़े लादे देह पर , हाथ में चुस्की चाय ।


भाप निकलती कंठ से,काया ठरती जाय ।3।


मीठी मीठी रेवड़ी, पापड़ी लिज्जतदार ।


गरम खाओ पकोड़ियां, सरदी सदाबहार ।4।


औढ़ रज़ाई दुबक लो, ढक लो सारे अंग ।


मात खाएगी ठंड तो ,तूम जीतोगे जंग ।5।






प्रीत : दो चित्र

(::) रेत की पीर (::)



[1]

बहुत रोती होगी


रात के सन्नातटे में


बुक्काफाड़


तभी तो


हो लेती है


भोर में


शीतल


शांत


धीर


रेत की


अनकथ पीर !






[2]


हवा के संग


छोड़ यायावरी


दुबक गई है


प्रेत सरीखी


शीत से


भयभीत रेत


लिपट धरा से


पाने


अंतस बसी


स्नेहिल तपिश

दो हिन्दी कविताएं

{} कौन है {}




आंख झुकी


थकी सी
मौन है


देख दिल


पलकों में


कौन है !
 
[0] कहां हैं हमारे देव [0]




बुद्धि झोंक मेहनत


अनेक दंद-फंद


तीन-पांच के बाद भी


जो देव नहीं तूठे


उन्हें रिझाने चला


शहर क बड़े पंडाल में


अखंड कीर्तन


बुलाए गए


नामी भजनी


तबलची-झांझरिए


नगाड़ची-खड़ताली


भोग के निमित


पकाए गए


रसीले पकवान !






रात भर


हुआ कीर्तन


गाए गए


भजन पर भजन


लगे परोसे


चले दांत


भरी आंतें


ठोस पेटों के लिए


देवों को मिले


छप्पन भोग


खुशी-खुशी


सब अघाए


थके खा-खा


सुन सुन


धाए घर !






रात ढली


हुई भोर


छाया सन्नाटा


घर-आंगन-पंडाल मेँ


मांजते रहे बर्तन


करते रहे सफाई


सब कुछ करीने से


जुटाने-सजाने में


जुटे मजदूर


जिन्होने कीर्तन में


उद्घाटन से


समापन तक


न कुछ गाया


न कुछ खाया


रात भर नहीं किया


देव कीर्तन


अब कर रहे हैं


कीर्तन उनके हाड़ !






एक दूसरे से


मजदूरों ने पूछा


देव कब खुश हुए


किसे क्या दे गए


हमें भी दिया होगा


कुछ न कुछ


आयोजकों को दे कर


मनवांछित सब कुछ


या देव थे


उनके अपने


फिर कहां हैं हमारे देव ?

एक हिन्दी कविता

{{}} काफ़िर शरद में {{}}




आया करो


मन मरुस्थल पर


काफ़िर शरद मेँ


मावठ की तरह


झूम कर !






छोड़ शिखर


जिद्द का


नीचे मी


उतरा करो


आया करो चाहे


पर्वतो पर उन्मुक्त


घूम कर !






हम हैं


ख़ला से उतरी


किरण सूरज की


होंगी खुश


पत्तियों पर


बूंद शबनमी


चूम कर !

एक हिन्दी कविता

{()} मावठ की बारिश {()}




आज फिर हुई


मावठ की बारिश


जम कर बरसा पानी


टूटी टापरी में


नत्थू बेचारा


काट रहा था दिन


अब काट रहा है


चिंताओं की फसल


जो उग आई है


उसके खुले आंगन !






डांफर-ठिठुरुन में


धूजते बच्चे


मांगते स्वेटर


बूढ़ी अम्मा की चाहत


एक और कम्बल


छत पर


झाड़-फूस-खपरेल


खुद के तन का भाड़ा


घर से जो न निकला


कैसे निकलेगा जाड़ा


आज जुटेगा सब कैसे ;


चिंताओं में


लग गए दूभरिये !






कोठियों में


तले जा रहे


पकोड़ों की गंध


करे बच्चों में


घर का मोहभंग


तार तार होती ममता


थामे कैसे ।






थमेगी जो बारिश


थमेगी मजदूरी


रोएगा खेत


बिलखेगी रेत


जन्मेगी मजबूरी


स्वागत है बारिश


टापरी टाळ


अनचाहे आंसू सी


बरसती जा


मावठ की बारिश !

हिन्दी गज़ल,






माया रचाई खोटी बाबा ।

पूंजी कमाई मोटी बाबा ।।

मेहनत करने वाले हारे ।

जुटी नहीं वहां रोटी बाबा।।

लोहा बेचे भाव सोने के ।

कैसी हुई कसोटी बाबा ।।

बिना बोटोँ के जीता नेता ।

खूब बैठाई गोटी बाबा।।

उनका भाग्य संवरा संवरा।

मेरी किस्मत छोटी बाबा।।

खेत आपका सांड ये चरतै ।

अपनी दिखाओ सोटी बाबा।।

एक हिन्दी कविता

.


[}{] नहीं रोया पत्थर [}{]



पत्थर जो पूजे


मन से आप ने


बोले तो नहीं


आ कर कभी


आपके सामने ।






तुम रोए


गिड़गिड़ाए


आंसू बहाए


एक दिन भी


नहीं रोया


कभी पत्थर


तुम्हारे साथ


फिर क्यों रोए तुम


उस पत्थर के आगे ?






उस के नाम पर


तुम ने श्रृद्धा से


किए व्रत दर व्रत


बांची व्रत कथाएं


साल भर कीं


सभी एकादशियां


भूखे -निगोट-निर्जला


आया तो नहीं


कभी जलज़ला


उस पाहन में ?






सारे भोग प्रशाद


तुम ने तो नहीं


उसी ने लगाए


न उस के दांत चले


न कभी आंत


पता नहीं


कुछ पचा या नहीं


तुम्हारे भी मगर


कुछ बचा तो नहीं


उसकी स्थिर मुखराशि


स्थिर अधखुले अधर


ज्यों घड़े शिल्पी ने


पड़े रहे अधर !






किसी भी दिन


कुछ न बोला पाहन


दो शब्द भी नहीं


तथास्तु भर


स्थिर रहा


स्थिर रही आस्था


स्थिर तुम्हारी श्रृद्धा


मगर तुम्हारे भीतर


कुछ भी न था स्थिर

आज किशोर कविता



>{}{} अम्मा {}{}<



देश बदला


प्रदेश बदला


बदल गया संविधान


गांव बदला


शहर बदला


बदल गया परिधान


खाना बदला


पीना बदला


बदल गया विधिविधान


जीना बदला


मरना बदला


बदला गया शमशान


माया बदली


ममता बदली


बदल गया इंसान


जो न बदली


वो अम्मा थी


बदल गया मकान


सरदी पड़ती


वो ना डरती


आया नहीं व्यवधान


सुबह सवेरे


उठ कर आती


भजन सुनाती


गाती प्रभाती


खुश करती भगवान


चूल्हा जलाती


चाय बनाती


हमेँ पिलाती


सब का रखती ध्यान


सबको सुलाती


फिर वो सोती


अम्मा कितनी महान

एक हिन्दी कविता

*मनवा मेरा निपट अकेला*




दसों दिशाओं फैली जगती


फिर भी क्यों मैं रही अकेली


एक अकेली जीए एकाकी


सब ज़िन्दा मैं मुर्दा क्यों


कैसे चले सांसों का रेला


मनवा मेरा निपट अकेला !






तेरा-मेरा करते-करते


मनवा मेरा हार गया


जीवन का सब सार गया


पहन हार संगी खोजा


संगी नजरों पार गया


देह बची देखे सपना


सपनों का संसार गया


दिखा न धारणहार


खाने दौड़ी भोर की वेला


मनवा मेरा निपट अकेला !






सतरंगी सपने चुन कर


गूंथ लिया घर-आंगन


आज अकेला आंगन पूछे


सूना क्यों व्यवहार दिया


झनकी ना पायल मुझ पर


चूड़ी की खनक ऊड़ी कहां


बिंदिया क्यों उदास पड़ी


कब लगेगा मिलन का मेला


मनवा मेरा निपट अकेला !






संग-संग चलती सांसों के


सुर पड़ गए मध्यम क्यों


तानों और मनुहारों की


मधुरिम मधुरिम स्वरलहरी


प्रीत की जो थी बनी प्रहरी


मौन साध कर बैठी क्यों


कोई न रूठा-कोई न छूटा


फिर क्यों ये मौसम नखरेला


मनवा मेरा निपट अकेला !






जितने जाए सब धाए


संगी अपने खोज लिए


अपने अपने महल चौबारे


बैठे ले कर सब न्यारे न्यारे


मौज मनाते वारे-न्यारे


मेरा संगी यादों बसता


आता नहीं द्वारे मेरे


किस को अपना दर्द सुनाऊं


किस के आगे रूठूं इठलाऊं


कब मिटेगा बिछढ़ झमेला


मनवा मेरा निपट अकेला !






तुम थे संग जब में मेरे


सारी ऋतुएं दौड़ी आती थीं


अब तो इस देही पर साथी


वसंत भी आना भूल गए


सूखे पत्तों सरीखे गात भी


गाना-मुस्काना भूल गए


उमर उठी थी जो संग में तेरे


देखो छोड़ गई बुढ़ा कर डेरे


अब भी आ जाओ साथी


गूंथ लेंगे दिन नया नवेला


मनवा मेरा निपट अकेला ।

एक हिन्दी कविता

<> आए सपने <>




रात भर


जगी आंख


आए सपने


सपनों मेँ अपने


जो रहे मूक


हम न रहे मून ।






हमारा एकालाप


तलाश न पाया


मुकाम वांछित


फिर भी


थमा नहीं


सिलसिला बात का


थाम कर


डोर शब्दों की


करता रहा पीछा


तुम्हारे अंतस का

एक गज़ल

सच भी बहाना


सच अपना तो सब फसाना लगता है ।


सच्चे का मगर सब बहाना लगता है ।।


अश्कों से भीगा चेहरा ये आपको ।


हमाम में खुल कर नहाना लगता है ।।


लगा कर मुखपट्टियां मुखड़े हमारे ।


बीच से दीवार ढहाना लगता है ।।


वादे   टूटे तो   टूटें सो    मरतबा ।


उनको अपना दर्द तहाना लगता है ।।


आती नहीं सांस वहम की दुर्गंध में ।


तुमको ये मौसम सुहाना लगता है ।।

मंगलवार, नवंबर 01, 2011

दो ताज़ा हिन्दी कविताएं

*प्रीत पुराण*
प्रीत के बादल
उमड़े इधर
घुमड़े उधर
मन का मोर
... नाचा बहुत
ताता थइया
कड़कीं बिजलियां
इसी ऊहापोह मेँ
बिन बरसे लौट गए ।

अब लोग कहेँ
मौसम नहीं बारिश का
औढ़ रजाई दुबको
नहीँ भरोसा शीत का
छोड़ो आमंत्रण
मीत का-प्रीत का ।

यक-ब-यक लौटे
बादल प्रीत के
आते तो हैं
हमारी प्रीत की
भरने साख
देर रात जाग जाग
अर्थाते हम उसको
दिखती छवियां
लेती नहीं आकार
भोर सुहानी
करे मनमानी
तृण दल ऊंचे
आंसू कातर
मान औसकण अपने तन
अपना मन
बांधे रखता
आस पुरातन !
*इतिहास का सम्मोहन*
वक्त समेटता
खुद को
हो जाता इतिहास
हम तलाशते उस मेँ
... अपने खासम खास ।

करवट लेतीं आकांक्षाएं
कालपुरुष के पासंग
हम ढूंढ़ते उस में
आदिम सपनों की
हारी जीती जंग !

वक्त आज गुजरता
चाहता संग ले जाना
कालखंड के हस्ताक्षर
कौन चलेगा
कौन रुकेका
बारूदों बैठी
दुनियां दिखती दंग !

कालचक्र घूमता
रचता कालग्रास
आ तू-आ तू
तू आ-तू आ की
देता टेर
निज अभिलाषा ले
देखो निकले दंभी
इतिहास पत्रों के
सम्मोहन में बंधते
बदलें कितने रंग !

वो दूर गगन मेँ
उड़ती चिड़िया
उतरी कहां-किधर
कौन बताएगा
गुजरे वक्त
तुम बताना
कौन जीता
कौन हारा
सभ्यता के पाखंडों में
जीवन वाला जंग !
 

दो ताज़ा हिन्दी कविताएं

*मां के साथ*
रात रात भर
सोते हुए जागना
जागते हुए सोना
... कोई बीमारी नहीं
लाचारी भी है
इश्क-रिस्क
भूख-भय
इल्म और जुल्म
सबब भी हैँ
मगर
सोने की नसीहत
बांटने वाले लोग
मां तो नहीं होते
जो सुला दें
हमारे दुखों का
स्वयं वरण कर !

निःर्थक तो नहीं होतीं
मां की लोरियां
मीठी थपकियां
या फिर
थके हारे माथे पर
झुर्रियों सने हाथ का
ममता भरा
मनोचिकत्सकीय स्पर्श
जो कर देता है
हमारी वेदनाओँ को
अतंतस्थ तक परास्त !

मां के साथ
देर तक जागना
जोड़ देता है
तीनोँ काल से
विरासत
संस्कृति
इतिहास और परम्परा से
मां ही सुलाती है
सुखों की शैया पर
वही नहालाती है
शांति के सागर मेँ !

मां !
तुम मानसरोवर हो
जहां मिलते हैं मुझे मोती
तुम आश्रम भी हो
जहां मैं बांचता हूं
भव की पोथी !

सच मेँ मां
तुम्हारा स्मरण भर
मुझे कर देता है
भव बाधाओं के पाश से
मुक्त उन्मुक्त !
 
 
*मौन अंधेरा*
उजाला चला
अंधेरा चीर
निकला आगे
आगे से आगे
... दंभ पालता
भरता डग गम्भीर !

पीछे दौड़
अंधेरा आया
मंद गति
घनघोर छाया
बिम्ब समेटे
प्रतिबिम्ब लपेटे
भीतर अपने
निगल गया
उजाले की तकदीर ।

एक अकेली
धारे आंख
दसों दिशा मेँ
सूरज दौड़े
उसकी पीठ
बैठ अंधेरा
पल पल
उसका
दंभ तोड़े !

जगमग दीपक
करता टिम टिम
उसके नीचे
अमा का नाती
बैठा मौन अंधेरा
दीपक भोला
बात्ती तानेँ
कब जानेँ
रात अमा की लम्बी है
चांद छौड़ कर
भागा जिसको
रात वह अवलम्बी है ।

दो ताज़ा हिन्दी कविताएं

*पानीदार पानी*
 
मेरी प्यास के लिए
पानी नहीँ आया
पानी लाया गया
अपने पानी के लिए !
...
पानी के लिए
लोग दौड़े
पानी के लिए ही
अड़े-भिड़े
लड़े-मरे
कहीं पानी देखा गया
कहीँ देख लेने की बात हुई
कहीँ पानी बचाया गया
कहीँ कही उतर भी गया !

पानीदार चरित्रों की
कहानियां लिखी गईं
इतिहास रचा गया
पानीदारों का
हम तरसते रहे
प्यास भर पानी को !

पानी तो
हम भी बचाते रहे
बचा नहीँ मगर कभी भी
हमारा पानी
कभी भी
पानी की संज्ञा में
आंका ही नहीं गया ।

अब वे
लाए हैँ समाचार
दूर देश से ;
अगला युद्ध
पानी के लिए होगा
इस लिए पानी बचाओ !

मां कहती है
मैंने तो
घर के भीतर भी
भयानक युद्ध देखे हैँ
पानी के लिए
अब तो
उतरने लगा है
तांबे के गहनों से
सोने का पानी
जो कभी चढ़ाया गया था
घर के पानी के लिए !
 
 
*अपने घर भी हो दिवाली*
 
फूटे पटाखा
छूटे फुलझड़ी
आतिश जाए आकाश मेँ
हम को क्या पड़ी
... दो जून पकें रोटियां
नत्थू-बिजिया सोएं ना भूखे
हंस लें दे कर ताली
अपने घर भी हो दिवाली !

बैंक-साहूकारों का उतरे कर्ज
रोशन जगमग घर मेँ
पसरे ना कोई मर्ज
कांडवती ना हों सरकारें
समझेँ अपना फर्ज
अपने नेता जी की
नीयत ना हो काली
अपने घर भी हो दिवाली !

भीतर देश के
ना हों आतंकी
सीमा पर हो भाईचारा
घर का फौजी भैया
घर मनाए ये दिवाली
अम्मा संग बैठ कर वो भी
पीए चाय गुड़वाली
अपने घर भी हो दिवाली !

घर से निकला
घर को आए
तवे उतरी रोटी खाए
भंवरी-कंवरी हो सुरक्षित
सड़क किसी को न खाए
नोट चले सब असली
एक न निकले नकली
अपने घर भी हो दिवाली !

हक किसी का
छीने ना कोई
राजा पूछे
क्यों जनता रोई
बाजारों मेँ हो
सच्चा सौदा सेवा का
असली पर ना हो
नकली का धंधा भारी
कोई ना करे धंधा जाली
अपने घर भी हो दिवाली !

दो ताज़ा हिन्दी कविताएं

*पेट दिखाता है दिशाएं*
 
मैं पंछी
कहां बैठता हूं
एक डाल
उड़ उड़ जाता हूं
... जंगल दर जंगल
पेड़ दर पेड़
शाख दर शाख
इस में
उपक्रम चाहे पंखों का है
हौसला तो पेट ही देता है !

पेट दिखाता है दिशाएं
मौन आंखे
देखती रहती है आगत
पंख फड़फड़ा कर
उड़ा ले जाते हैं
दूर देश
याद रहता है अंतस को
अपना आसमान
अपना पेड़
अपना घौसला
अपनी टहनी
अपनी वह ज़मीन
जिस पर खड़ा है
अपने वाला
वह बूढ़ा पेड़ !

चौंच का भक्षण वही
जो पेट की चाहत
रसना का वाक वही
जो ज़मीन की चाहत
ज़मीन ने उचरवाया
राम-राम !
अल्लाह-अल्लाह !!
वाहे गुरु-वाहे गुरु !!!
यीशु-यीशु !!!!
रसना ने उचारा !

पेट का पेटा भरते ही
गुलाम हुई स्वक्रियाएं
पंख छोड़ गए साथ
मीत हुए क्षुधा के
मूक संवेदानाएं
निहारती रहीं अंतस में
अपना पेड़-अपना घौसला !
 
 
*हमारे बीच नदी*
 
तुम्हे खत लिख दूं
उलट दूं मनगत उस पर
भले ही सारी गत लिख दूं
यकीन तुम करोगे
... मैं कैसे मान लूं
जबकि मैं जानता हूं
संदेह और सवाल
तुम्हारी आदत है !

तुम्हारे साथ
चलते चलते
मेरे पांवों मेँ
पड़ गए थे छाले
दर्म मेँ जब मैं कराहा
तुम्हें कहां हुआ यकीन
मेरे जूते उतरवा कर ही
माने थे तुम
और फिर
मेरे न चल पाने पर
तुम्हारा संदेह
यथावत ही रहा
मेरे लाचार पड़ाव में
पूरे वक्त !

सवाल और संदेह
तुम्हारी वृति है
और उन्हें टालना
मेरी प्रवृति
इस लिए
न कभी तुम्हारी हार होती है
न मेरी जीत
हम दोनों के बीच
बस तैरती रहती है
असीम अखूट घुटन
जो हमेँ जोड़े रखती है
एक दूसरे के भीतर
समूचा उतरने की चाह मेँ !

आओ !
सतत बहती नदी से
सीख लें
निरपेक्ष बहना
जिसे मिल ही जाता है
अन्त मेँ
अथाह समुद्र
बिना सोचे
बिना समझे !

दो ताज़ा हिन्दी कविताएं

*प्रीत को धारती जमीन*
 
प्रीत का बीज
मस्तिष्क मेँ नहीँ
मन मेँ अंकुराया
दिल मेँ पला
... और
जीवन मेँ फल !

मन वश में नहीँ था
नहीँ रोक पाया
प्रीत का अंकुरण
दिल का साथ पा
पनप गया प्रीत का बिरवा
लहलहाने लगा
हुआ अथाह घनीभूत
रास न आया जगत को
नहीं हुआ फलीभूत !

हर सू
जीत हो प्रीत की
इसी के निमित तो
नहीँ थी प्रीत
प्रीत चाहती रही
अर्थाना स्वयं को
हम अर्थाते रहे
केवल स्व को
स्व में कोई और कहां
बहुत एकाकी थे हम !

मरी तो नहीँ प्रीत
मुरझाय भी नहीँ
बिरवा प्रीत का
कभी भी
कहीं भी
बस पतझड़ से गुजरा
हताशा मेँ हम नेँ ही
छीन ली
गमला भर ज़मीन
प्रीत की जड़ों से !

हम दौड़ाते रहे
मस्तिष्क के घोड़े चहुंदिश
तलाशने प्रीत के बिरवे
नहीँ मिले
मिली घृणा की खरपतवार
अब जाना
प्रीत शिखर पर नहीं
जड़ों मेँ थी
मगर
शेष नहीं थी
स्मृतियों रची प्रीत
प्रीत को धारती जमीन !
 
 
*ज़िन्दगी*
अब अगर कोई
हसना चाहे तो हस ले
रोना चाहे तो रो ले
हम ने ज़िन्दगी के आगे
... हार मान ली
छोड़ ही दिया आखिर
घुट घुट कर मरना !

आ ज़िन्दगी !
आ मेरे आंगन
हस-खेल
ठहाके लगा
उच्छल कर आ
ले ले मुझे
अपने आगोश में
उठा कर
पल पल आती
मौत की गोद से !

साकार जगत में
तुम निराकार हो ज़िन्दगी
मैंने
छुप छुप कर
उकेरा है तुझे
कई कई बार
तुम दिप दिप आई
धानी शीतल रंग धारे
अक्षपटल पर मेरे
मैंने छूना-पाना चाहा
तुम फिसलती गई
दूर, बहुत दूर !

सफेद होते बालों
गालों की झुर्रियों में
टसकते घुटनों-टखनों में
बैठती आवाज
कर्ज ढांपती क्रियाओं में
तुम आई होती ज़िन्दगी
मैं भी दो कदम चलता
न तुम हारती
न मैं हारता !