सोमवार, जुलाई 29, 2013

मौन तुम

पुकारूं तो 
मौन रहते हो
मौन रहूं तो
होता है आगमन
शायद तुम
बारिश रहे हो
थार में कभी 
या फिर
किया है वरण
थार के आकाश में
आवारा बादल का !

मरुधर द्वारे

मरुधर द्वारे
आया बादल
बरस-बरस कर
रजस्वला देह पर
छोड़ गया अपना अंश
मिट गया धरा का
अभिशप्त होता दंश
अब जनेगी हरियाली
खूब फलेंगे
हरित तृण-तरु वंश
मन मरुधर का
आज डोल रहा है
तोड़ कर मौन
मोर बोल रहा है !

 

*प्यार फैलता है*

सुना था
प्यार एक ऐहसास है
कोई फर्क नहीं पड़ता
चाहे फिर कोई
दूर है या पास है !

प्यार फैलता है
सिमटता नहीं कभी
यदि टूटता है तो
वो होता ही नहीं प्यार
निरा स्वार्थ होता है
जो तलाशता है
प्यार में
अपना वांछित
नहीं मिलने पर
हो जाता है अलग !




यह नहीं सुना कभी
प्यार किया हो
और हो गया हो
सुना है
प्यार करने से नहीं
होने से होता है
जैसे होता है
एक माँ को
अपने बच्चे से !

तुम प्यार मत करो
करो इंतजार
प्यार होने का
होना होगा तो
हो ही जाएगा
एक दिन
बिना बताए
बिना पूछे !

नेह का मेह

नहीं आया
मरुधरा का

प्रिय बादल
नहीं बरसाया
नेह का मेह
विरह में
तमतमाई रेत
आंख में गिरी

उलीच कर
खूब गिरा
तब पानी !

*लड़की सोचती है*

अपने बचपन की
मधुरतम यादें
गली-मोहल्ला
अपना घर
मां बाप का दुलार
भाई-बहिनों का प्यार
यहां तक कि खुद को भी
छोड़ कर अपने गांव में
किसी के पीछे बंध कर
चली आई थी लड़की
अपने स्व का
निर्बाध विलय
किसी में करने
किसी को रचने
जो हो ही गया था
शहनाई की गूंज के बाद !


यक-ब-यक
वही छूट गया
जिस में होना था
उसका सम्पूर्ण विलय
अब घर
रह गया था
केवल एक अरण्य



जिस में करती है
वह एकाकी विचरण !

लड़की सोचती है
समाज का बनाया
अटूट बंधन टूटने पर
अपना सब कुछ त्याग
बनाया साथ छूटने पर
एकाकी क्यों हो जाती है
एक लड़की
जिसे ताउम्र
रोना होता है
पहाड़ जैसा जीवन
अकेले ही
ढोना होता है ।

(यह कविता तो नहीं है मगर सत्य पर मचली निज संवेदना जरूर है)

लड़की नहाना चाहती है

आज फिर
वैसी ही बारिश है
जैसी थी 
बचपन के दिनों में
आज फिर
नहाना चाहती है
वह झूम कर
जैसे नहाई थी कभी
अपने आंगन में !

लड़की तब भी
अकेली थी
आज भी अकेली है
तब नहा ली थी
बिना सोचे
आज ठिठक कर
सोचना पड़ रहा है
रोक रहे हैं
धवल वस्त्र
टूट चुका
अटूट बंधन
पराया सा
अपना आंगन !

वही लड़की
नहाने लगी है
आंगन को छोड़
बंद कमरे में
आंखे से बरसती

स्मृतियों की बारिश में !

*स्त्री के कुछ सवाल*


1.
क्यों नहीं होती
इस बात पर
चर्चा सर्वत्र
हर युग में
स्त्री को ही
क्यों देना पड़ता है
चरित्र प्रमाण-पत्र !
2. 
पति की मृत्यु पर
स्त्री से ही
क्यों छीने जाते हैं
पति के प्रतीक
गले से मंगलसूत्र
हाथ से कंगन
माथे से बिन्दिया
मांग से सिन्दूर
पत्नी की मृत्यु पर
क्यों नहीं छीना जाता
पति से कुछ भी ?

3. 
पति की मृत्यु के बाद
स्त्री क्यों नहीं रहती
प्यार की अधिकारिणीं
क्यों मान लिया जाता है
उसका सब कुछ
उजडा हुआ
जबकि उसका जीवन शेष
पडा रहता है अशेष !
4. 
नाकाम पुरुष
नाकाम पुरुष को
क्यों कह देते हैं
पहन लो चूडियां 
इस तरह



बेशर्मी के साथ
अपनी कमजोरी को
क्यों कर दी जाती है
स्त्री के नाम ?

5.
सात फेरों के बदले
क्यों समर्पित हो
पुरुष के समक्ष
गेह से देह तक
स्त्री का सब कुछ ?

रविवार, जुलाई 21, 2013

राजस्थानी नारा


राजस्थानी नारा


राजस्थानी नारा


राजस्थानी नारा


राजस्थानी नारा


शुक्रवार, जून 21, 2013

आ बैठा सूरज


नहा धो कर
आ बैठा सूरज
मेरे घर 
छत की मुंडेर
करने बात
धरा से
हो गई प्रभात !

आओ
छोड़ें बिस्तर
हम भी बैठें
बीच चौपाल
करें बात की शुरुआत !

करेंगे बात
बात बनेगी
बिन बात
बढ़ेगी बात
बढ़ गई बात तो
नहीं बचेगी कहीं बात !

बढ़ गई धूप
छोड़ें सपने
ढूंढ़ें अपने
गढ़ें संसार
नया नवेला
आओ करेँ
अपनत्व का सूत्रपात !

तोड़ें कारा भ्रम की
करें साधना श्रम की
हक मांगें
हक से अपना
हक से लें हक
हक से दें हक
जग में बांटें
हक-हकीकत की सौगात !

झूठ को मारें
सच को तारें
कांडवती न हों
अपनी सरकारें
जन गण मन की
पूर्ण हो आस अधूरी
छूटें सब मजबूरी
अन्याय अंधेरा छूटे तो
नया सवेरा फूटे जो
थामें हम ये प्रभात !

उतर मुंडेरी
घूमों सूरज
जग का मेटो
सारा तम
मैं को तोड़ो
रच दो हम
अंतस सब के
डोलो तुम
अबोलों में जा
बोलो तुम
अमीर गरीब का
भेद मिटा कर
सब के सिर पर
मानवता का
फिर से रख दें ताज !

*पुरुष का जन्म*



कांसे के थाल 
घनघनाए
चारदीवारी मेँ
ऊंची अटारी पर
पुरुष के जन्म पर ।

स्त्री के हाथोँ का
कोमल स्पर्श
शायद गिरवी था
पुरुष के यहां
तभी तो
थाली पर पड़ती थाप मेँ
पौरुष था मुखर !

उस दिन
दिन भर
बंटी भरपूर
मिठाइयां-बधाइयां
मिलीं मगर पुरुष को !

बाप दादाओँ ने
मरोड़ी मूंछे
चौक चोराहे
नए सम्बोधनोँ पर
भीतर
स्त्री लुटाती रही
ममता
नवजात पुरुष पर !

किन्नर भी
नाचे पुरुष के घर
स्त्री का घर
नहीँ उच्चारा किसी ने ।

क्या होता नहीँ
स्त्री का घर
स्त्री का वंश !

*अपने घर भी हो दिवाली*


फूटे पटाखा
छूटे फुलझड़ी
आतिश जाए आकाश मेँ
हम को क्या पड़ी
दो जून पकें रोटियां
नत्थू-बिजिया सोएं ना भूखे
हंस लें दे कर ताली
अपने घर भी हो दिवाली !

बैंक-साहूकारों का उतरे कर्ज
रोशन जगमग घर मेँ
पसरे ना कोई मर्ज
कांडवती ना हों सरकारें
समझेँ अपना फर्ज
अपने नेता जी की
नीयत ना हो काली
अपने घर भी हो दिवाली !

भीतर देश के
ना हों आतंकी
सीमा पर हो भाईचारा
घर का फौजी भैया
घर मनाए ये दिवाली
अम्मा संग बैठ कर वो भी
पीए चाय गुड़वाली
अपने घर भी हो दिवाली !

घर से निकला
घर को आए
तवे उतरी रोटी खाए
भंवरी-कंवरी हो सुरक्षित
सड़क किसी को न खाए
नोट चले सब असली
एक न निकले नकली
अपने घर भी हो दिवाली !

हक किसी का
छीने ना कोई
राजा पूछे
क्यों जनता रोई
बाजारों मेँ हो
सच्चा सौदा सेवा का
असली पर ना हो
नकली का धंधा भारी
कोई ना करे धंधा जाली
अपने घर भी हो दिवाली !

*प्यासे सवाल*


आकाश अंतरिक्ष में
तना रहा
आगोश में लिए
अंगारो का पितामह
स्वछन्द हठी सूरज !

कभी उतर कर
नहीं आया
तपती धरा के पासंग
हमेशा पैदा किया भ्रम
बड़बोले जगत में ;
वो दूर छू रहा है
आकाश धरा को
चपल जगत ने
खींच भी ली
मनमानी क्षितिज रेखा
सुदूर अंतरिक्ष में
अपने ही सामर्थ्य से !

धरा मौन थी
मौन ही रही
उसकी जाई रेत
गई उड़ कर
अंतरिक्ष मेँ निष्कपट
हो भ्रमित लौट आई
सूरज के तपते मोहपाश से
आबद्ध हो कर
अब पड़ी है
साध कर अखूट मौन
जिस में कैद हैं
अथाह प्यासे सवाल
!

*पंछी को सुन लो*


हिलती शाख
बैठा पंछी
धारे मौन
पंख पसारे
आंखें मूंद !

आंखों में 
नापता गगन
विशालता नभ की
भीतर ही भीतर
करता अवलोकन
तोलता अपने पंख पसार !

आंखों में सपना
नीड़ हो अपना
नाप गगन को
उतरूं शाख
चल पहुंचू निज नीड़
जहां न हो आदम भीड़ ।

यक-ब-यक
उड़ चला
मन उसका
पाने नया आकाश
जिस में न हो
आदम आकांक्षाओं का
यांत्रिक धुंआं
न हो गंध बारुदी
हल्ला गुल्ला
शोर शराबा मनचला ।

हुआ अचानक
एक धमाका
नीरवता तोड़ गया
सुन धमाका
टूटी तंद्रा
खुल गई आंख
सपना टूट गया
पूछो तो जा कर
पंछी कितना टूट गया !

*कुछ हिन्दी दोहे *

झपकी लेत गरीब तो, माया छीने चैन । 
भूखा सोता ठाट से , धाया जागे रैन ।1।
नेता सोता चैन से, ले वोटों की ओट ।
जनता खोले आंख तो , दे वोटों की चोट ।2।
नेता जीता वोट से,खूब छापता नोट ।
नेता खोले आंख तब ,जब जब घटते वोट ।3।
जनता पागल बावळी , भूली अपना जोर ।
खादी चोला पहन कर,नेता बन गए चोर ।4।
भारत जाये भाड़ में , नेता भोगे राज ।
नेता सोता चैन से,जनता ऊपर गाज ।5

**मैं घायल ही ठीक हूं**


कोई आए 
हमारा हाल चाल पूछे
स्वस्थ रहने के लिए
दें शुभकामनाएं
इसके लिए
कितना जरूरी है
हमारा बीमार हो जाना
आज जाना !

आज
ज्यों ज्यों फैली खबर
मेरे घायल होने की
चले आए रिश्तेदार
दूर नजदीक के संबंधी भी
यार अणमुल्ले
नए पुराने
इसी बहाने
हुआ मिलना वर्षोँ बाद !

अब जाना
कितना अच्छा है
भीतर की बजाय
चोट का बाहर लगना
भीतर का दर्द दिखता नहीं
बंटता भी नहीं
होती नहीं दवा दारू
मरहम पट्टी
भीतर के घावों पर
झेलना पड़ता है ताउम्र
भीतर के जख्मों का दर्द !

इस लिए
बहुत रुचता है मुझे
बाहर का दर्द
जिसकी बदोलत
आ जाते हैं कुछ फल-फ्रूट
मुस्कुराते-गंधाते गुलदस्ते
जिन में दिखती है तस्वीरें
आने जानें वालों की
कुछ गुलदस्ते
आइना होते हैं
तभी तो कुछ के भीतर
कुछ का कुछ-कुछ
दिख ही जाता है दर्द
मेरे सुधरते स्वास्थ्य का !