शुक्रवार, अप्रैल 25, 2014

गांव के दो चित्र

गांव में 

=========

तीन साल पहले
समाचार-पत्र में
समाचार था ;
गांव में पानी की तंगी
दूर होगी
बनेगी पानी की टंकी ।

अभी दस दिन पहले
समाचार-पत्र में
फ़िर समाचार था ;
पानी की टंकी में रिसाव है
इसे गिराने में ही बचाव है ।

आज फ़िर समाचार है
पानी की टंकी गिरा दी गई
यूं जनता बचा ली गई ।

यह अलग बात है कि
गांव में
किसी ने
समाचार-पत्र आने के सिवाय
कोई घटना
कभी भी नहीं देखी
प्रेस-नोट सरकारी थे
इस लिए विश्वसनीय थे ।

** अकाल में गांव **
==============

गांव में
चार साल से अकाल था
फ़ेमिन था
फ़ेमिन में
काम के बदले
अनाज मिलता था
जिस्म के बदले
और जिस्म में
जान नहीं थी
बिरखा के लिए
अलूणे रविवार
निर्जला सोमवार के
व्रतों के कारण ।

गांव की दीवारों पर
नारा था-
पानी बचाओ !
बिजली बचाओ !!
सबको पढा़ओ !!!
यह अलग बात है कि
गांव में
न पानी था
न बिजली थी
न स्कूल था !

गांव में
न धंधा था
न खेती थी
न उद्योग था ।
प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत
शहर से सड़क ज़रूर आ गई थी
जो ले गई
शहर में
आदमी कम
सौदागर बहुत थे
यूं तो शहर में
"काम" बहुत था
और आदमी का
आदमी बने रहना
बहुत मुश्किल था
लौटना पडा़
उसी गांव में
जो अंधी सुरंग से
कभी कम न था !

*** मन करता है ***

हम चाहे
कुछ करेँ या न करेँ
मन हमारा
कुछ न कुछ
ज़रूर करता रहता है !
हमनेँ वोट किया
बदले व्यवस्था
नहीँ बदली !
मन ने
बो दिए बीज
न हो सकने वाली
अदृश्य क्रांति के !
मन करता रहा
भूखे को भोजन
नंगे को कपड़ा
घरहीन को घर
मिल ही जाए
संसद ने नहीँ सुना
भोजन अवकाश के बाद
वह स्थगित हो गई
अनिश्चितकाल के लिए ।
मन बोला
पेट क्योँ है
हर किसी के
जब भोजन नहीँ है
सब के लिए ।
लोग नंगे क्योँ है
जबकि सरकारेँ
कपड़े के लिए नहीँ
बुनती है ताने-बाने
अपने बने रहने के लिए ।
मन ने पूछा
देश मेँब
हुत से हैँ
चिड़िया घर
अज़ायब घर
डाक घर
मुर्दा घर
फिर क्योँ हैँ
बहुत से लोग बेघर
इतने बरसोँ से !
नहीं मिलता
कहीँ से भी
किसी भी सवाल का
कोई ज़वाब
फिर क्योँ है
मेरे पास
उत्तरविहीन
इतने सवाल?
मन पूछता रहता है
सब के हाथ
लड़ने के लिए नहीँ
मिलाने के लिए भी है
फिर क्यों
कुछ हाथ निकलते है
रोटी और लड़ाई के लिए ।
मन भरमाता है
हाथोँ की अंगुलियां
जब हैँ
मुठ्ठियां बंनने
और तनने के लिए
तो फिर क्योँ
पसर जाते हैँ हाथ
उठ जाती है अंगुलियां
एक दूसरे की ओर !
मन करता है
मन न करे कुछ
तन करे
ताकि चल सके
तन कर आदम जाये !

* मुझे लड़ना है *

अंधेरो से
लड़ना चाहता हूं
मगर दिखता नहीँ
कोई साफ साफ अक्स
इस कलमस मेँ
सब के सब
धुआंए है
स्याह धुएं मेँ ।

चौतरफ़ा यह धुआं
आया कहां से
नहीँ बताया
धुआंए चेहरोँ ने
और धुआंने को आतुर
दूसरे लोगोँ ने !

कुछ लोग
कुछ लोगोँ का
जला रहे हैँ दिल
सुलगा रहे हैँ ज़मीर
कुछ लोग
बस केवल
हवा दे रहे हैँ
या फिर झोँक रहे हैँ
अपना ईमान !

कुछ लोग
मुठ्ठियां भीँच रहे हैँ
दूर खड़े
दूर ही खड़े
कुछ और लोग
दांत पीस रहे हैँ
मुठ्ठियां भीँचने वालोँ पर !

कुछ लोगोँ ने
खोल दी हैँ मुठ्ठियां
और सुस्त चाल चलते
कर रहे हैँ
उनका या समय का
मौन अनुकरण !

मुझे तो अभी
लड़ना है
पहले खुद से
अंधेरोँ से
और फिर उनसे
जिनका आभामंडल है
यह स्याह अंधेरा !

** नत्थू के पांच सवाल**

[1]


न इश्क है
न बीमारी
न चिँता है
न खुमारी
फिर क्योँ उड़ गई
रातोँ की नीँद हमारी ?
सवाल तो
और भी हैँ
फिलहाल
इसी का चाहिए
हमेँ जवाब ;

पेट भरने के बाद भी
क्योँ चाहिए तुम्हेँ
दुनियां की दौलत सारी ?

[2]

हाड़ तोड़ मेहनत कर
घुटनोँ तलक पसीना बहा
पेट नहीँ भरता
मेरे नत्थू का
जब से उगी है मूंछ
मुठ्ठियां तानता है
अब खाता नहीँ
शपथ संविधान की !
क्योँ कहता है वह
एक संविधान से पहले
दो जून धान जरूरी है ?

[3]

क्या जवाब दूं
मेरे नत्थू को
जो बार बार पूछता है-
धाए अघाए लोग
संसद मेँ
और
जन्म के भूखे
दड़बोँ मेँ
क्योँ रहते हैँ ?

[4]

जब जब भी
चूल्हे से ज्यादा
दिल जलता है
मुझ से पूछता है
मेरा नत्थू ;
जवाब दो
क्योँ पटक दी गई
हमारे ऊपर
जन्म से पहले
गरीबी की रेखा
क्योँ नहीँ उकेरी गई
अमीरी की रेखा ?

[5]

भूखे लोग
जब जब भी
संगठित हो
करते हैँ अनशन
उन पर
क्योँ बरसाई जाती हैँ
खुले हाथ लाठियां
क्योँ नहीँ बरसाई जाती
दो जून रोटियां ?
मेरे पास
कोई जवाब नहीँ
नत्थू के इन सवालोँ का
तुम ढूंढ़ लो
वह दड़बे से
निकल गया है !

*सम्भल सको तो*

आंख उठा कर
कंधोँ से ऊपर
देखा तुम ने
अन्न से महकी 
सांसोँ की गंध पा कर
जीवन भर गर्वाए तुम
आंख झुका कर
देखो अब तो
पगथल के नीचे
कितने भूखे प्यासे
लाचार दबे हुए !
सम्भल सको तो
सम्भलो तुम
पैरोँ के नीचे से
धरा खिसकने वाली है
झुक कर देखो तो
वो दुनिया उठने वाली है !

*आती नहीँ सांस*

थोड़ी सी 
खुली हवा मिलते ही
हम ने बो दी
फसल अधिकारोँ की
फिर किया इंतजार ! 
कुछ ही दिन बाद
कानून लहलहाए
आसमान छूने लगे
फल फिर भी न आए
अब कानूनोँ के झुरमुट मे
आती नहीँ सांस !
अब तो धरा
करनी ही पड़ेगी
फिर से तैयार
नई फसल के लिए ।

**आशंकित मैँ**

मुझे याद है
मैँने कहा था
एक दिन तुम्हें 
उन्मुक्त हो कर ;
मैँ तुम मेँ 
समा जाऊं !
मौन रह 
तुम ने 
शर्मा कर
दे दी थी स्वीकृति
जिन्दगी खिसक आई
बहुत करीब !

फिर एक दिन
तुम ने भी कहा
उसी तरह
उन्मुक्त हो कर
मैँ तुम्हारे भीतर
समा जाऊं
चाहता है दिल !
यह सुन
धड़क क्यों गया था
मेरा दिल !

क्या मेरा मैँ
मेरे भीतर
नहीँ देना चाहता था
एक स्त्री को जगह
याकि मेरा पौरुष ही
भयभीत था स्त्री से !

बहुत दूर से
मेरे घर आई तुम
निपट अकेली
फिर भी
कितनी बेखौफ़ थी
मैँ असंख्य अपनोँ के बीच
अपने ही घर
कितना आशंकित था ?
कमजोर तुम नहीँ
मैँ ही था !

*मौन अंधेरा*

उजाला चला 
अंधेरा चीर
निकला आगे
आगे से आगे
दंभ पालता
भरता डग गम्भीर !

पीछे दौड़ 
अंधेरा आया
मंद गति
घनघोर छाया
बिम्ब समेटे
प्रतिबिम्ब लपेटे
भीतर अपने
निगल गया
उजाले की तकदीर ।

एक अकेली
धारे आंख
दसों दिशा मेँ
सूरज दौड़े
उसकी पीठ
बैठ अंधेरा
पल पल
उसका
दंभ तोड़े !

जगमग दीपक
करता टिम टिम
उसके नीचे
अमा का नाती
बैठा मौन अंधेरा
दीपक भोला
बात्ती तानेँ
कब जानेँ
रात अमा की लम्बी है
चांद छौड़ कर
भागा जिसको
रात वह अवलम्बी है ।

*मां के साथ*

रात रात भर
सोते हुए जागना
जागते हुए सोना
कोई बीमारी नहीं
लाचारी भी है
इश्क-रिस्क
भूख-भय 
इल्म और जुल्म
सबब भी हैँ
मगर
सोने की नसीहत
बांटने वाले लोग
मां तो नहीं होते
जो सुला दें
हमारे दुखों का
स्वयं वरण कर !

निःर्थक तो नहीं होतीं
मां की लोरियां
मीठी थपकियां
या फिर
थके हारे माथे पर
झुर्रियों सने हाथ का
ममता भरा
मनोचिकत्सकीय स्पर्श
जो कर देता है
हमारी वेदनाओँ को
अतंतस्थ तक परास्त !

मां के साथ
देर तक जागना


जोड़ देता है
तीनोँ काल से
विरासत
संस्कृति
इतिहास और परम्परा से
मां ही सुलाती है
सुखों की शैया पर
वही नहालाती है
शांति के सागर मेँ !

मां !
तुम मानसरोवर हो
जहां मिलते हैं मुझे मोती
तुम आश्रम भी हो
जहां मैं बांचता हूं
भव की पोथी !

सच मेँ मां
तुम्हारा स्मरण भर
मुझे कर देता है
भव बाधाओं के पाश से
मुक्त उन्मुक्त !

*ज़िन्दगी*


अब अगर कोई
हसना चाहे तो हस ले
रोना चाहे तो रो ले
हम ने ज़िन्दगी के आगे
हार मान ली
छोड़ ही दिया आखिर
घुट घुट कर मरना !

आ ज़िन्दगी !
आ मेरे आंगन
हस-खेल
ठहाके लगा
उच्छल कर आ
ले ले मुझे
अपने आगोश में
उठा कर
पल पल आती
मौत की गोद से !

साकार जगत में
तुम निराकार हो ज़िन्दगी
मैंने
छुप छुप कर
उकेरा है तुझे
कई कई बार
तुम दिप दिप आई
धानी शीतल रंग धारे
अक्षपटल पर मेरे
मैंने छूना-पाना चाहा
तुम फिसलती गई
दूर, बहुत दूर !

सफेद होते बालों
गालों की झुर्रियों में
टसकते घुटनों-टखनों में
बैठती आवाज
कर्ज ढांपती क्रियाओं में
तुम आई होती ज़िन्दगी
मैं भी दो कदम चलता
न तुम हारती
न मैं हारता !

*प्रीत को धारती जमीन*

प्रीत का बीज
मस्तिष्क मेँ नहीँ
मन मेँ अंकुराया
दिल मेँ पला
और
जीवन मेँ फल !

मन वश में नहीँ था
नहीँ रोक पाया
प्रीत का अंकुरण
दिल का साथ पा
पनप गया प्रीत का बिरवा
लहलहाने लगा
हुआ अथाह घनीभूत
रास न आया जगत को
नहीं हुआ फलीभूत !

हर सू
जीत हो प्रीत की
इसी के निमित तो
नहीँ थी प्रीत
प्रीत चाहती रही
अर्थाना स्वयं को
हम अर्थाते रहे
केवल स्व को
स्व में कोई और कहां
बहुत एकाकी थे हम !

मरी तो नहीँ प्रीत
मुरझाय भी नहीँ
बिरवा प्रीत का
कभी भी
कहीं भी
बस पतझड़ से गुजरा
हताशा मेँ हम नेँ ही
छीन ली
गमला भर ज़मीन
प्रीत की जड़ों से !

हम दौड़ाते रहे
मस्तिष्क के घोड़े चहुंदिश
तलाशने प्रीत के बिरवे
नहीँ मिले
मिली घृणा की खरपतवार
अब जाना
प्रीत शिखर पर नहीं
जड़ों मेँ थी
मगर
शेष नहीं थी
स्मृतियों रची प्रीत
प्रीत को धारती जमीन !

[*] प्रीत :कुछ चित्र [*]

1.
झुकी
पलकें तुम्हारी
मुंद गई आंखें
उठी प्रीत
फैल गई !

2.
भाग कर
भीतर गई
लजा कर तुम
बाहर आई प्रीत
बेखोफ हो कर !

3.
मेरा नाम
रेत पर
उकेरा तुम ने
हवा आई
छू कर उसे
मुझ तक
प्रीत का
उठा गुब्बार !

4.
हवा ने
कहा कुछ
सपर्श में
प्रीत के पान
हुए पल्लवित
ठूंठ खिल उठा
हो गया हरा
जंगल महक गया !

5.
न सड़क चली
न तुम
दौड़ा मन वाहन
आया पड़ाव
'प्रीत'

*आज क्या लिखूं *

आज क्या लिखूं
बार बार सोचा
सोचना मुझे ही था
इस लिए वही सोचा
जो मुझे सोचना था । 

जो सोचा
वह लिख नहीं पाया
और जो लिखा
वह सोच नहीं पाया
इस लिए फिर सोचा
क्यों सोचा ?

कुछ लोग
बिना सोचे
लिख रहे थे
लोग सोचते नहीं ।

मैंने सोचा तुम्हारा नाम
तुम ने कहा
क्योँ सोचा
उधर उन्होनें कहा
क्यों नहीं सोचा
हमारा नाम !

एक दिन
नत्थू भी उलझ गया
लिखते हो आप
लिख दो हमारा नाम
बी.पी.एल. में
या फिर लिख दो
कोरे भाग्य में
केवल तीन शब्द ;
रोटी-कपड़ा-मकान !

छोड़ दिया हम ने
उस दिन के बाद
सोच कर लिखना
लिख कर सोचना
तब से
मजे में हैं ।

*दर्द और आंसू*

न जाने कब से
क़ैद था सीने में
तुम्हें देख कर
वो दर्द मचल गया 
बर्फ की गांठ सा जमा था
दिल में न जाने कब से
यादों की तपिश में
वो हिमखंड पिघल गया ।

कब रुका वो नादान
मेरी आंख में देर तलक
स्मृतियों मेँ झांक मचल गया
रूठ कर बच्चे की तरह
आंख के घर से निकल गया 

<>आता कब है प्यार<>

प्यार होता नहीं 
आजकल किसी को
किसी से कभी भी
किया जाता है
या फिर आ जाता है प्यार 
किसी को
किसी किसी पर !

स्वतंत्रता दिवस के बाद
गणतंत्र दिवस को ही
आता है प्यार देश पर
सीमाओं पर हो तनाव
भीतर हो आतंक
तब भी थोड़ा थोड़ा
दिखने लगता है
दिखावा भर
देश के लिए प्यार !

नेता वोट ले
देश को छोड़
अपने काम आए
आड़े वक्त
कानून रख ताक पर
खुद जीए
हमें भी जीने दे
यानी
खुद भी खाए
हमे भी खाने दे
तब आता है
नेता पर प्यार !

पिता हों काम पर
हम हों
बेरोजगारी के साथ
बीवी-बच्चों वाले


मां बने गुप्त सहारा
तब आता है
मां पर प्यार !

दिन भर बतियाएं
दफ्तर और दोस्तों में
मादा दोस्त से
देरी से आएं घर
हमें न हो डर
खाएं-पीएं सो जाएं
सवाल न दागे
दूध का गिलास
सरहाने धर सो जाए तो
आता है बीवी पर प्यार !

यह सब तो
आना ही है प्यार का
हम ने किया कब ?
होता भी कब है प्यार
सिवाय खुद के
किसी को किसी से !

हां !
कर ही लेते हैं
प्यार हम
पराई चीज से
कुर्सी से
धन-दौलत
पद-प्रतिष्ठा
झूठे स्वाभिमान से
यहां तक कि
कपड़े-जूतों तक से
कर बैठते हैं प्यार !

न करते हैं
न आता है
न होता है
तिल भर प्यार
अपने ही ज़मीर से
यह बिके तो
कब चूकते हैं
गरीब से गरीब
अमीर से अमीर !

[<>] कयास बहुत हैं [<>]

कल क्या होगा
अच्छा-बुरा
यह-वह 
कयास तो बहुत हैं
मेरे-तुम्हारे पास 
उन में मगर
किन्तु-परन्तु बहुत हैं !

सायास न भी हो
अनायास तो कुछ न कुछ
हो ही सकता है
मसलन
सच्चाई को मिल जाए
उसकी उज्ज्वल कीमत
किन्तु देगा कौन ?

कल शायद
नेता के वादे
हो जाएं पूरे
पूरे हो जाएं
सपने अधूरे
पूरा का पूरा बजट
लग जाए योजना पर
परन्तु लगाएगा कौन ?

कल हो सकता है
वक्त पर आ जाए
रेल मेरे कस्बे में
देशद्रोहियों को
सरे राह लग जाए फांसी
डाले गए वोट की कीमत
पहचान ली जाए
मगर पहचानेगा कौन !

कल तो 


यह भी हो सकता है
पेड़ों पर लगने लगें रोटियां
मिलने लगें डिब्बा बंद घर
शरीर पर चमड़ी की जगह
बनने लगे कपड़ा
यदि ऐसा हुआ तो
देश का बजट कैसे बनेगा ?
यदि देश का बजट
न बना तो
नेता चलेगा कैसे ?

कल कुछ न कुछ
होगा ज़रूर
और नहीं तो
तारीख तो बदल ही जाएगी
तारीख बदली तो
साल महीने भी बदलेंगे
फिर तो
आ ही जाएगा नया कैलेण्डर
जो लटकेगा दीवार पर
नत्थू की पगार की तरह ।

*परेशान कुदरत*

सदियों से 
मेहरबान रही
हम पर कुदरत
अपने हजार हाथों से
लुटाती रही हम पर 
अपना अकूत वैभव 
हम नहीं रख सकै धैर्य
झपट पड़े उस पर
सब कुछ लूट
अपना घर भरने
धरा से आकाश तक
पेड़-पहाड़
नदी-झरने
सब हथिया लिए
परेशान कुदरत
बिफर पड़ी
उसके आंसूओं में
बह गया सब कुछ !

सच ही कहा है किसी ने
लाचार के आंसूओं में
बहुत ताकत होती है
टिक सके कोई
उस के सामने
इतनी किस में
माकत होती है !

*तानों की तपिश में आकाश*

ताउम्र तपता रहा
जिन तानों की तपिश में
नहीं थे वे बादल
तनिक भी उसके वश में
बादलों का घर
आकाश जो नहीं है
तकता रहता है जिसे
उसकी तो अपनी
हमराह वो जमीं है
आवारा हैं बादल
आते-जाते उदंड
मानते कहां हैं
आकाश के हिस्से
न बारिश है न नमीं है
पूछो तो सही कभी
क्या ये कम कमीं है !

आओ बादल

आ गया है सूरज
कांधों पर टांग 
अपना तरकश
चलाएगा दिन भर 
ताप में ताए तीर
बेसुध पडी 
तुम्हारी वियोगिन
अचल मरुधरा पर
आओ बादल
अब तुम भी आओ
बन कर ढाल
मरुधरा पर छा जाओ !

*सपना*

सामने था
दृश्यमान जगत
आंखों ने देखा
मन मचला
बुद्धि भरमाई
सोच की कोख में
सपना पल गया !