गुरुवार, अप्रैल 29, 2010

मेरा मन (कविता) कागद

कवि ओम पुरोहित कागद का श्री राजेन्द्र यादव ने एक नया ही रूप रंग हमारे सामने रखा है । श्री यादव जाने माने कलाकार और रंग-रेखाओं के पारखी मित्र हैं । यहां तन की छवि के साथ एक कविता मेरा मन प्रस्तुत है ।





फफोले उफने

मेरे तन

भीतर भरा मवाद

ऐसी गर्मी तन बसी

जन रहा न मेरे पास ।




उमस

घूमस कर रही

देती तपन असहाय

तन मेरा जल मरा

मन रहा तेरे पास ।




खंख बना मन

डोल रहा आकाश

बांधे

पिया मिलन की आस

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह…
    कागा सब तन खाइयो , मोरा चुन चुन खाइयो मांस ।
    दो नैना मत खाइयो , मोहे पिया मिलन की आस ॥
    की याद हो आई ।
    श्री राजेन्द्र यादव को कवि ओम पुरोहित “कागद” का नया रूप रंग प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. फफोले उफने

    मेरे तन

    भीतर भरा मवाद

    ऐसी गर्मी तन बसी

    जन रहा न मेरे पास ।

    क्या परिभाषा है ... वाह !

    उत्तर देंहटाएं
  3. उमस

    घूमस कर रही

    देती तपन असहाय

    तन मेरा जल मरा

    मन रहा तेरे पास ।

    वाह...वाह....बहुत खूब ....!!

    उत्तर देंहटाएं