मंगलवार, मई 25, 2010

ओम पुरोहित कागद की तीन हिन्दी कविताएँ

ओम पुरोहित कागद की तीन हिन्दी कविताएं

धूप क्यों छेड़ती है (१९८६)कविता संग्रह से

धूप क्यों छेड़ती है

उन
कई-कई
मंजिलों ऊँची
कोठियों में सोए
अमीरों को छोड़
धरातल पर
गढ्ढों में सोए मुझ को
धूप क्यों छेड़ती है ?
गहरी नींद सोने से पहले
क्यों जगा देती है ?

भूख !
उन अमीरों के
भर पेट खा कर
मखमल पर सोए
साहबजादों के पेट को छोड़ कर
मेरे नत्थू के पेट में आ कर
क्यों सो जाती है ?
क्यों कुदाल, फावड़ा और गेंती
मेरे अवयस्क नत्थू के हाथों में
आ थम जाते हैं ?
उनकी गोरी चमड़ी के
आवरण वाली हथेलियां
पोरों में सिगरेट व जाम
क्यों थाम लेती है ?

क्यों उनकी मोटी तिजोरियों में
घर बैठे ही
धन संग्रहित हो जाता है ?
मेरी फटी सी धोती की
छोटी सी अंटी
खाली क्यों रह जाती ?
क्या धूप
छप्पर फाड़ कर ‘लेना’
और
फाटक बन्द कर ‘देना’ चाहती है ?


मेरा आंगन

सड़क
दहलीज पर आ कर चली गई,
दहलीज में अटका रह गया
मेरा आंगन।
सड़क शहर घूम आई।

दिन की चका-चौध में
परछाइयों को ले
आगे पीछे होता रहा
मेरा घर।
परछाइयों को अंधेरे;
अंधेरों को आंगन पी गया।

सड़क
दहलीज पर आ कर चली गई,
दहलीज में अटका रह गया
मेरा आंगन।
सड़क शहर घूम आई।

बे-रोजगार से
बा-रोजगार हो गए हैं लोग
लेकिन
आलपिनों में अटका रह गया
मेरा आंगन।
सड़क शहर घूम आई।

झोंपड़ियों से उठ
निरीक्षण
सर्वेक्षण
बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का दौरा कर
सफेद कुर्तों की झोली में
मिट्टी को कुन्दन बना लाए है लोग
लेकिन
दो जून रोटी में अटका रह गया
मेरा आंगन।
सड़क दहलीज पर आ कर चली गई
दहलीज में अटका रह गया
मेरा आंगन।
सड़क शहर घुम आई।

धर्मनिर्पेक्ष लोकतंत्र

स्वघोषित उदेश्यों को
प्रतीक मान
मन चाहे कपड़ों से निर्मित ध्वज
दूर आसमान की ऊँचाइयों में-
फहराने भर से
लोकतंत्र की जड़ें
भला कैसे हरी रहेंगी ?

तुम शायद नहीं जानते
भरे बादल को
पेट का प्रतीक मान लेने से
यह पंचभूता नहीं मानता
पानी के समय पानी
रोटी के समय रोटी
सक्षात मांगता है।

शांति का प्रतीक
टुकड़ा भर सफेद कपड़ा
बरसों बाद भी
मुठ्ठी भर देश को
चैन-ओ-अमन
कहां दे पाया है ?

हरित क्रांति का प्रतीक
तुम्हारा हरा रंग
आयात से चलकर
निर्यात तक
कहां पहुंच पाया है ?

......और अड़तीस साल बाद भी
तुम्हारी राष्ट्रीयता को
निष्ठा
और
बहादुरी के रंग में
कहां रंग पाया ?

हां, यह जरुर है
तुम्हारा केसरिया
रंग लाया है
तभी तो
हर देशवासी
बे-ईमानी भ्रष्टाचार
भूखमरी
गरीबी
बे-रोजगारी
और
देशद्रोह के रंग में
आकंठ रंग गया है
और इनके समक्ष
बलिदान के लिए
हिम्मत के साथ
डटा हुआ है।

चौबीस तीलियों वाला-
धर्म-चक्र आज भी
साम्प्रदायिकता की गाड़ी
उत्तर से दक्षिण
पूर्व से पश्चिम तक
कितनी बे-शर्मी से ढो रहा है,
और तुम्हारा लोकतंत्र
तिरंगा ओढ़
धर्म निर्पेक्षता की
झूठी
गहरी
नींद सो रहा है।

17 टिप्‍पणियां:

  1. सड़क
    दहलीज पर आ कर चली गई,
    दहलीज में अटका रह गया
    मेरा आंगन।
    सड़क शहर घूम आई।'
    वाह कागद जी, बहुत सुंदर कविताएँ हैं.
    angry young man नज़र आते हैं आप , जब व्यवस्था के खिलाफ लिखते हैं.
    मारा ब्लॉग भी आपकी दहलीज़ तक जा चुका है.लेकिन दरवाज़े बंद ही नज़र आते हैं.
    कभी तो खोलिए हुज़ूर .

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  2. हर तरह की विरोधाभास व्यवस्था पर प्रश्न उठाती रचनाएँ....बहुत अच्छी लगीं

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  3. बहुत बहुत शुक्रिया आपकी टिपण्णी के लिए! बहुत ही सुन्दरता से आपने छोटी सी रचना प्रस्तुत किया है! हौसला अफजाही के लिए शुक्रिया! इस साल तो भारत के सभी जगह पर अत्यधिक गर्मी पड़ी है! मेरे यहाँ तो अभी सर्दी का मौसम है!
    सभी रचनाएँ बहुत अच्छी लगी! आपके सभी पोस्ट मुझे बेहद पसंद है और शानदार रूप से आपने लिखा है! इस उम्दा पोस्ट के लिए बधाई!

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  4. बे-रोजगार से
    बा-रोजगार हो गए हैं लोग
    लेकिन
    आलपिनों में अटका रह गया
    मेरा आंगन।
    आदर जोग सादर प्रणाम
    तीनू कवितावा भान्त भान्त रे रंग माय रचीयेदी है .पेले कविता साम्यवाद , कम्नुनिस्ट रूप द्दिखाती भूख औरधुप ने प्रतीक बणार फोत्रपे सू दिखायो है . अंतिम कविता स्यात पुराणी होवेला पण सवाल भी आज 62 साला रे पाछे भी ३८ साल आला है , पण तीनू कवितावा एक सवाल मगज माय छोडे है , आप ऋ हर कविता चोखोड़े घी रो काम करे ला लिखार सारु ओ म्हने लागे है .
    सादर

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  5. बढिया प्रस्तुति ,अच्छी रचनाएँ ।
    आप का मेरे ब्लांक पर आने व टिप्पणी करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।

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  6. बहुत सुंदर भाव लिये है आप की रचना धन्यवाद

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  7. आपकी तीनों रचनाएं बहुत सुंदर भाव लिये है ओम जी।

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  8. कईयों का दर्द निकाला आपने... ये रचनाएं ऐसे ही लाख जगाती रहें ये दुआ है.. पर एक निवेदन है इस बालक का कि एक बार में २ से ज्यादा रचनाएँ ना लगायें तो भाव पढ़ने में ज्यादा आनंद आएगा..

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  9. बढिया प्रस्तुति ,अच्छी रचनाएँ । इस उम्दा पोस्ट के लिए बधाई!

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  10. BHAI DIPAK JI, AAP KI BAT DURUST HAI. AAINDA AISA HI HOGA. BADI EK,MADHYAM DO,CHHOTI PANCH OR CHHOTI-CHHOTI KAI-EK KAVITAYEN LAGANE KI KOUSHIS KARUNGA.AAMEEN !

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  11. रचनाएँ पढ़कर निशब्द हो गया हूँ, सिर्फ एक शब्द याद आ रहा है बेहतरीन! दीपक जी ने ठीक कहा है

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  12. आदि कवि बाल्मीकि ने करुणा को गाया था। करुणा कविता
    का उत्स है। आपकी इन रचनाओं में घनीभूत करुणा के
    दर्शन होते हैं। आम आदमी के दर्द को बडी सहजता से
    उकेरा है-आपने। बधाई।
    सद्भावी- डॉ० डंडा लखनवी
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