रविवार, अप्रैल 13, 2014

भटनेर : राजस्थानी कविताओं की एक और कडी़

हनुमानगढ़ का भटनेर दुर्ग 52 बीघा भूभाग पर फ़ैला हुआ है । किले की दीवारों पर 52 बुर्ज़ बने हुए हैं । बहुत पहले इन 52 बुर्ज़ों में 52 कूएं बने हुए थे । कहते हैं कि इन कूओं का पानी मीठा था और किले के भीतर बसे नगर के लिए वर्षों तक पर्याप्त था । कई भयंकर युद्धो में ये कूएं दुश्मनों की लाशो से पट गए और कालान्तर में बन्द हो गए ।
भारत के इस गौरवशाली किले पर मेरी राजस्थानी कविताओं की एक और कडी़ प्रस्तुत है :-
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भटनेर-9
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मैंने देखा है
कभी भी नहीं लड़ते


कूएं -बावडी़
तालाब और नदी का पानी ।

मैंने सहेजे हैं
बावन बीघों में
बावन कूएं
जो पाते थे
सरस्वती से पानी

रहते थे सदैव एक रस ।

रहता है
रहता भी रहा है
आंतरिक प्रेम
आदान-प्रदान
एक दूसरे के
वज़ूद की रक्षा में ।

आदमी के भीतर
तिल भर पानी
उस आदमी के 

पानीदर होने के लिए
करता है युद्ध
उस युद्ध में
मिट जाते हैं कई सागर
यही पानी कर देता है
मुझ से खंडहर
कई-कई भटनेर !
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भटनेर-10
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बच्चे-स्त्रियां
ज़मीन-गढ़-गढि़यां
पेड़-पौधे
पशु-पक्षी
नदी-तालाब
कोई नहीं चाहते युद्ध
मैंने देखा है प्रत्यक्ष ।

युद्ध उतरता है
दंभ के विमान से
छल-बल की ज़मीन पर
जो लील जाता है
बच्चों की खुशियां
स्त्रियों के प्रणय गीत
धरती की धमक
पक्षियों का कलरव
और नदी की कल-कल ।

मेरे यहां भी
उतरे कई-कई युद्ध
दंभियॊ के ज़हन में
खनकी तलवारें
जो कर गई मुझे खंडहर
दे गई आज को कल
आज जो हूं मैं भटनेर ।

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