बुधवार, मई 30, 2012

दो कविताएं

 
मेरे सोच की गली
मेरे सोच की हर गली
जा कर तेरी बस्ती में
क्यों हो जाती है गुम ।

तेरी बस्ती से कभी
निकल कर कोई गली
आती क्यों नहीं इधर ।
*
उन के ऊंचे भाव
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आते उनको दाव बहुत हैं ।
दिल में इस के घाव बहुत हैं ।।
जब चाहें कर दें कत्ल मेरा ।
मरने का भी चाव बहुत है ।।
अपनी कीमत ख़ाक बराबर ।
उनके ऊंचे भाव बहुत हैं ।।
अपनी आदत खुल कर कहना ।
उनके यहां छुपाव बहुत है ।।
जब भी खाते हक़ ही खाते ।
हक़खोरी में हाव बहुत है ।
अपना मत जो उनको सौंपा ।
अब जनमत का ताव बहुत है ।

1 टिप्पणी:

  1. "मेरे सोच की गली" ह्रदय को द्रवित करती है! अत्यंत मार्मिक ! आह !

    "जब चाहें कर दें कत्ल मेरा ।
    मरने का भी चाव बहुत है ।।

    अपनी कीमत ख़ाक बराबर ।
    उनके ऊंचे भाव बहुत हैं ।।"

    हम तो खाक ही रहे! मिट गए पर खास न हुए! वाह गुरू जी ! जितनी तारीफ़ की जाए कम है!

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