रविवार, अप्रैल 13, 2014

*मिटता नहीं प्रेम*

देह का देह से
होता है प्रेम
विदैही होते हुए भी 
अप्रत्यक्ष तो होती ही है 
प्रेम की आकांक्षी देह !

देह में ही जन्मता है
पलता है देह में
फिर
रमता भी देह में ही है
चाहत और अभिलाषा
त्याग और समर्पण के
ऊबड़-खाबड़ राह चल
देह पर आ कर रुकता है
देह ही जो है
अंतिम पड़ाव प्रेम का !

आसान भी नहीं है
प्रेम का मार्ग
बहुत मोड़ हैं
इस मार्ग में
यह मुड़ सकता है
किसी भी मोड़
ईश्वर की ओर
माँ-बाप
भाई-बहिन


वस्तु-जीव
क्षेत्र-राष्ट्र
भाषा-व्यवहार
घर-परिवार
विपरीत लिंगी की ओर
मगर हर बार
होता है परिभाषित
अपने ही पड़ाव से
जहां होती है
निश्चित ही कोई देह !

जिस देह जन्मता है
उसी देह में
मिलता है दाह प्रेम को
देह मिट जाती है
मिटता नहीं प्रेम
विदैही हो कर
निकल पड़ता है
कोई और देह ढूंढ़ने !

उसकी आंखों में

उसकी आंखों में
जूते तैर रहे थे
और
कसी मुठ्ठियों में
महीने भर की पगार थी
वह नंगे पांव
गांव से आया था
उसकी आंखों में देख
सिंहासन चकराया था !

स्वेटर के धागों में

दीपावली है आज
सब सजे-धजे हैं
दमकते चेहरे
चमकती आंखें
एक हाथ पटाखे
दूजे हाथ मिठाई
झूमते से निकलते हैं
पहन कर नवल परिधान ।

मैंनें भी
पहन ली स्वेटर
ठंड जो है गुलाबी
न जाने कहां से
सिमट आया
स्वेटर के धागों में
सजीव होता अतीत
विस्मृत सा चेहरा
आ गया सामने
मांगता हुआ पठाखे
सूतली वाले ।

लक्ष्मी पूजन के बाद
जैसे वह मांग ही लेगा
बोनस के पैसों में से
कुछ पैसे
पटाखों के लिए
इसी ऊहा पोह में
मैं आज
कर नहीं पाया
पूजन के बाद
जगदीश जी की आरती ।

मैंने
प्यार से फ़िराया हाथ
स्वेटर के डिज़ाइन पर
आज जैसे अटक गईं
ऊन की स्वेटर
स्मॄतियों की
नुकीली कील में
फ़िर उधड़ती चली गईं
उधड़ती चली गईं
जिसे समेट कर
बना रहा हूं गोला
ठीक वैसे ही
जैसे स्वेटर बुनती हुई
अपनी मां के पास बैठ
"गौरव" ने बनाया था कभी ।

सफ़र

राह मिली नहीं
न हुई पूरी चाह
बिना चले ही
सफ़र ज़िंदगी का
सिफर हो गया
फिर भी कहते हैं लोग
सम्भल कर चलना
आगे का सफ़र
जरा कठिन है भाई
अब तलक जो रही
वह देह भी आगे
नहीं रहेगी संग
जरा सम्भल कर भाई !

तुम कहां हो

कमरे में मैं अकेला
मौन कुछ किताबें
या फिर पसरा है अंधेरा
कीट-पतंगों के लिए नहीं है
कोई गुंजाइश
वज़ह चाहे है ऑलआउट 
दीवार घड़ी की टिक-टिक है
उस से बतियाऊं कैसे
सुनाती है
सुनती नहीं
तुम कहां हो ?

सोना नहीं है

सोना नहीं है 
इस लिए 
सोना है
सोनें में
है फायदा 
मेरे सोने का 
घर में है
सब को इंतजार
बस इसी लिए
अब सोना है !

किसी का अंतस बांचने के लिए

लोग आते रहे
बैठ-बैठ जाते रहे
संवेदनाएं भी व्यक्त कीं
लाख दिलासों के बाद भी
आंसू मगर थमे नहीं
शून्य में ताकती
मौन आंखों से झांकते
अबोलो सवालों को
कौन देता है जवाब-
क्यां शब्दों से थम जाते हैं
किसी के आंसू
क्या व्यक्त हो जाती हैं
सारी की सारी संवेदनाएं
शब्द कोश भर शब्दों से
क्या है कोई ऐसी भाषा
जो पढ़ ले किसी का
दिल और मन ।
कोई भी भाषा
किसी भी श्ब्द कोश के शब्द
शायद पर्याप्त नहीं है
किसी का अंतस
पूरा बांचने के लिए ।

भटनेर : राजस्थानी कविताओं की एक और कडी़

हनुमानगढ़ का भटनेर दुर्ग 52 बीघा भूभाग पर फ़ैला हुआ है । किले की दीवारों पर 52 बुर्ज़ बने हुए हैं । बहुत पहले इन 52 बुर्ज़ों में 52 कूएं बने हुए थे । कहते हैं कि इन कूओं का पानी मीठा था और किले के भीतर बसे नगर के लिए वर्षों तक पर्याप्त था । कई भयंकर युद्धो में ये कूएं दुश्मनों की लाशो से पट गए और कालान्तर में बन्द हो गए ।
भारत के इस गौरवशाली किले पर मेरी राजस्थानी कविताओं की एक और कडी़ प्रस्तुत है :-
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भटनेर-9
=====
मैंने देखा है
कभी भी नहीं लड़ते


कूएं -बावडी़
तालाब और नदी का पानी ।

मैंने सहेजे हैं
बावन बीघों में
बावन कूएं
जो पाते थे
सरस्वती से पानी

रहते थे सदैव एक रस ।

रहता है
रहता भी रहा है
आंतरिक प्रेम
आदान-प्रदान
एक दूसरे के
वज़ूद की रक्षा में ।

आदमी के भीतर
तिल भर पानी
उस आदमी के 

पानीदर होने के लिए
करता है युद्ध
उस युद्ध में
मिट जाते हैं कई सागर
यही पानी कर देता है
मुझ से खंडहर
कई-कई भटनेर !
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भटनेर-10
=======
बच्चे-स्त्रियां
ज़मीन-गढ़-गढि़यां
पेड़-पौधे
पशु-पक्षी
नदी-तालाब
कोई नहीं चाहते युद्ध
मैंने देखा है प्रत्यक्ष ।

युद्ध उतरता है
दंभ के विमान से
छल-बल की ज़मीन पर
जो लील जाता है
बच्चों की खुशियां
स्त्रियों के प्रणय गीत
धरती की धमक
पक्षियों का कलरव
और नदी की कल-कल ।

मेरे यहां भी
उतरे कई-कई युद्ध
दंभियॊ के ज़हन में
खनकी तलवारें
जो कर गई मुझे खंडहर
दे गई आज को कल
आज जो हूं मैं भटनेर ।

भटनेर किले पर कुछ और राजस्थानी कविताओं का हिन्दी अनुवाद

भटनेर किले पर मेरी कुछ और राजस्थानी कविताओं का हिन्दी अनुवाद यहां तीसरी किस्त में प्रस्तुत है ।

भटनेर-6
======
युद्ध में
हर बार
मैं ही जीता
या फ़िर मां
मेरी ज़मीन
जो धारे रही मुझे
हर हार-जीत के बाद भी ।

राजा
राजाओं की दम्भी सेना
मनाते रहे ज़श्न
दरबार ओ चौगान में
अभिमान में
जो हो भी जाता था
कई बार चकनाचूर ।

यूं हारने
जीतने वाले की
संज्ञाओं को
बदलते देखा है मैंने
नहीं बदली
फ़कत मेरी ज़मीन
बहुत कुछ ले गए
मेरी देह से नो्च-नोच
परन्तु नहीं ले जा सके
ढो कर मुझे
मेरी ज़मीन को
जिस पर
खडा़ हूं मैं भटनेर
सदियॊ से अटल ।
=
भटनेर-7
======
मैंने देखा है
साफ़-साफ़ देखा है
युद्ध में कभी भी
नहीं जीतता आदमी
फ़िर चाहे वह
राजा हो या रंक
जीतता है
फ़कत काल
जो लील जाता है
दमकती संज्ञाओं को
समूचे लाव ओ लश्कर के साथ ।

मैंने
बहुत बार देखा है
मानवी दम्भ को
जो कभी नहीं रहा शेष
शेष रही फ़कत ज़मीन
जो आज भी है जरूरी
मेरे भटनेर होने की
अनंत यात्रा में ।
===
भटनेर-8
======
बच्चे कल हैं
आज भी और अब भी
सच है सकल


उतरता है बल
उनके यहां
भटक जाता है
बुद्धि से पहले
पहुंच जाता है
फ़ड़फ़डा़ती भुजाओं में ।

बल का
भुजाओं में पहुंचना
घातक है बहुत
देखा है मैंने प्रत्यक्ष
भुजाएं फ़ड़फ़डा़ती हैं
टकराती हैं
देती हैं जन्म
भयंकर युद्ध को
जो कर देता है
सुघड़ घट
भविष्य की यात्रा पर निकले
भटनेरों को खंडहर
जो हूं मैं आपके प्रत्यक्ष आज ।

ऊंचो गढ़ भटनेर-दो : कुछ और कविताएं

भटनेर किला राजस्थान के उन कुछेक किलों में से एक है जहां "साका" हुआ था । यह साका भाटियॊ ने छठी शताब्दी में किया था ।
भटनेर और गज़नी तथा लाहौर व हिसार के शासक एक ही थे । एक बार हिसार का राज कुमार उज़्बेकिस्तान की उज़्बेक राजकुमारी का अपहरण कर ले आया । उज़्बेकों ने इसका बदला लेने के लिए लाहौर व गज़नी पर हमला कर भाटियों का नाश कर दिया । उस समय भी भाटियों ने लाहौर व गज़नी में साके किए । भा्टियॊ की बची-खुची सेना अपने राजा के साथ राज चिन्ह ले कर भटनेर आ गए । हिसार का राजकुमार उज़्बेकों से बचने के लिए छुपता फ़िर रहा था । उस ने भागते हुए रास्ते में अफ़वा फ़ैलाई कि "भटनेर का राज कुमार उज़्बेक राज कुमारी को ले गया " यह समाचार सुन कर उज़्बेक भटनेर पर चढ़ आए । उन्होंने भटनेर को तहस नहस कर दिया । उस वक्त भाटी राजपूतॊ ने भटनेर में यह इतिहास प्रसिद्ध "साका": किया था । भाटियों के लिए भटनेर किला एवम यह साका गर्व का विषय है ।
===============
मैंने भटनेर किले पर जो राजस्थानी कविताओं की सीरीज लिखी है उस में से कुछ का हिन्दी अनुवाद यहा दूसरी किस्त में प्रस्तुत है ।

भटनेर- 3
======
महल-दुमहले
ड़्योढि़यां जनानी-मर्दानी
दरबार-दीवान
आम ओ खास
द्वार-मुख्यद्वार
द्वारपाल-पृथ्वीपाल
भट-सुभट
सभी थे घट-घट मेरे
तभी तो था मैं भटनेर ।

मेरी "सही" जाती थी
बहुत दूर-दूर तक
जो लौटती नहीं थी खाली
मेरे नाम में ही था कुछ
या कि काल में उच्चरी
मेरी सज्ञा में ही था सब कुछ
नतमस्तक हो जाते थे
मेरी "सही" के आगे पृथ्वीपाल
तभी तो था मैं भटनेर ।

आज क्यों नहीं है
कुछ भी सही
कहां है मेरी वह "सही"
आप बताओ तो सही ।
======

भटनेर -4
=======
मैंने सुने हैं
विजय के उन्माद में 
निकले , नहीं लौटे
हर-हर महादेव के बोल
जौहर की चिताओं में
सुभट भटों की
नारियो के क्रंदन ।

मौत आई नहीं थी
की गई थी आमंत्रित
मुझ भटनेर में
उनके लिए
जो जीने की चाह में
करती थी श्रृंगार
प्रतिदिन नवेला
अपने सुभट पति को
रिझाने के लिए ।

दिखती थी मुझे उन में
देवी घोषित होने से
कहीं और कहीं अधिक
पूर्ण नारी होने की चाहत
पाती थीं राहत
जब लौटते थे
म्यान में डाले तलवार
उनकी सेजों के श्रृंगार ।
====

भटनेर-5
=====
एक नहीं
अनेक संज्ञाएं 
पालीं मैंने
अपनी देह पर
भटनेर होने से पहले।

सोच टकराए
फ़िर टकराई तलवारें
जो भी जीती
उसी ने थमा दी
हर बार नई संज्ञा
मैं ढोता रहा
इतिहास के पन्नों में
संज्ञा दर संज्ञा
अपनी देह के लिए ।

मैं 
आज भी
अपनी ज़मीन पर हूं
भले ही है
देह जर्रजर
अटल हूं मगर मैं भटनेर
कहां हैं वे संज्ञादानी

बाहूबल के अभिमानी ?

"ऊंचो गढ़ भटनेर-एक : कुछ कविताएं

मेरे शहर हनुमानगढ़ का प्राचीन नाम "भटनेर" है । वैदिक नदी सरस्वती के किनारे बसे इस शहर का इस से पहले नाम "सारस्वत ब्राह्मणों का वाटधान" , लोहगढ , भगवान राम के भाई भरत के नाम पर भरतनेर भी रहा है । यहां मध्य ऐशिया का प्राचीनतम किला है जिसकी मुरम्मत 295 ईश्वी में हुई । तब भगवान श्रीकृष्ण के वंशज एवम भाटी राजवंश के भूपत भाटी ने इसे जीत लिया था । भूपत ने अपने पिता राव भाटी के नाम पर इसका नाम "भटनेर" रख दिया । यह किला अधिकांशत: भाटियों के ही अधीन रहा । भारत पर हुआ प्रत्येक हमला सब से पहले इसी किले पर हुआ--जो यहां जीता वही दिल्ली गया । अंतिम बार इस किले को वैसाख सुदि चौथ सम्वत 1805 वार मंगलवार को बीकानेर के शासक महाराजा सूरतसिंह ने जीता था । उस दिन मंगलवार होने के कारण इस किले का नाम भटनेर से बदल कर हनुमानजी के नाम पर हनुमानगढ़ रख दिया । 1962 में भाखडा़ नहर क्षेत्र में आने के कारण इसका नाम " सादुलगढ़" किया गया मगर थोडे़ समय बाद फ़िर से हनुमानगढ़ कर दिया गया ।
मैंने जरजर होते इस पुरा महत्व के ऐतिहासिक किले को घूम घूम कर पढा़ है । इसकी व्यथा कथा को मैंने सुना है , जो कि मेरी राजस्कथानी विताओं में ढल गईं । मैं उन कविताओं का हिन्दी अनुवाद आपके बीच ला रहा हूं । आप भी पढि़ए भटनेर की संवेदनाएं-------

भटनेर-1
======
सदा ही
अनाथ नहीं था मैं
सनाथ था कभी तो
कई बार नाथा गया
ज्ञात-अज्ञात हाथों
चतुर मष्तिष्कों द्वारा ।

मेरी जर-जर देह के
कण-कण पर
मिल जाएंगे
अगणित जातियों के
आदिम स्पर्श ।

यूं ही नहीं पसर गया
बावन बीघों में
मैं भटनेर
कई-कई भट-सुभट
जने-पाले थे मैंनें
अपनी देह से
तभी हुआ होऊंगा भटनेर !
========
भटनेर-2
======
सरस्वती के जल से
धुलता था
प्रतिदिन मेरा तन
निखरता
औज प्रतिपल
जब छू कर जाता था
कल-कल बहता जल ।



मैं सुनता था
कल-कल
संकेत था शायद भविष्य का
मगर मैं समझ न सका
ऐसा होगा कल ।

आज
उसी कल में
जी रहा हूं मैं
किसी कल के लिए ।

मेरी बुढा़ई चिन्ता
उत्तराकांक्षा पाले
उकेरती है प्रश्न ;
शायद न कर सकूं
अपनी देह रक्षा
प्रश्न है-
कहां जाएगी
वह संज्ञा
जो है अभी भटनेर ?

नपुंसक सांत्वना

वे बेहद संवेदनशील हैं
उन्होंने इसका प्रमाण दिया है
रोने वालों को
अपने हाथों से अभी-अभी
रुमाल बांट कर आए हैं ।

यह अलग बात है कि
रोने वाले अब रो नहीं रहे
सुबक रहे हैं
वे रुमाल बांट कर
अब सिंहासन पर दुबक रहे हैं ।

शायद वे नहीं जानते
रोने वाले आंखों से नहीं
दिल से रोते हैं
दिल के आंसूं रुमाल से नहीं
फ़लवती सांत्वना से ही
पूंछे जाते हैं
उनकी नपुंसक सांत्वना से नहीं !

मेहनत

सारे मेहनतकश 
वहीं थे
उनके हाथों में
बहुत लकीर थी
मगर वह बस्ती
बरसों से फकीर थी ।

चौट

चौट तो दिल के अंदर है ।
आंख बेवज़ह समंदर है ।।

उड़ गई नींद

न देह थी
न थे पंख
फिर भी
न जाने कैसे
उड़ गई नींद..... !

आहिस्ता से आईं
लौट कर यादें
ठहरी आंखों में 
आंखें मुंद गई
फिर भी
न जाने कैसे
उड़ गई नींद.....!

पहले कभी
उड़ती थी नींद
उनकी याद में
अपने आप
अब उड़ती है
जब होता है
उच्च रक्तचाप !

शुक्रवार, अप्रैल 11, 2014

मुझे समन्दर करती वह

उसे भूख नहीं लगती
क्यों कि मैंने कुछ नहीं खाया

वह बेचैन है
क्यों कि मुझे चैन नहीं

उसे नींद नहीं आती
क्यों कि मुझे नींद नहीं आती

उसे गुस्सा नहीं आता
क्यों कि मुझे गुस्सा आता है

वह खुश है
क्यों कि मैं खुश हूं

वह चिंतित रहती है
क्यों कि मैं चिंता नहीं करता

वह उन सम्बन्धों को ढोती है
जिनको मैं उसे सौंपता हूं

सात फेरों के बदले
अपने स्वजन को त्याग
मेरे परिजन को
अपना स्वजन स्वीकारती
अपने स्व को होम
मुझ में आ मिलती है
किसी नदी की तरह
मुझे समन्दर करती वह !

उसके सुख

धर्मपत्नी है मेरी
यह सुन कर
वह पा जाती है
असीम सुख
यह शब्द
देते हैं जैसे उसे ऊर्जा
दिन भर 
यंत्रवत चलने के लिए ।

मुझे केन्द्र में रख
करती रहती है
दिन भर
घर के सारे काम


असंख्य चिंताओं के बीच
उसे बड़ी लगती हैं
मेरी चिंताएं
अपनी बीमारी से
बहुत बड़ी लगती है
मेरी बीमारी ।

चिंताएं औढ़ कर
देर रात तक
जाग कर सोती है
देखती है रात भर
मेरे ही सपने
भोर में जागती है तो
मेरे लिए ही जागती है
इसी उपक्रम में
वह ढूंढ़ती रहती है
अपने लिए सुख
जो उसे मिलता नहीं
मेरे सुख से पहले ।

गुरुवार, अप्रैल 10, 2014

प्रेम की करवट

प्रेम था किसान को
अपने गाँव से
अपनी जमीन से
वह छोड़ न सका
अपना गाँव और जमीन !

प्रेम था माँ से
माँ को छोड़ कर
जा न सका बेटा !

प्रेम था बेटे से
बेटे को छोड़ कर
जा न सकी माँ !

प्रेम था लड़के को
मोहल्ले की लड़की से
लड़का ले भागा
उस लड़की को
लड़की भी चल पड़ी
इस प्रेम के लिए
छोड़ कर
शेष सारे प्रेम !

जुड़े रहने से
छोड़ जाने के बीच
करवट लेता प्रेम
बदल लेता है
कितने-कितने मायने
एक जगह से टूट कर
दूसरी जगह होता है
नए अर्थों में स्थापित
जबकि हर मुकाम
होता तो है प्रेम !

रूह में थी मैं

प्रेम के नहीं
वशीभूत थे तुम
अपने ही मनोरथ के
जिसे पूरने
हो आए तुम 
मेरी देह तक
देह में कहीं भी
नहीं थी मैं ।

रूह में थी मैं
तुम भटकते रहे
देह में मेरी
मेरी देह में
रुके नहीं तुम
रुके तो कभी
मन में भी नहीं
सम्बन्धों में ही
चिपकाए रहे
और
मैं ढोती रही तुम्हें
अर्धनारी बन कर
तुम कभी
न अर्धनारीश्वर हुए
न पूर्ण पुरुष !

हम पेट वाले हैं

आप और हम
बहुत फ़र्क वाले है
हम नादान 
आप सतर्क हैं
आप सीट वाले 
हम वोट वाले हैं
आप बार-बार
जीत वाले
हम हर बार
हार वाले हैं !

आप
शहर में रहते हैं
ब्रेकफास्ट
लंच-डिनर
बैड टी वाले हैं
हम
गांव में रहते हैं
वक्त-बेवक्त
ठंडी-बासी
राबड़ी-रोटी वाले हैं ।

आप
दिल्ली में रहते हैं
इंडिया गेट वाले हैं
हम
गांव में रहते हैं
खाली पेट वाले हैं ।